मिलिए कुछ उभरते हुए RJ से और उन्हीं से जानें उनके जुनून की कहानी...

 

इस वर्ष की थीम है, 'न्यू वल्र्ड, न्यू रेडियो (इवोल्यूशन, इनोवेशन ऐंड कनेक्शन)' ।

स्पेन रेडियो एकेडमी ने पहली बार 2010 में विश्व रेडियो दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था। उसके बाद 2011 में यूनेस्को की महासभा के 36वें सत्र में हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने की घोषणा हुई।

सूचना के आदान-प्रदान, लोगों को शिक्षित व जागरूक करने, उनका मनोरंजन करने से लेकर बच्चों, किशोरों एवं युवाओं को अपनी बात कहने का एक मंच दिया है एफएम रेडियो ने। कई बार यह उनका दोस्त, साथी एवं राजदार भी बन जाता है। यहां वे बेझिझक अपने मन एवं दिल की बातें रेडियो जॉकी (आरजे) से साझा कर लेते हैं। तभी तो फिल्मी सितारों की तरह रेडियो जॉकी भी किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं माने जा रहे। वे युवाओं में जुनून एवं आत्मविश्वास भी भर रहे हैं। आज विश्व रेडियो दिवस के अवसर पर मिलते हैं कुछ चुनिंदा एवं उभरते हुए आरजे से...

अपने पैशन एवं सपने को पूरा करने के लिए मुंगेर (बिहार) से जयपुर (राजस्थान) औऱ फिर अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश ) तक का सफर पूरा किया है आरजे स्वतंत्र ने। एक समय था जब वह शिक्षण के पेशे से जुड़े थे। वहां मन नहीं लगा, तो अच्छी सैलरी वाली वह नौकरी छोड़ निकल पड़े अपने सपने को जीने के लिए। इसके लिए परिवार में इनका विरोध भी हुआ। लेकिन उन्होंने तो ठान लिया था। ‘माई एफएम’ रेडियो में एक साल की इंटर्नशिप के बाद अगले दो साल ‘रेडियो नोएडा लोकमंच’ में काम किया। साथ ही, कॉमर्शियल रेडियो में नौकरी की कोशिशें जारी रहीं। लेकिन जब कोई मौका नहीं मिला, तो कुछ वर्ष टीवी इंडस्ट्री में बिताने के बाद फिर से कोशिश शुरू की। आखिरकार अलीगढ़ स्थित ‘रेडियो करेंट’में आरजे बनने का अवसर मिला। बीते दो वर्षों से यहां कार्यरत हैं। स्‍वतंत्र बताते हैं,‘ 2008 के आसपास जब आरजे को लेकर उतना क्रेज नहीं था, तब जयपुर में मैं आरजे कार्तिक, आरजे पुनीत, आरजे मोहित को सुना करता था। उन्हीं से मुझे प्रेरणा मिली। मैंने रेडियो जॉकी बनना तय किया। अब मेरा वह सपना पूरा हुआ है। रेडियो में एक बंद दरवाजे के भीतर अकेले बात करनी होती है, जिसका अपना मजा है। सुनने वाले को भी यह एहसास होता है कि उससे ही बात की जा रही है। वैसे, रेडियो में आने का अपना संघर्ष है। मेहनत से ही कुछ मिलता है यहां। अपनी आवाज पर काम करना होता है। उसमें स्पष्टता होनी चाहिए। इसके लिए मैं नियमित योग-प्राणायाम (भ्रामरी प्राणायाम, ऊं का उच्चारण) करता हूं।‘ स्वतंत्र बॉलीवुड से जुड़े शोज करते हैं। एक शो 1990 के दशक के गीतों पर आधारित है। इसमें गानों के ऊपर पूरी चर्चा होती है कि उन्हें किसने लिखा, किसने स्वरबद्ध किया। किस एक्टर पर फिल्माया गया...आदि आदि। इनकी मानें, तो काफी पढ़ना और रिसर्च करना पड़ता है।

अनाथाश्रम से निकल रेडियो में बनाया मुकाम

‘रेड एफएम’ के आरजे रफीक को बचपन से रेडियो सुनने,टीवी देखने का शौक था। घर पर टीवी नहीं था, तो रेडियो सुना करते थे। कश्मीर में उस समय खबरों के लिए वॉयस ऑफ अमेरिका चलता था। उसके शोज सुनते थे वह। वहीं से रेडियो की दुनिया को जानने की तड़प हुई। लेकिन अचानक पिताजी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु होने के कारण उन्हें अनाथाश्रम भेज दिया गया। वहीं वह बड़े हुए। बताते हैं रफीक, ‘हम दूर-दराज के क्षेत्रों से आते थे। वहां बहुत-सी पाबंदियां होती थीं, लेकिन पढ़ाई पर जोर दिया जाता था। जब मैं कॉलेज पहुंचा, तो बाहर की दुनिया के बारे में जाना। कॉलेज में ही पहली बार गाने की प्रतियोगिता में भाग लेने के कारण स्टेज पर जाना हुआ। वहां पता चला कि स्टेज के पीछे भी एक भरी-पूरी दुनिया होती है और मेरा स्कोप वहां पर है। वहां से सफर शुरू हुआ। जो शौक बचपन से पाल रहा था, उसको एक रास्ता मिल गया।‘

