मध्य प्रदेश : पीपल का प्राचीन पेड़ जल जाने से घोंसले जले तो अपने ही आवास से चले गए गिद्घराज

 

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित सैकड़ों साल पुराने गिद्घगढ़ में अब नहीं बचा एक भी गिद्घ
वर्ष 2018 तक यहां पीपल के वर्षो पुराने विशालकाय पांच पेड़ बचे थे जिन पर गिद्घों के आवास थे। सरकार ने संरक्षण के लिए गिद्घगढ़ को पायलट प्रोजेक्ट में शामिल किया और यहां गिद्घों की निगरानी शुरू हुई।

भोपाल। कहते हैं यदि रहवास में आग लग जाती है तो फिर पक्षी उस रहवास या आसपास के इलाके में वापस नहीं आते हैं। उन्हें वहां अपना आशियाना बर्बाद होने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसा ही मध्य प्रदेश के गिद्घगढ़ में हुआ। जैसा नाम, वैसा ही यहां गिद्घों का गढ़ था। दो साल पहले पीपल का एक पेड़ पूरी तरह जल गया। गिद्घों के करीब दस घोंसले भी आग में जलकर खत्म हो गए। इस घटना के बाद से ही गिद्घगढ़ में गिद्घ दिखना बंद हो गए। अन्य चार पेड़ों पर भी गिद्घों का बसेरा था, वे भी अब वीरान हो गए हैं। गिद्घगढ़ भोपाल से 30 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के बालमपुर से लगा हुआ गांव है। सैकड़ों साल से यहां पीपल के पेड़ों पर बड़ी संख्या में गिद्घों के आवास हुआ करते थे। साल दर साल गांव में आबादी के साथ खेती का रकबा बढ़ता गया और पीपल व अन्य प्रजाति के बड़े पेड़ कम होते चले गए।

वर्ष 2018 तक यहां पीपल के वर्षो पुराने विशालकाय पांच पेड़ बचे थे, जिन पर गिद्घों के आवास थे। सरकार ने संरक्षण के लिए गिद्घगढ़ को पायलट प्रोजेक्ट में शामिल किया और यहां गिद्घों की निगरानी शुरू हुई। गांव के 75 वर्षीय बाला प्रसाद बताते हैं कि यहां पेड़ों पर हजारों गिद्घ रहते थे। वर्ष 2019 में यहां हुई एक घटना के बाद गिद्घराज अब इस गांव से मुंह मोड़ चुके हैं। उस साल खेतों की नरवाई जलाने के कारण पीपल का एक पेड़ पूरी तरह जल जाने से सारे घोंसले जल गए थे। अब पिछले एक साल से गांव में बचे पीपल के चार पेड़ों पर एक भी गिद्घ दिखाई नहीं दिया।

अब वापस रहवास बनाना मुश्किल

खान प्रदेश के जाने-माने गिद्घ विशेषज्ञ दिलशेर खान बताते हैं, पशुओं को डाइक्लोफेनिक दवा देने और फसलों में कीटनाशक दवा के उपयोग से वर्ष 1990 के आसपास देश में गिद्घों की करीब 95 फीसद आबादी खत्म हो चुकी थी। तब से ही इनके मूल आवास क्षेत्रों में संरक्षण का कार्यक्रम शुरू हुआ। गिद्घगढ़ के पीपल के पेड़ों पर उस दौरान भी व्हाइट लंब बैक वल्चर प्रजाति के गिद्घ बहुतायत में पाए जाते थे। संभव है पेड़ के आग में जलने के कारण गिद्घगढ़ से गिद्घ पलायन कर गए। यदि ऐसा है तो अब उनका यहां वापस रहवास बनाना मुश्किल होगा। पहले भी चुकी ही हैं ऐसी घटनाएं दिलशेर खान के अनुसार बीते साल फरवरी में मध्य प्रदेश के ओरछा में एक आयोजन के कारण कुछ स्थानों से गिद्घों के घोंसले हटा दिए गए थे। अब पिछले एक साल में एक भी गिद्घ वापस नहीं आया। इसी तरह मध्य प्रदेश के ही सतना में रामनगर के गिद्घकूट पहाड़ पर स्थित कई विशालकाय पेड़ करीब दस पहले तेज आंधी में धराशायी हो गए थे। वहां से भी गिद्घ पलायन कर गए थे, जिनकी अब बमुश्किल बसाहट संभव हुई है।

किसानों को दिया जाना चाहिए मुआवजा

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) के रोहन भी गिद्घगढ़ के गिद्घों की निगरानी के काम में जुटे हैं। उन्होंने बताया जिन पेड़ों पर गिद्घ रहते हैं, उसके नीचे की जमीन पर किसी प्रकार की खेती नहीं हो सकती। इसलिए सरकार को चाहिए कि ऐसे किसानों को कुछ मुआवजा राशि का प्रविधान किया जाए। ऐसी व्यवस्था गुजरात में है। तभी किसान गिद्घ संरक्षण को महत्व देंगे।