केंद्र सरकार की सभी राज्यों को हिदायत, बुनियादी ढांचे के विवादों के निपटारे के लिए बनें विशेष अदालतें

 

विशेष अदालतों का गठन होने तक विशेष दिनों पर मामलों की सुनवाई तय की
पिछले हफ्ते भी हाईकोर्टो के रेजिस्ट्रार जनरलों को लिखे पत्र में कहा कि बुनियादी ढांचे से जुड़े मामलों के तेज गति से निपटारे के लिए जब तक विशेष अदालतों का गठन नहीं हो जाता तब तक ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष दिनों का निर्धारण होना चाहिए।

नई दिल्ली, प्रेट्र। कानून मंत्रालय ने राज्यों से कहा है कि वह आधारभूत ढांचे के परियोजना करारों के विवादों को सुलझाने के लिए विशेष अदालतें गठित करें। ऐसा उस कानून के तहत किया जाए जिसमें दो साल पहले संशोधन किया था। मंत्रालय का कहना है कि भारत और राज्यों की 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' रैंकिंग बेहतर होगी। इससे परियोजनाओं में अनावश्क देरी नहीं होगी और लागत भी नहीं बढ़ेगी।

इलाहाबाद, कर्नाटक और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का उदाहरण देते हुए अन्य उच्च न्यायालयों को सुझाव दिया कि वह भी इन्हीं की तरह एक विशेष दिन निर्धारित करके आधारभूत परियोजनाओं से जुड़े मामलों का निपटारा करें। विशिष्ट राहत (संशोधन) अधिनियम की धारा 20 बी के तहत विशेष अदालतों का प्रावधान है। लेकिन कानून मंत्रालय ने इस कार्य के लिए विशेष रूप से हर हफ्ते तय दिनों पर विशेष अदालतें गठित करने का निर्देश दिया है। पिछले हफ्ते भी हाईकोर्टो के रेजिस्ट्रार जनरलों को लिखे पत्र में कहा कि बुनियादी ढांचे से जुड़े मामलों के तेज गति से निपटारे के लिए जब तक विशेष अदालतों का गठन नहीं हो जाता तब तक ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष दिनों का निर्धारण होना चाहिए।

कानून मंत्रालय के सचिव (न्याय) का कहना है कि अक्टूबर में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सभी मुख्यमंत्रियों को भी लिखे पत्र में कहा कि इससे विदेशी निवेशकों के कामकाज में सुधार से व्यापार करना सरल हो जाएगा। उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचों के करारों से जुड़े अधिनियम में नई धारा 20 बी जोड़ी गई है। इससे ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट के मामले में अदालत निषेधाज्ञा नहीं लगा सकेगी। चूंकि ऐसा माना जाता है कि निषेधाज्ञा लगाने से बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में बाधाएं आएंगी या उन्हें पूरा करने में अनावश्यक देरी होगी। केंद्रीय मंत्री प्रसाद ने लिखा कि यह 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की रैंकिंग में भारत और देश के राज्यों की स्थिति में सुधार करेगा। विदेशी निवेशकों का मानना है कि विशेष अदालतों की मौजूदगी में इन परियोजनाओं के करार पर अमल करना सुनिश्चित होगा। इससे समय भी बचेगा और लागत भी कम आएगी। साथ ही निवेशकों के लिए फ्रेंडली इकोसिस्टम बनेगा।