अवमानना मामले में फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे प्रशांत भूषण, अन्य याचिका पर विचार का किया अनुरोध

 अलग याचिका में भूषण ने अपील करने के अधिकार का उठाया है सवाल


शीर्ष अदालत ने 14 अगस्त को प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के प्रति उनके दो अपमानजनक ट्वीट को लेकर अवमानना का दोषी ठहराया था। न्यायालय ने कहा था कि इन ट्वीट के लिए यह नहीं कहा जा सकता कि ये जनहित में न्यायपालिका के कामकाज की निष्पक्ष आलोचना थी।

नई दिल्ली, प्रेट्र। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में एक आवेदन दायर कर यह निर्देश देने का अनुरोध किया कि उन्हें अवमानना का दोषी ठहराने और सजा के आदेशों पर पुनर्विचार के लिए दायर दो याचिकाएं उनकी अलग से दायर याचिका पर फैसला होने के बाद सूचीबद्ध की जाए। इस अलग याचिका में भूषण ने इस तरह के मामले में अपील करने के अधिकार का सवाल उठाया है।

प्रशांत भूषण ने यह आवेदन न्यायमूर्ति एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष उनकी पुनर्विचार याचिकाओं पर विचार होने से एक दिन पहले दाखिल किया है। न्यायालय की अवमानना मामले में दोषी ठहराए जाने और सजा देने के आदेशों के खिलाफ भूषण की पुनर्विचार याचिकाएं बुधवार को न्यायाधीशों के चैंबर में विचारार्थ सूचीबद्ध हैं। शीर्ष अदालत ने 14 अगस्त को प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के प्रति उनके दो अपमानजनक ट्वीट को लेकर अवमानना का दोषी ठहराया था। न्यायालय ने कहा था कि इन ट्वीट के लिए यह नहीं कहा जा सकता कि ये जनहित में न्यायपालिका के कामकाज की निष्पक्ष आलोचना थी।

शीर्ष अदालत ने बाद में 31 अगस्त को प्रशांत भूषण को एक रुपये का सांकेतिक जुर्माना देने या तीन महीने की साधारण कैद और तीन साल के लिए किसी भी मामले में पेश होने से प्रतिबंधित करने की सजा सुनाई थी। भूषण ने जुर्माने की रकम न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा करा दी और 12 सितंबर को अलग से एक याचिका दायर करके ऐसे मामले में अपील करने के अधिकार का मुद्दा उठाया था।

अधिवक्ता कामिनी जायसवाल के माध्यम से मंगलवार को दायर आवेदन में भूषण ने कहा है कि उनकी 12 सितंबर की याचिका का उनकी पुनर्विचार याचिकाओं से सीधा संबंध है। इस याचिका को शीघ्र सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने के बारे में 14 सितंबर को आवेदन करने के बावजूद यह मामला अभी तक सूचीबद्ध नहीं हुआ है जबकि पुनर्विचार याचिकाएं 16 दिसंबर को अचानक ही सूचीबद्ध हो गई हैं। यह न्याय के हित में होगा अगर शीर्ष अदालत उनकी अलग से दायर याचिका पर निर्णय के बाद पुनर्विचार याचिकाओं पर गौर करे।