रफीक उन लोगों की आवाज बनना चाहते थे, जो अनाथाश्रम आदि में जिंदगी जीते हैं। धीरे-धीरे वह शोज होस्ट करने लगे। आकाशवाणी में काम करने लगे। वह कहते हैं,‘एफएम बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म है। कश्मीर में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बहुत से कार्यक्रम होते हैं। मुझे वहां बुलाया जाता है। मैं यूथ से कनेक्ट करता हूं। श्रोताओं की नस को पकड़ कर, उसी पर बात करता हूं। उनके मसलों को सामने लाता हूं। कश्मीर में अब अच्छा माहौल है। इसकी बात करता हूं। गली-मोहल्ले की समस्याओं के बारे में अधिकारियों से बात करता हूं। इसी तरह, आज बॉडी शेमिंग की जितनी बात होती है, उसके खिलाफ अपने शो पर आवाज उठाई है। इसकी भी कश्मीर से काफी अच्छी प्रतिक्रिया आई है।‘ कोविड में जब लोगों की नौकरियां गईं, तो उन्होंने उनसे संपर्क किया। रेडियो के प्लेटफॉर्म से ही उनकी प्रोफाइल बताकर विकल्प पूछते हैं। इससे कई लोगों को नौकरी मिल सकी है। हंदवाडा़ के रहने वाले रफीक 12 से 3 बजे तक 'वेल्लापंथी डॉट कॉम’शो करते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी एक्टिव रहते हैं। जैसे, आजकल पोडकास्ट,ओटीटी, जूम का जमाना है, तो वह शॉर्ट फिल्में भी लिख रहे हैं। वह कहते हैं कि रेडियो उनके रग-रग में बसता है।

देसी अंदाज से बनाई अलग पहचान

एफएम रेडियो पर दो आरजे जब स्थानीय बोली में अपनी जिंदगी से जुड़ी बातें करते थे, तब कुलदीप उसे बहुत ध्यान से सुनते थे। वह उनसे अपनी जिंदगी को रिलेट कर पाते थे। उनका देसीपन, देसी अंदाज अच्छा लगता था। धीरे-धीरे कुलदीप ने खुद से पूछना शुरू किया, क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूं? क्या मैं भी आरजे बन सकता हूं? उन्होंने इसमें दिलचस्पी लेनी शुरू की और एक दिन सीधे ‘रेडियो मिर्ची’ के दफ्तर पहुंच गए। वहां ट्रेनिंग लेने की सलाह दी गई। वह वापस लौटे और जयपुर के एक स्थानीय संस्थान में दाखिला ले लिया।

बताते हैं कुलदीप, ‘मेरी खुशी का तब ठिकाना नहीं रहा, जब इंस्टीट्यूट में मेरे पसंदीदा आरजे फैकल्टी बनकर आए। उनसे काफी इस प्‍लेटफॉर्म की तमाम बारीकियां सीखने को मिलीं। मेरे लिए वे किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं थे।‘ कोर्स करने के बाद भी हालांकि उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन वह थके नहीं और न ही मायूस हुए। आखिर में एक दिन उन्होंने बतौर आरजे रेडियो जयपुर ज्वाइन कर लिया। आज वह यहां दो से तीन प्रोग्राम करते हैं। वह आगे कहते हैं,‘जिंदगी के दो ही पहलू होते हैं-हार या जीत। मैं जल्दी हार नहीं मानता। रेडियो जॉकी की अपनी चुनौतियां हैं। हमें निरंतर खबरों एवं घटनाओं से अपडेट रहना पड़ता है। आवाज के साथ डिक्शन पर काम करना होता है। रिकॉर्डिंग या लाइव जाने से पहले अपनी गलतियों को सुधारना होता है। इसमें शो के प्रोड्यूसर या प्रोग्रामिंग हेड भी गाइड करते हैं।‘ आरजे कुलदीप के अनुसार, जब हम एंकरिंग में स्थानीय बोली को शामिल करते हैं और दिल से कुछ भी कहते हैं, तो वह सीधे श्रोताओं के दिलों को स्पर्श करती है। यही एक आरजे की सफलता होती है। रेडियो हमें हमेशा सीखते रहने के लिए प्रेरित करता है।

