प्रजापति की पितृ दूत से दोस्ती, वृद्धावस्था पेंशन से कौओं को दे रहे दाना-पानी; पुण्य के साथ संरक्षण का भी प्रयास

 

पत्थलगडा (चतरा)। पौराणिक मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में कौए दिवंगत परिजनों के हिस्से का खाना खाते हैं, तो पितरों को शांति मिलती है और उनकी तृप्ति होती है। उसी पौराणिक मान्यता को शुक्र प्रजापति सालों से आत्मसात कर रहे हैं। अपने पितरों को शांति के लिए वे हर दिन कौवों को दाना-पानी कराते हैं। अस्सी वर्षीय शुक्र प्रजापति चतरा जिले के पत्थलगडा प्रखंड के बरवाडीह गांव के रहने वाले हैं। कौओं से उन्हें खूब प्रेम है।

अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं, वृद्धावस्था पेंशन के रूप में मिलने वाली राशि से शुक्र कौवों के दाने-पानी का इंतजाम करते हैं। इस कार्य में घर के सदस्य उन्हें सहयोग करते हैं। शुक्र प्रजापति की दिनचर्या में कौओं के लिए सुबह-सबेरे दाना-पानी की व्यवस्था करना शामिल है। या यूं कहें कि उनकी दिनचर्या की शुरुआत इसी से होती है। यह सिलसिला सालों से चला आ रहा है। सुबह होते घर के बाहर निकलते हैं और कौओं को दाना डालते हैं। सूर्य की किरण निकलते ही घर के बाहर कौए कांव-कांव की गुहार लगाना शुरू कर देते हैं।

पूरी झुंड होती है, जिसमें कौए की कम से कम सौ से डेढ़ सौ की संख्या होती है। पितृ दूत से उनकी अनूठी दोस्ती की चर्चा गांव में सालों से है। मनुष्य से दूर भागने वाले ये कौए शुक्र के दोस्त बन गए हैं। वह बताते हैं कि जब तब वह सुबह को घर से बाहर नहीं निकलते हैं, तब कौए आस-पास मंडराते रहते हैं। घर के बाहर आते ही कौए झूम जाते हैं और चारों ओर उनकी आवाज गूंजने लगती है। कौओं को गेहूं, मक्का का दर्रा, चूड़ा आदि सूखा दाना खाने के लिए आसपास में छिटकर देते हैं।                

जब तक कौवों को शुक्र द्वारा दाना नहीं दिया जाता है, तब तक वे इसकी आस में बिजली की तार पर बैठे रहते हैं। शुक्र कहते हैं कि वृद्धावस्था पेंशन के रूप में मिलने वाली राशि से वह उनके लिए खाद्य सामग्री का इंतजाम करते हैं। इससे उनके मन को शांति मिलती है। कौए पितृ दूत है। उसे भोजन कराना चाहिए। मुझे लगता है कि मेरा पितरों से सीधा संपर्क हो जाता है। आजकल कौओं की संख्या लगातार कम हो रही है। अगर उन्हें उपयुक्त वातावरण व इस तरह दाना-पानी मिलता रहेगा, तो उनकी संख्या भी बढ़ेगी, पूर्वजों के वाहक के रूप में प्रचलित ये कौए बने रहेंगे।