वैक्सीन से विश्व-बंधुत्व का संदेश दे रहा भारत, टीका नीति का बनेगा बड़ा आधार

 कोरोना महामारी के विरुद्ध लड़ाई के आरंभिक दौर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से ताली-थाली बजवाने और दीये जलवाने जैसे आह्वान किए थे, तो बहुत से लोग यह कह रहे थे कि दुनिया वैक्सीन बनाने में लगी है और भारत ताली-थाली बजाने में लगा है। लेकिन आज तस्वीर ये है कि ताली-थाली बजाकर अपने कोरोना योद्धाओं का हौसला बढ़ाने वाले इस देश ने आज दो-दो वैक्सीन बनाने में सफलता हासिल कर ली है और दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान भी शुरू कर चुका है। निश्चित रूप से यह उपलब्धि हमारे विज्ञानियों के अथक परिश्रम का परिणाम है, लेकिन जिन्होंने कभी ताली-थाली वाली गतिविधियों का उपहास बनाया था और हमारे विज्ञानियों की प्रतिभा पर विश्वास नहीं किया था, वे इस पर कुछ नहीं कह पा रहे।

भारत की वैक्सीन अन्य देशों के लिए भी संबल सिद्ध हो रही है। हमारे लिए अच्छी बात यह भी है कि भारत की वैक्सीन उत्पादन की क्षमता बहुत अधिक है। एक आंकड़े के मुताबिक, दुनिया भर में दी जाने वाली विभिन्न प्रकार की वैक्सीन में 70 फीसद का उत्पादन भारत में होता है। इस कारण कोरोना वैक्सीन को लेकर विश्व की नजर भारत पर टिकी हुई है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने भी भारत की वैक्सीन निर्माण क्षमता की प्रशंसा करते हुए इसे विश्व के लिए एक थाती बताया है। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि ग्लोबल वैक्सीनेशन कैंपेन को कामयाब बनाने के लिए भारत हर तरह की भूमिका निभाएगा।

इस बीच भारत सरकार के विदेश मंत्रलय द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, भारत अब तक भूटान, मालदीव, मॉरीशस, बहरीन, म्यांमार, सेशेल्स आदि पड़ोसी देशों को 55 लाख वैक्सीन की खुराकें मुफ्त में उपलब्ध करा चुका है। आगामी दिनों में ओमान को वैक्सीन की एक लाख खुराकें, कैरेबियाई समुदाय को पांच लाख और निकारागुआ व प्रशांत द्वीपीय देशों को दो-दो लाख खुराकें उपलब्ध कराने की भी योजना है। ब्राजील, मोरक्को और बांग्लादेश जैसे कुछ देशों में वैक्सीन का निर्यात भी किया गया है। साथ ही, आने वाले समय में सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा और मंगोलिया में भी भारत वैक्सीन की आपूर्ति कर सकता है।

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देश के इन प्रयासों को वैक्सीन डिप्लोमेसी के रूप में भी परिभाषित किया जा रहा है। नेपाल का नेतृत्व जो चीन के निकट दिख रहा था, अब वैक्सीन के लिए भारत पर निर्भर है। चूंकि भारतीय वैक्सीन की गुणवत्ता भी बेहतर सिद्ध हो रही है, लिहाजा विश्व के अन्य कई देश भी गुणवत्तापूर्ण वैक्सीन की आपूíत की उम्मीद में भारत के निकट आ सकते हैं। इन अर्थो में वैक्सीन हमारे देश के लिए वैश्विक कूटनीति का एक उपकरण अवश्य सिद्ध हो सकती है। मगर यह बात इतने तक ही सीमित नहीं है।

वास्तव में, भारतीय संस्कृति के मूल में ही विश्व-बंधुत्व की भावना भरी हुई है। इसी कारण दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश होने के कारण जब खुद ही उसे वैक्सीन की बड़ी मात्र में आवश्यकता है, तब भी वह दुनिया के देशों को वैक्सीन की आपूíत करने को तत्पर है। सबके सुखी और सबके निरोग होने के विचार को धारण करने वाली हमारी संस्कृति में कूटनीति से भी बढ़कर विश्व-बंधुत्व की एक भावना है, इसी का संदेश वैक्सीन की 55 लाख मुफ्त खुराकें अपने पड़ोसी देशों को भेजकर भारत ने दिया है। साथ ही, कोरोना महामारी के प्रसार के दौरान विश्व के अनेक देशों को उनकी मांग पर भारत ने दवाइयां आदि भी उपलब्ध करवाई थीं। इसमें कूटनीति रही होगी, परंतु प्रधानता तो विश्व-बंधुत्व की भावना ही थी। वस्तुत: यह भावना हमारी सांस्कृतिक पहचान का है, जिसका संदेश इस आपदा काल में भी देश ने दुनिया को दिया है।