गोरखा सैनिकों के अदम्य साहस और अद्भुत पराक्रम का आख्यान

 पूर्व गोरखा सैनिक टिम आइ गुरुंग ने यह पुस्तक ‘आयो गोरखाली : ए हिस्ट्री ऑफ गोरखाज’ लिखी है।

गोरखा सैनिकों के एकपक्षीय विवरण पर प्रहार करने व उनकी असली पहचान उजागर करने के उद्देश्य से पूर्व गोरखा सैनिक टिम आइ गुरुंग अपनी पुस्तक ‘आयो गोरखाली - ए हिस्ट्री ऑफ गोरखाज’ के साथ पाठकों के समक्ष उपस्थित हुए हैं।

अगर कोई व्यक्ति कहता है कि वह मौत से नहीं डरता है, तो तय मानिए कि वह झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।’ गोरखाओं के अदम्य साहस और अद्भुत पराक्रम का वर्णन करने के लिए भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ के इन शब्दों से बेहतर कोई टिप्पणी नहीं हो सकती है। पिछले 200 वर्षो से गोरखा सैनिकों ने न केवल नेपाल, बल्कि भारत और ब्रिटेन की सेनाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, लेकिन उनके साहस और वीरता की कहानियों का इतना ज्यादा प्रचार किया गया कि इसके पीछे छिपी उनकी त्रसदी किसी को नजर ही नहीं आई। इसे ही उजागर करने के उद्देश्य से पूर्व गोरखा सैनिक टिम आइ गुरुंग ने यह पुस्तक ‘आयो गोरखाली : ए हिस्ट्री ऑफ गोरखाज’ लिखी है।

अंग्रेजी में लिखित यह पुस्तक गोरखाओं के इतिहास को ईमानदारी से प्रस्तुत करने का एक गंभीर प्रयास है। दरअसल, इससे पहले गोरखा सैनिकों पर पश्चिमी लेखकों ने पुस्तकें लिखीं, जिनमें से ज्यादातर खुद सैन्य अधिकारी रहे हैं। कुछ नेपाली लेखकों ने भी गोरखा इतिहास को पेश करने की कोशिश की है, लेकिन उन कृतियों में उनके एक पक्ष को ही प्रस्तुत किया गया। अप्रतिम योद्धा होने के साथ-साथ गोरखा भी उन सभी समस्याओं से दोचार होते हैं, जो एक सामान्य इंसान के जीवन में पेश आती हैं। टिम आइ गुरुंग चूंकि खुद हांगकांग में गोरखा सैनिक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं, इसलिए वे उनकी त्रसदी को बेहतर ढंग से समझ और चित्रित कर पाए हैं।

अपनी बहादुरी और वफादारी के लिए मशहूर हो चुके गोरखा मूल रूप से लड़ाका जाति से नहीं थे, जैसा कि प्रचार किया जाता है। वास्तव में वे किसान थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें सैनिक बना दिया। सबसे पहले वे महाराजा रणजीत सिंह की तरफ से लड़े, फिर अपने देश के लिए और आगे चलकर ब्रिटिश व भारतीय सेना का गौरव बने। गोरखा सैनिकों ने पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है। लेकिन यह दिलचस्प है कि अगर आप नेपाल जाएं और किसी से गोरखा के बारे में पूछेंगे तो बहुत कम लोग बता पाएंगे। इसकी वजह यह है कि नेपाल में उन्हें ‘लहुरे’ कहा जाता है। यह लाहौर का अपभ्रंश है। लाहौर तब महाराजा रणजीत सिंह की राजधानी हुआ करता था। रणजीत सिंह की सेना में बाहरी लोगों के लिए ‘लहुरे’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था। यह भी जानना जरूरी है कि सभी गोरखा नेपाली होते हैं, लेकिन सभी नेपाली गोरखा नहीं होते हैं। पश्चिमी नेपाल की मागर और गुरुंग तथा पूर्वी नेपाल की राय और लिंबू जनजातियों को ही गोरखा कहा जाता है। शुरुआत में ब्रिटिश सेना में गोरखाओं की भर्ती के नियम काफी सख्त थे, लेकिन बाद में बहुत से नेपाली अपने नाम के आगे इनमें से कोई एक जनजाति की उपाधि लगाकर ब्रिटिश सेना में भर्ती होने लगे।

गुरुंग ने इस पुस्तक के जरिये गोरखा सैनिकों की वस्तुस्थिति से दुनिया को परिचित कराने का काम किया है। पुस्तक की भाषा अत्यंत सरल और प्रवाहमयी है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें गोरखा सैनिकों के बहाने नेपाल की त्रसदी को चिह्नित किया गया है। लेखक ठीक ही कहते हैं कि किसी भी देश की असली पूंजी उसके युवा होते हैं, लेकिन नेपाल की विडंबना देखिए कि उसके श्रेष्ठ पुरुष देश से बाहर रहते हैं।लेखक की नजर में सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि नेपाल ने अपनी सर्वश्रेष्ठ आबादी का बाहरी देशों से सौदा किया और वह भी काफी सस्ता। लेकिन इससे भी बड़ी बदकिस्मती यह है कि नेपाल में इसकी न तो तब कोई चिंता करता था और न ही अब कोई करता है। एक नेपाली के नजरिये से गुरुंग के दुख को समझा जा सकता है। गोरखा सैनिकों की सच्ची तस्वीर पेश करने के लिए गुरुंग बधाई के पात्र हैं।