बंगाल में भाजपा की बढ़ती ताकत से परेशान ममता के लिए झामुमो बना नई मुसीबत

 


झारखंड से सटे बंगाल के झाड़ग्राम में 28 जनवरी को एक जनसभा को संबोधित करते हेमंत सोरेन। फाइल

 झारखंड में सत्ता हासिल करने की रेस में भाजपा को पछाड़ने के बाद झामुमो अपने दायरे का विस्तार करना चाहता है। विभिन्न राज्यों में सत्ता हासिल करने वाली क्षेत्रीय पार्टयिां भी ऐसी कवायद करती रही हैं।

रांची, बंगाल में भाजपा की बढ़ती ताकत से पहले से ही परेशान सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) नई मुसीबत बन सकता है। झामुमो ने रैली कर अपने इरादे साफ कर दिए हैं कि वह आसन्न विधानसभा चुनाव में झारखंड से सटी आदिवासी बहुल सीटों पर पूरे दमखम से ताल ठोकने जा रही है। ममता इससे खिन्न भी हैं और उन्होंने अपने ही अंदाज में हमला करते हुए पूछ भी लिया है, कौन हैं ये लोग? पांच साल तक तो किसी को आदिवासियों की चिंता नहीं सताती। अब आ रहे हैं चुनाव लड़ने। वैसे उन्होंने यह भी कहा कि वह तो खुद हेमंत के शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें आशीर्वाद देने गई थीं। इसका असर भी दिखा।

बेशक, झामुमो संगठन की तरफ से ममता बनर्जी को तीखा जवाब दिया गया, लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस पर बेहद सधी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, झामुमो और तृणमूल कांग्रेस की विचारधारा एक है, हमारा मकसद सांप्रदायिक भाजपा को रोकना है। मतलब उन्होंने अभी रास्ते खुले रखे हैं। अगर चुनाव पूर्व कोई गठबंधन आकार लेता है और झामुमो को उसमें उचित हिस्सेदारी मिलती है तो उन्हें ममता के साथ मिलकर चुनाव लड़ने में कोई गुरेज नहीं है।

बंगाल विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नजर है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की चौतरफा घेराबंदी के बीच बंगाल में झारखंड की राजनीति का भी सीधा प्रभाव पड़ रहा है। सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा चुनाव में पूरी दिलचस्पी दिखा रही है। इससे ममता बनर्जी नाराज हैं। दरअसल झारखंड की सीमा से सटे पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा, पुरुलिया, मिदनापुर, वीरभूम आदि जिलों में आदिवासी समुदाय की अच्छी-खासी आबादी है। झारखंड मुक्ति मोर्चा का इन क्षेत्रों में तब से प्रभाव रहा है, जब अलग झारखंड राज्य के लिए आंदोलन चरम पर था।

इन इलाकों के अलावा ओडिशा और छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके वृहद झारखंड की अवधारणा का हिस्सा रहे हैं। हालांकि इस मांग को अव्यावहारिक होने का तर्क देकर नकारा जा चुका है, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के एजेंडे में अभी भी वृहद झारखंड है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन इसके पीछे राजनीतिक वजह भी गिनाते हैं। उनका तर्क है कि हर संगठन को विस्तार करने का अधिकार है और बंगाल के कई इलाकों में झामुमो का जनाधार है। वैसे हेमंत सोरेन और ममता बनर्जी के बीच बेहतर राजनीतिक ताल्लुकात हैं, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा बंगाल विधानसभा उपचुनाव में पूरे दमखम से उतरने की तैयारी में है। इसकी शुरुआत झाड़ग्राम की रैली से हो चुकी है।

वैसे ममता बनर्जी के तल्खी भरे सवाल के बाद हेमंत सोरेन ने नरमी दिखाते हुए कहा है कि हमारी विचारधारा एक है और हम भाजपा से लड़ रहे हैं। बेशक, झामुमो 60-65 सीटों पर दावेदारी कर रही है, लेकिन 15 से 20 ऐसी सीटें हैं, जहां वह गंभीरता से चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। झारखंड की सीमा से सटे इन इलाकों में ममता बनर्जी की कड़ी परीक्षा होगी, क्योंकि उनसे बगावत कर भाजपा में शामिल होने वाले सुवेंदु अधिकारी का आधार भी इन्हीं क्षेत्रों में है। वह यह कभी नहीं चाहेंगी कि यहां मतों का बंटवारा हो। बावजूद इसके ममता बनर्जी गठबंधन के लिए तैयार होंगी और झामुमो को मनमुताबिक सीटें देंगी, इसके आसार कम ही हैं। उनके तेवर कड़े हैं। बीती 28 जनवरी को जब झाड़ग्राम में हेमंत सोरेन सभा कर रहे थे तो कोलकाता में ममता बनर्जी हिंदी भाषी समर्थकों की एक सभा को संबोधित कर रही थीं। उस दौरान उन्होंने हेमंत सोरेन को निशाने पर लेते हुए उन्हें इस संबंध में नसीहत भी दी थी।

संकेत स्पष्ट है कि झामुमो बंगाल के अपने आधार क्षेत्र में गंभीरता से चुनाव लड़ना चाहता है। अगर तालमेल की नौबत आई तो उसका झुकाव तृणमूल की तरफ होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव में मजबूत भागीदारी की तैयारी है। यह संकेत उन राज्यों के लिए भी है, जहां आदिवासी मतदाताओं की तादाद अधिक है। हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने राजद से समझौते की पहल की थी। राजद द्वारा प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद झामुमो ने हथियार नहीं डाले और एक दर्जन से ज्यादा सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए थे। यही फार्मूला बंगाल के लिए भी है। झारखंड में सत्ता हासिल करने की रेस में भाजपा को पछाड़ने के बाद झामुमो अपने दायरे का विस्तार करना चाहता है। विभिन्न राज्यों में सत्ता हासिल करने वाली क्षेत्रीय पार्टयिां भी ऐसी कवायद करती रही हैं।