पुतिन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को हवा देने में यूएस भी शामिल, फिर बन सकता है दुश्‍मन नंबर वन!

 

पुतिन के खिलाफ बढ़ गए हैं विरोध प्रदर्शन

अगस्‍त 2020 के बाद से ही रूसी राष्‍ट्रपति पुतिन के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में तेजी देखने को मिली है। यूं तो ये प्रदर्शन विपक्षी नेता एलेक्‍सी नवलनी के समर्थन में हो रहे हैं लेकिन विशेषज्ञ इसके पीछे कुछ और वजह भी मान रहे हैं।

नई दिल्‍ली (ऑनलाइल डेस्‍क)। बीते कुछ माह से रूस में शुरू हुई राजनीति की जंग को लेकर दुनिया के कई देश बयानबाजी कर रहे हैं। वहां के विपक्षी नेता एलेक्‍सी नवलनी को सजा दिए जाने और उनके समर्थन में होने वाले विरोध प्रदर्शनों को बल पूर्वक दबाने के लिए राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन की कड़ी आलोचना भी हो रही है। ऐसे में दो सवाल बेहद खास हैं जिनका जवाब जानना जरूरी है। इनमें पहला सवाल है कि इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे की सच्‍चाई क्‍या है। दूसरा सवाल है कि क्‍या इन विरोध प्रदर्शनों को हवा देने में बाहरी ताकतों का भी हाथ हो सकता है।

क्‍या कहते हैं विशेषज्ञ 

इस बारे में जवाहललाल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्‍टडीज की प्रमुख अर्चना उपाध्‍याय का साफतौर पर कहना है कि पुतिन के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों को बाहरी देशों से हवा दी जा रही है। उन्‍हें इस बात की आशंका दिखाई देती है कि इन विरोध प्रदर्शनों को ये देश न सिर्फ हवा दे रहे हैं बल्कि कहीं न कहीं इसकी फंडिंग भी ये कर रहे हैं। उनके मुताबिक इसमें कहीं न कहीं अमेरिका भी शामिल हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि पुतिन को कहीं न कहीं ट्रंप समर्थक या प्रो-ट्रंप माना जाता था। 2016 के अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव में कहा जाता है कि रूसी हैकर्स की उन्‍हें जिताने में एक अहम भूमिका रही थी। वहीं अब डेमोक्रेट के आने के बाद माना जा रहा है कि रूस एक बार फिर से अमेरिका के लिए उसका दुश्‍मन नंबर वन बन कर उभर सकता है। इसलिए इस तरह के विरोध प्रदर्शनों हवा दी जा रही है।

विरोध प्रदर्शनों में जो पश्चिमी देश शामिल 

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प्रोफेसर उपाध्‍याय मानती हैं कि उनके खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों में जो पश्चिमी देश शामिल हैं उनमें भी इसको लेकर कहीं न कहीं मतभेद साफतौर पर उभर कर सामने आ रहे हैं। रूस का सबसे अधिकारी व्‍यापारिक साझेदारी वाला देश जर्मनी है। जर्मनी भी कई बार उनके खिलाफ बयानबाजी कर चुका है। इसके बाद भी बीते कुछ माह के दौरान दोनों के बीच साझेदारी और अधिक मजबूत हुई है। वहीं कुछ अन्‍य पश्चिमी देश जो इस तरह के विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करते हुए पुतिन के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं और उनके खिलाफ प्रतिबंध लगाने की वकालत कर रहे हैं वो भी पिछले दरवाजे से अपनी व्‍यापारिक साझेदारी को व्‍यक्तिगततौर पर मजबूती देने में लगे हैं। यूरोपीय संघ और रूस के बीच भी व्‍यापारिक साझेदारी काफी मजबूत है।

रूस के लिए प्रतिबंध फायदे का सौदा 

जेएनयू प्रोफेसर के मुताबिक यदि यूरोपीय संघ रूस पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध लगाता है तो इसका उनको ही नुकसान होगा। बीते कुछ समय में जब से एलेक्‍सी नवलनी का मामला सामने आया है और पश्चिमी देशों ने रूस के प्रति कड़ा रुख अपनाया है, रूस से इस दौर को अपने फायदे में बखूबी किया है। इस दौरान रूस ने अपनी इनहाउस बिजनेस और मैन्‍यूफैक्‍चरिंग को बढ़ाया है। इतना ही नहीं वहां के व्‍यापारियों में अब ये बात उभरने लगी है कि ईयू का प्रतिबंध उनके लिए फायदे का सौदा हो सकता है। ऐसे में रूस भी ईयू की बयानबाजी की तरफ कोई ध्‍यान नहीं दे रहा है।

नहीं पड़ेगा पुतिन पर कोई असर 

ये पूछे जाने पर कि इन विरोध प्रदर्शनों का क्‍या पुतिन की राजनीति और उनके भविष्‍य पर कोई असर पड़ेगा, तो उन्होंने इससे साफ इनकार किया है। उनका कहना है कि एलेक्‍सी नवलनी के चलते इस तरह के प्रदर्शन कई बार हो चुके हैं। उनका ये भी कहना है कि कुछ समय तक मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के बाद नवलनी अचानक लंबे समय के लिए गायब हो जाते हैं। जहां तक पुतिन की सत्‍ता पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव की बात है तो वहां का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है। वहां पर पुतिन के खिलाफ अवश्विास प्रस्‍ताव लाने का कोई नियम नहीं है। इसलिए जब तक वो राष्‍ट्रपति हैं और दोबारा चुनाव का समय नहीं आता है तब तक उनके ऊपर इस तरह के विरोध प्रदर्शनों का कोई असर नहीं पड़ने वाला है।

विपक्षी नेता एलेक्‍सी नवनली 

प्रोफेसर उपाध्‍याय का कहना है कि वर्ष 2012 के बाद जब पुतिन दोबारा सत्‍ता पर काबिज हुए थे तब से ही उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में तेजी देखने को मिली है। पिछले वर्ष अगस्‍त से इसमें और तेजी देखी गई है। उस वक्‍त इसकी शुरुआत रूस के प्रमुख विपक्षी नेता एलेक्‍सी नवलनी को जहर देने की घटना से हुई थी। उन्‍हें उस वक्‍त जहर दिया गया था जब वो साइबेरिया से वापस आ रहे थे। विमान में उनकी तबियत खराब होने के बाद उन्‍हें वहीं के ही एक स्‍थानीय अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। इसके बाद बने अंतरराष्‍ट्रीय दबाव के चलते उन्‍हें विशेष विमान जर्मनी के चेरिटेबल अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। यहां पर करीब एक माह तक कोमा और फिर आईसीयू में रहने के बाद अब वो रूस वापस आने के बाद पुलिस की गिरफ्त में हैं और उन्‍हें तीन वर्ष की सजा का एलान किया गया है। इस बीच रूस में सड़कों पर उनके समर्थकों द्वारा उनकी रिहाई को लेकर विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है।