संवेदनाओं पर असंवेदनशील हमला, मनुष्य के भावुक हो जाने में कोई बुराई नहीं

मानवीय सभ्यता के लंबे इतिहास में संवेदनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

किसी संवेदनशील मनुष्य के भावुक हो जाने में कोई बुराई नहीं लेकिन उसका उपहास उड़ाना अत्यंत शर्मनाक है। मानवीय सभ्यता के लंबे इतिहास में आदिम से आधुनिक होने की हमारी लंबी यात्र में संवेदनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

नई दिल्ली। किसी बात पर हंसना-रोना, भावुक हो जाना, प्रतिक्रिया देना मनुष्य होने का लक्षण है। मानवीय सभ्यता के लंबे इतिहास में आदिम से आधुनिक होने की हमारी लंबी यात्र में संवेदनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अपनी भावनाओं पर कभी-कभी काबू न होने के कारण हम रुंधे हुए गले को देखते हैं तो कभी अश्रुधारा को। बीते दिनों वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद का राज्यसभा में कार्यकाल खत्म होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदाई भाषण के दौरान अपने निजी अनुभव साझा कर रहे थे। उन्होंने पुरानी याद साझा करते हुए बताया कि कैसे एक आतंकवादी हमले में गुजरात के कुछ नागरिक जम्मू-कश्मीर में मारे गए और उनके शवों को वापस गुजरात पहुंचाने में आजाद ने जो संवेदनशील नेता होने का परिचय दिया था, वह अद्भुत था। उस घटना ने यह सिद्ध किया कि वह एक संवेदनशील मनुष्य भी हैं। यह घटना तब की है जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। विदाई के दौरान ऐसे क्षण को याद कर वह भावुक हो गए। उनका गला भर आया और थोड़े विराम के पश्चात प्रधानमंत्री ने पुन: बोलना प्रारंभ किया।

घटना बस इतनी सी है और इसके पश्चात इंटरनेट मीडिया पर इसे लेकर हंसी-मजाक और चुटकुलों की भरमार लग गई। प्रधानमंत्री को निशाना बनाया जाने लगा। उनका मजाक उड़ाने की भद्दी कोशिश की गई। अपने प्रधानमंत्री को झूठा साबित करने का विपक्षी राग कोई नया नहीं है और इसके लिए उन्होंने पहले भी कई उपमाएं गढ़ी हैं, परंतु विरोध करने के नाम पर विरोधियों द्वारा किसी की संवेदनाओं का ऐसा मजाक बनाना उन्हें निहायत असंवेदनशील सिद्ध करता है। एक संवेदनशील मनुष्य के भावुक हो जाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उसकी भावुकता का मजाक बनाना निहायत शर्मनाक है। बात इतनी ही नहीं। यहां तक कहा गया कि कोई आश्चर्य नहीं कि आजाद की तारीफ कर उन्हें रातोंरात भाजपा में शामिल करने का यह नाटकीय प्रयास था। जबकि प्रधानमंत्री आजाद जैसे शीर्ष नेता के व्यापक अनुभव का कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए उपयोग करने की बात कर रहे थे।

संवेदनाओं ने हमें मनुष्य बनाया है। हम चाहे किसी भी पद पर हों, संवेदनशीलता हमारे अंदर रहेगी। एक व्यक्ति होने के कारण हमने एक लंबे समय के पश्चात जिसे अर्जति किया है उसका भद्दा मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए। अन्यथा यह मानवता का मजाक उड़ाना होगा। यदि हम अपने लोकतंत्र को और अधिक मजबूत और स्वस्थ करना चाहते हैं तो सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष को भी मुद्दों पर केंद्रित होकर बहस और विमर्श की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा। ऐसे में छिछले आरोप लगाकर लोकतंत्र व मानवता पर आघात करने से बचना चाहिए।