जानिए क्यों जरूरी है मजदूर दिवस की राजनीति करने वालों की हार

 

बंगाल में एक चुनावी रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फाइल

अर्थव्यवस्था के लिए सही फैसले राजनीतिक रूप से गलत होते हैं और राजनीतिक रूप से सही फैसले आर्थिक रूप से नुकसानदेह होते हैं। इसी डर के कारण आर्थिक सुधार के रास्ते पर तीन दशक की यात्र के बाद भी लगता है कि इसका फैसला बाकी है।

 प्रथम दृष्टि और पयला बोइसाख के बाद पयला मे भी बंगालियों के बहुत करीब है। औद्योगिक उत्पादन में देश का सितारा कहे जाने वाले इस राज्य के दशकों से बंद पड़े हजारों कारखाने पयला मे यानी मजदूर दिवस की दशकों तक चली राजनीति के असर की खामोश गवाही दे रहे हैं। इस राजनीति के सहारे सत्ता में आए वाम मोर्चा के 34 वर्ष के शासन को मां, माटी और मानुष के नाम पर उखाड़कर सत्ता में आई ममता बनर्जी भी सिंगूर में टाटा के नैनो कारखाने के विनाश के बाद ही 2011 में कुर्सी पर काबिज हुईं।

अब एक दशक के शासन के बाद जब वे बंगाली अस्मिता के नाम पर वोटरों के सामने अपनी वापसी की गुहार लगा रही हैं, ऐसे में मतदाताओं के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विराट व्यक्तित्व और उनकी साहसिक नीतियां हैं। एक तरफ भाइपो हैं तो दूसरी तरफ राज्य की पूरी जनता। एक तरफ कोयला और गाय तस्करी है, तो दूसरी तरफ साफ स्लेट। एक तरफ वे हमारा क्या बिगाड़ लेंगे की हुंकार है तो दूसरी तरफ लखो सोनार बांग्ला है।

यह संयोग है कि इस बार असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के साथ बंगाल के चुनाव नतीजे दो मई को आ रहे हैं। पयला मे के ठीक एक दिन बाद। सवाल है कि बंगाल की जनता मजदूर दिवस की विध्वंसक राजनीति का जवाब देने वाले राजनीतिक दल के सिर जीत का सेहरा बांधकर दो मई को उद्यमिता दिवस मनाने का मार्ग प्रशस्त करेगी? जय श्रीराम और जय बांग्ला के चुनावी शोर में भी निजीकरण के विरोध की आवाजें साफ सुनाई दे रही हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानून विरोधी आंदोलन और विधानसभा चुनाव प्रचार के बीच कई बार यह स्पष्ट कर दिया है कि देश अब निजीकरण के मार्ग पर चलेगा।

इस साल के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इसका खाका साफ कर दिया है। इंटरनेट मीडिया पर यह भारत सरकार का बजट है या किसी कंपनी का सेल ऑफर जैसी टिप्पणी के जरिये कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दल भले ही कुछ लाइक्स बटोर लें, लेकिन हकीकत है कि देश सरकारी कंपनियों के निजीकरण की ओर आगे बढ़ रहा है और यही सही रास्ता है। वामपंथी प्रभाव में पूंजी को और पूंजीपति को गाली देने वाला यह देश वहां से बहुत आगे निकल चुका है।

हैरानी तो तब होती है जब भाजपा के विरोध के नाम पर निजीकरण की आलोचना करने वाली कांग्रेस यह भूल जाती है कि तीन दशक पहले इस रास्ते पर पहला कदम उनकी ही पार्टी ने उठाया था। नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री के रूप में देश में उदारीकरण और निजीकरण का बीज बोने वाले मनमोहन सिंह भले ही आगे चलकर जब प्रधानमंत्री बने तो वामपंथियों के प्रभाव में उस रास्ते से भटक गए। लेकिन सोनिया गांधी के आíथक सलाहकारों में ऐसे लोग भरे थे, जो निजीकरण तो क्या उद्योगपतियों के नाम भर से नाक-भौं सिकोड़ते हैं। अब जबकि उनके प्रेरक और पोषक देशों में साम्यवाद खत्म हो चुका है, लेकिन यहां के वामपंथी सिर्फ एक राज्य में सिमट जाने के बावजूद सुधरने के लिए तैयार नहीं हैं। कांग्रेस का उद्यमी विरोध तो सरासर पाखंड लगता है। इसी पाखंड को छिपाने के लिए वह भाजपा पर हिंदुत्ववादी होने का आरोप मढ़ती है। यह पाखंड उस जमाने में तो चलता था जब पंचवर्षीय योजना का दौर था। दिन में उद्योगपतियों को गाली देना और रात को उनके गले में बाहें डालकर जश्न मनाना।

उस दौर में सरकारी उपक्रमों को आधुनिक भारत का मंदिर माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे ये उपक्रम राजनेताओं और नौकरशाही के दोहन का केंद्र बनकर रह गए। सरकार का काम होटल चलाना नहीं है, यह पिछले कई दशकों से कहा जा रहा था, पर इसे सही मायने में लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखाई है। यही नहीं, वे संसद में और उसके बाहर लगातार अपने संबोधनों में इसका उल्लेख कर रहे हैं। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि साम्यवाद के प्रभाव में मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाने के कारण हम न इधर के रहे न उधर के। न तो हमारा घरेलू बाजार इतना उत्पादक और स्पर्धी बन पाया कि देश निर्यात में महारत हासिल कर सके और न ही हम आयात पर निर्भरता कम कर पाए। पिछले तीन दशक के उदारीकरण और निजीकरण से मिले फायदों पर भविष्य का निर्माण करने का सही समय आ गया है।

कांग्रेस के वंशवाद और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर यह सरकार पहली बार सत्ता में आई। अब लगभग 73 साल के शासन के बाद और जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म करने जैसे राजनीतिक एवं तीन तलाक व राम मंदिर जैसे न्यायिक दृष्टि के कई कठिन फैसलों से गुजरने के बाद यह सरकार निजीकरण को सही में लागू करने के लिए तैयार है। वैसे भी, बीच का कोई रास्ता नहीं होता है। देश उस पर चलकर नतीजा देख चुका है। अब जबकि देश रक्षा उत्पादन के निर्यात के रास्ते पर चलते हुए आत्मनिर्भर हो रहा है, इस कदम को रोकने के बाद यही कहने को रह जाएगा- वि मिस्ड द बस अगेन।