बापू की यात्रा ने ही जम्मू-कश्मीर के विलय की बनाई थी राह

 


जम्वाल ने बताया कि वे एक किताब लिख रहे हैं, इसमें गांधी जी की यात्रा का पूर्ण विवरण होगा।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का यह दौरा करीब 10 दिन चला था। मेजर जनरल गोवर्धन सिंह जम्वाल ने बताया कि वे एक किताब लिख रहे हैं इसमें गांधी जी की यात्रा का पूर्ण विवरण होगा।

जम्मू, संवाददता: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आजादी से कुछ दिन पूर्व एक अगस्त 1947 को अंतिम डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह से भेंट करने जम्मू कश्मीर आए थे। यह महात्मा गांधी की जम्मू-कश्मीर की एकमात्र यात्रा थी। यह उनकी अनौपचारिक यात्रा थी, लेकिन माना जाता है कि इस यात्रा के बाद महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ जम्मू कश्मीर का विलय करने का मन बना लिया था।

महात्मा गांधी की उस यात्रा के गवाह सेवानिवृत्त मेजर जनरल गोवर्धन सिंह जम्वाल ने बताया कि जब महात्मा गांधी कश्मीर में थे, तो उन्हीं दिनों वह लेफ्टिनेंट का पेपर देने के लिए कश्मीर में थे। छावनी में ही किसी संबंधी के पास रहते थे। जब पता चला कि महात्मा गांधी कश्मीर आए हुए हैं, तो दिली इच्छा थी कि उनसे मिला जाए। सीधा मिलना तो संभव नहीं हो पाया था, लेकिन उन्हें सुनने का मौका जरूर मिला। वे पल मेरे जीवन के यादगार पल बन गए।

गांधी जी उस समय देश के हालात को लेकर काफी चिंतित थे, लेकिन कश्मीर में ऐसा कुछ नहीं था। एक तरफ देश जल रहा था, तो दूसरी तरफ कश्मीर घाटी पूरी तरह से शांत थी। कश्मीर के हालात को देख गांधी जी काफी संतुष्ट हुए। उन्होंने इसका श्रेय शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को देते हुए उनकी खुलकर तारीफ की थी। कश्मीर के हालात को देखते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें कश्मीर से उम्मीद की किरण दिख रही है। उनका यह दौरा करीब 10 दिन चला था। मेजर जनरल गोवर्धन सिंह जम्वाल ने बताया कि वे एक किताब लिख रहे हैं, इसमें गांधी जी की यात्रा का पूर्ण विवरण होगा।

उस दौरान लार्ड माउंट वेंटन और चर्चिल भी कश्मीर आए थे। उनका महाराजा पर दबाव था कि वह पाकिस्तान से मिलने के लिए सहमत हो जाएं। अंग्रेज चाहते थे कश्मीर, गिलगित आदि क्षेत्रों पर उनका राज बना रहे। बाद में अंग्रेज कमजोर हो गए और उनकी नहीं चली। हकीकत यह है कि महाराजा हरि सिंह का महात्मा गांधी पर बड़ा विश्वास था। मैं तो कहूंगा कि महाराजा हरि सिंह जी ने गांधी जी से मुलाकात करने के बाद ही जम्मू-कश्मीर के साथ विलय करने का मन बना लिया था।