90 साल पहले आज ही के दिन दिल्ली बनी थी देश की राजधानी, जानें रोचक सफर

नई दिल्ली के राजधानी बनने के दौरान का एक दृश्य। ’सौजन्य : दिल्ली अभिलेखागार विभाग

13 फरवरी 1931 को भारत की नई राजधानी के रूप में दिल्ली का उद्घाटन किया गया था। ह गार्डन सिटी के रूप में देश की राजधानी की संकल्पना ही थी। नई दिल्ली के राजधानी बनने के दौरान का एक दृश्य। सौजन्य दिल्ली अभिलेखागार विभाग

नई दिल्ली, दिसंबर 1911, दिल्ली के कारनेशन पार्क में एक दरबार लगा। सिक्किम से लेकर बर्मा तक के नरेश-राजकुमार, हैदराबाद के निजाम, यहां तक कि भोपाल की बेगम भी इस दरबार में शामिल हुईं थी। करीब साल भर की मशक्कत के बाद आसपास के पच्चीस-तीस गांवों को तंबु नगरी और इसके लिए जुटाई जाने वाली सुविधाओं में तब्दील कर दिया गया था।

दरबार की शानो-शौकत क्या रही होगी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस जमाने में करीब 25 वर्ग मील में 233 तंबुओं को लगाया गया था और हर एक तंबू रोशनी से जगमगा रहा था। 85 एकड़ में तो अकेले सम्राट जार्ज पंचम का आशियाना सजा था। हजारों की भीड़ के सामने ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम ने भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की। और फिर शुरू हुई नई राजधानी बनाने की जद्दोजहद। 

कल्पनाओं को मिला आकार: किसी शहर को नए सिरे से बनाना, बसाना और सजाना किसी चुनौती से कम नहीं है, लेकिन राजधानी को बनाने वालों ने अपनी कल्पनाओं को बड़ी ही खूबसूरती से आकार दिया और लुटियन दिल्ली को बसाया। स्वपना लिडले अपनी पुस्तक कनाट प्लेस में लिखती हैं कि जब नई दिल्ली का आर्किटेक्चर तैयार किया जा रहा था तब शिल्पकारों के मन में इस बात को लेकर काफी संशय था कि शकर कैसा होगा। क्योंकि एडवर्ड लुटियन और हरबर्ट बेकर के सामने निश्चित ही शाहजहांनाबाद का माडल भी था। उस समय ब्रिटेन में गार्डन सिटी काफी प्रचलित था। गार्डन सिटी के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। दरअसल, गार्डन सिटी का विचार अर्बन प्लानर सर एबेनेजर हावर्ड ने अपनी किताब गार्डन सिटी आफ टुमारो में दिया था। यह किताब 1902 में प्रकाशित हुई थी। हावर्ड ने लगातार बढ़ रहे शहरीकरण को देखते हुए गार्डन सिटी का विचार दिया। लुटियन को नई दिल्ली के वास्तुशिल्प का जिम्मा सौंपा गया। लुटियन खुद हैंपस्टेड में सेंट्रल स्कवायर से भी जुड़े रहे थे। यह एक निजी कंपनी द्वारा बनाई गई गार्डन सिटी थी।

इमारतों की ऊंचाइयों भी रखा गया ख्याल: वास्तुकार एके जैन कहते हैं कि इंडिया गेट और गवर्नमेंट कांपलेक्स को छोड़ दें तो कोई भी इमारत 50 फीट से ऊंची नहीं थी। अंग्रेजों ने बहुमंजिला इमारत बनाई ही नहीं। क्योंकि वो गार्डन सिटी बना रहे थे। पेड़ की ऊंचाई 50 फीट होती है। इसलिए नई दिल्ली की इमारतें इसके मुकाबले कम ऊंचाई की ही रखी गईं। लेकिन बगीचे का आभास देने वाले एक शहर को पत्थरों और सड़कों के किनारे खालीपन के सहारे भी तो नहीं छोड़ा जा सकता था। लिहाजा मार्गों के किनारे हरे भरे वृक्ष लगाए गए। काफी मशक्कत के बाद 13 तरह के वृक्षों का चयन हुआ। इनमें से आठ प्रजातियों (जामुन, नीम, अजरुन, पीपल और इमली आदि थे) के पौधे सर्वाधिक लगाए गए। इसके अलावा, एक आयातित प्रजाति (अफ्रीकी सॉसेज पेड़) भी लगाया गया।

पौधों को लगाने में भी सूझबूझ का परिचय: गवर्नमेंट कांपलेक्स (राष्ट्रपति भवन) सचिवालय और न्यायालयों जैसे महत्वपूर्ण सरकारी भवनों तक के आसपास समान प्रजातियों के पेड़ों के लगने और उनके बड़े होने की बात पर ध्यान दिया गया। बड़े पौधों को महत्वपूर्ण भवनों की ओर जाने वाले रास्तों पर लगाया गया, जबकि तत्कालीन सरकारी अंग्रेजी अधिकारियों के आवास के लिए बने बंगलों की तरफ जाने वाली सड़कों पर दूसरी तरह के पेड़ लगाए गए। चौक चौराहों पर फूल लगाए गए। साल 1919-20 में सड़क मार्गों के बीच पौधारोपण का काम शुरू हुआ। सचिवालय के उद्घाटन (1931) के समय तक लुटियन की योजनाओं के अनुरूप ये पौधे बड़े होकर अच्छे-खासे पेड़ों का रूप ले चुके थे। समय के साथ हरियाली क्षेत्र में धीरे-धीरे बढ़ोतरी होती गई। य