दवा निर्माता कंपनियों के लिए कितने मुनाफे का सौदा होगी कोरोना वैक्सीन

 वैक्‍सीन निर्माताओं के लिए ये मौका मुनाफे वाला होगा।


पूरा विश्‍व दस माह बाद भी कोरोना महामारी से जूझ रहा है। वहीं वैक्‍सीन निर्माताओं के लिए जहां ये महामारी और इसकी वैक्‍सीन पहले एक चुनौती बनी हुई वहीं अब ये एक फायदे का सौदा भी साबित होने वाला है।

नई दिल्‍ली । प्रमुख वैक्सीन जिन्हें मानव परीक्षण की अंतरिम रिपोर्ट में संतोषजनक सफलता मिली है, उन्होंने व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू कर दिया है। ब्रिटेन में कोरोना वैक्सीन लगाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अमेरिका में शुरू होने वाली है। भारत समेत अन्य प्रमुख देश भी टीकाकरण की तैयारी में जुट चुके हैं। अटकलें हैं कि अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना व फाइजर अपने साझेदार के साथ अगले साल अरबों की कमाई करेंगी। हालांकि, अब तक कोरोना वैक्सीन निर्माताओं ने अपनी कमाई का लक्ष्य निर्धारित नहीं किया है। इसका कारण है कि वैक्सीन निर्माण परियोजना को कई सरकारी व गैर सरकारी संगठनों ने वित्तीय व अन्य प्रकार मदद की है।

किसने कितना किया निवेश

कोरोना वैक्सीन की तत्काल जरूरत को देखते हुए सरकारों व दानदाताओं ने इसकी विकास परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश किया है। गेट्स फाउंडेशन जैसे स्वयंसेवी संगठनों के अलावा अलीबाबा के संस्थापक जैक मा व र्डांंसग स्टार डॉली भी परियोजनाओं में मदद कर रहे हैं। विज्ञान से संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली कंपनी एयरफाइनिटी के अनुसार, सरकारों ने कोरोना वैक्सीन परियोजनाओं में करीब 634 अरब रुपये का निवेश किया है, जबकि गैर लाभकारी संगठनों ने 146 रुपये का। परियोजनाओं में कंपनियों का निवेश सिर्फ 254 अरब रुपये है।

मुनाफे की गुंजायश

बड़ी कंपनियां वैक्सीन परियोजनाओं में निवेश नहीं करतीं। आपातकालीन स्थितियों में वैक्सीन पर काम करना पहले से ही मुनाफे का सौदा नहीं रहा है। वैक्सीन के विकास में समय लगता है और यह भी निश्चित नहीं रहता है कि सफलता मिलेगी ही। गरीब देशों को भारी मात्रा में वैक्सीन की जरूरत होती है, लेकिन वे अधिक कीमत का भुगतान नहीं कर सकते। इसके अलावा वैक्सीन को एक से दो बार लगाने की जरूरत होती है, जिसके लिए काफी धन की आवश्यकता पड़ती है। जीका व सार्स वायरस के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां नुकसान झेल चुकी हैं। हालांकि, फ्लू के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों का मानना है कि अगर कोरोना वायरस भी फ्लू की तरह रहा और उसके लिए हर साल वैक्सीन की जरूरत पड़ी तब यह सौदा मुनाफे का हो सकता है।

कंपनियां कितना ले रहीं दाम

कुछ कंपनियां नहीं चाहतीं कि उनकी छवि महामारी के दौर में मुनाफा कमाने वाली कंपनी के रूप में उभरे। अमेरिकी कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन व ब्रिटेन की एस्ट्राजेनेका ने लागत मूल्य पर ही वैक्सीन की बिक्री का निर्णय लिया है। मॉडर्ना चूंकि छोटी कंपनी है और वह आरएनए तकनीक पर काम कर रही है, इसलिए उसकी वैक्सीन की कीमत थोड़ी अधिक हो सकती है। हालांकि, इसका मतलब कतई यह नहीं है कि वैक्सीन की कीमत तय हो चुकी है। दवा निर्माता कंपनियां अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग कीमत तय करती हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार कितना खर्च उठा सकती है।

क्या तकनीक साझा करेंगी

सरकारों और गैर सरकारी संगठनों से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के बावजूद ज्यादातर कंपनियों ने अनुबंध के तहत फॉर्मूले की मिल्कियत को अपने पक्ष में कर लिया है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि जब वैक्सीन के निर्माण में कंपनियां अपने स्तर से रुचि नहीं दिखातीं तो उसके फॉर्मूले की मिल्कियत पास रखने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए। खासकर तब जबकि निर्माण में कई अन्य साझेदार भी शामिल हैं।