पहले सस्ता बायो-टॉयलेट अब बनाया सेप्टिक टैंक साफ करने वाला बैक्टीरिया मिश्रण, परीक्षण भी सफल

 सार्वजनिक शौचालयों आदि में भी इनका उपयोग बेहतर परिणाम दे सकता है।


इस मिश्रण में 20 से ज्यादा बैक्टीरिया शामिल हैं। एनाबोरिक माइक्रोबियल कंसोसिएशन आधारित यह बैक्टीरिया मिश्रण घोल के रूप में होता है और 24 घंटे बाद अपना असर दिखाना शुरू करता है। घोल को सेप्टिक टैंक में डालने पर बैक्टीरिया बढ़ते ही रहते हैं।

ग्वालियर। शौचालयों के सेप्टिक टैंक या उनकी लाइन जाम या अवरद्ध होने की समस्या अब बीते दिनों की बात हो जाएगी। सस्ता बायो-टॉयलेट तैयार करने वाले अधिकारी ने अब ऐसे बैक्टीरिया का मिश्रण (घोल) तैयार किया है जो इस समस्या को बिना दुर्गध दूर कर देंगे। यह अधिकारी हैं मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिला पंचायत में पदस्थ प्रोजेक्ट मैनेजर जयसिंह नरवरिया। हमेशा कुछ न कुछ नया करने का जज्बा रखने वाले नरवरिया इंजीनियर भी हैं। नरवरिया ने इस बैक्टीरिया मिश्रण का अपने स्तर पर कई शहरों में परीक्षण भी करवाया है और यह सफल रहा है।

ऐसे काम करता है बैक्टीरिया का मिश्रण

नरवरिया द्वारा तैयार इस मिश्रण में 20 से ज्यादा बैक्टीरिया शामिल हैं। एनाबोरिक माइक्रोबियल कंसोसिएशन आधारित यह बैक्टीरिया मिश्रण घोल के रूप में होता है और 24 घंटे बाद अपना असर दिखाना शुरू करता है। घोल को सेप्टिक टैंक में डालने पर बैक्टीरिया बढ़ते ही रहते हैं। ये गंदगी का क्षरण करते हैं जिससे अवरद्ध होने की समस्या खत्म हो जाती है। दरअसल, बैक्टीरिया का मिश्रण इस अवधि में वृद्धि कर अपनी कॉलोनी बनाता है और इससे उनकी संख्या कई गुना बढ़ जाती है और असर भी। यह मिश्रण एक बोतल में उपलब्ध करवाने की योजना है।

दूसरे शहरों में करवाया परीक्षण

नरवरिया ने देश के दूसरे शहरों जैसे दिल्ली और लखनऊ में रहने वाले अपने साथी विज्ञानियों तक बैक्टीरिया का घोल पहुंचाया, ताकि वे अपने यहां इसका उपयोग कर सकें। परीक्षण में बैक्टीरिया के काम का तरीका सोचे गए अनुसार ही सामने आया है। नरवरिया के मुताबिक अब इसे घर-घर तक पहुंचाने के लिए योजना बनाई जा रही है। दरअसल, आधुनिक शौचालयों में जहां भरपूर पानी नहीं होता है वहां इस तरह के मिश्रण ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं। सार्वजनिक शौचालयों आदि में भी इनका उपयोग बेहतर परिणाम दे सकता है।

बनाया था सस्ता बायो-टॉयलेट

नरवरिया ने करीब दो साल पहले स्वच्छ भारत मिशन के तहत सबसे सस्ता बायो-टॉयलेट बनाया था। इसमें 10 से 11 हजार रुपये की लागत आती है। यह भी बैक्टीरिया आधारित बायो-टॉयलेट था। इस प्रोजेक्ट को जिला पंचायत ने विभिन्न गांवों में भी लागू करवाया था। गांवों में पानी की कमी और साफ-सफाई की सुविधा कम होने की वजह से ऐसे छोटे बायो-टॉयलेट काफी उपयोगी रहे।ग्वालियर जिला पंचायत के प्रोजेक्ट अधिकारी जयसिंह नरवरिया ने बताया कि सेप्टिक टैंक अवरद्ध होने की समस्या से निजात पाने के लिए यह बैक्टीरिया मिश्रण तैयार किया गया है। अलग-अलग शहरों में इसका परीक्षण करवाया तो अच्छे परिणाम मिले हैं। यह 24 घंटे बाद अपना काम करना शुरू करता है और गंदगी को खत्म करता है।