पैशन से पूरा हुआ सपना

पंजाब के छोटे से शहर नंगल के शिवम वशिष्ठ को भी बचपन से ही रेडियो सुनना पसंद था और म्यूजिक से गहरा लगाव। अच्छा गाते भी थे,पर स्कूल में ऐसी एक्‍स्‍ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़ को ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी। पैरेंट्स-टीचर्स भी इसे बेकार समझते थे और पढ़ाई पर ध्यान देने को कहते थे। बावजूद इसके उनका एकमात्र सपना था कि नाम के आगे आरजे लिखें। ज्यादा जानकारी नहीं थी। फिर भी लगातार अपने पैशन का पीछा करते रहे। पढ़ाई भी जारी रखी। दिल्ली के दयाल सिंह कॉलेज से इंग्लिश ऑनर्स किया। कॉलेज में ही कैफे में गिटार के साथ छोटे-छोटे म्यूजिक शोज करते थे। ग्रेजुएशन के बाद कई रेडियो स्टेशन को अपनी सीवी मेल की। कहीं से कोई जवाब नहीं आया। लेकिन आरजे तो बनना ही था।

एक रोज़ अचानक इंस्टाग्राम पर ‘रेडियो मिर्ची’ का विज्ञापन दिखा। फिर क्या था। तुरंत अप्लाई कर दिया। हालांकि ऑडिशन में मौज़ूद भीड़ को देखकर होश फाख्ता हो गए। फिर भी धीरज बनाए रखा। चार राउंड ऑडिशन और इंटरव्यू देने के बाद आखिरकार उनका सलेक्शन हो गया और शिवम बन गए आरजे शिवि। वह बताते हैं,‘आयुष्मान खुराना को बचपन से ही अपना रोल मॉडल मानता हूं। म्यूजि़क मेरा पैशन है। इस फील्ड में अपनी पहचान बनाने के लिए मुझे रेडियो सबसे अच्छा माध्यम लगता है। रेडियो मिर्ची, पंजाब के लिए एंकरिंग के अलावा मोबाइल के 'गाना’ एप के लिए ऑनलाइन एंकरिंग भी करता हूं। चूंकि आजकल आरजे बनने के लिए मास कम्युनिकेशन की डिग्री अनिवार्य कर दी गई है, इसलिए जॉब के साथ कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा हूं।‘ शिवि के पिता सरकारी अधिकारी थे, जो चाहते थे कि बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बने,लेकिन उन्होंने अपने पैशन का साथ नहीं छोड़ा। वह बताते हैं कि आरजे के रूप में कामयाबी हासिल करना आसान नहीं। इसके लिए अच्छी कम्युनिकेशन स्किल चाहिए। साथ ही, आपने आसपास के लोगों और माहौल को बारीकी से देखने और समझने की क्षमता भी। तभी आपकी बातें श्रोताओं के दिलों तक पहुंच सकेगी और वे खुद को आपके साथ कनेक्ट कर पाएंगे। दरअसल, रेडियो एक ऐसा सशक्त माध्यम है,जिसके ज़रिये लाखों लोगों तक अपने दिल की बातें पहुंचाई जा सकती हैं।

‘रेडियो जिंदगी’ से विदेश में भारतीय संस्कृति से करा रहीं परिचय

अमेरिका केे कैलिफोर्निया की रेडियो जिंदगी आरजे ईशा दुबे ने बताया कि जमाना चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए,लेकिन रेडियो का दौर आज भी लोगों के जेहन में सुरमयी संगीत की तरह हमेशा तरोताजा रहता है। रेडियो केवल सूचना का माध्यम नहीं है,बल्कि इसमें मनोरंजन भी शुमार हो गया है। ऐसे में अब आरजे की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। यह कहना है नोएडा की आरजे ईशा दुबे का। ईशा सात समंदर पार अमेरिका में अपनी मातृभाषा को रेडियो के जरिये दुनिया के मानचित्र पर स्थापित कर रही हैं। यही वजह है कि इसकी खुशबू में विदेशी भी डूबते जा रहे हैं। पिछले कई वर्षों से कैलिफोर्निया में प्रवास कर रहीं ईशा ने हिंदी के लिए कई अनोखे काम किए हैं।

वह रेडियो के जरिये लोगों को भारतीय संस्कृति से अभिभूत करती हैं। साथ ही, विदेश में रह रहे भारतीय बच्चों में भारतीय सनातन संस्कृति विकसित करने का पूरा प्रयास कर रही हैं। उन्हें अपने देश के राष्ट्रीय पर्वों स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बारे में भी बताती हैं। ईशा ने 2008 में अपने करियर की शुरुआत की, जिसके बाद मध्य प्रदेश के इंदौर में ‘रेड एफएम’ में काम किया। उसके पश्चात् 2012 से कैलिफोर्निया में ‘रेडियो जिंदगी’ के साथ काम कर अपने देश का नाम ऊंचा कर रही हैं। यह अमेरिका का सबसे बड़ा 24*7 रेडियो नेटवर्क है। कैलिफोर्निया में इसकी पहुंच 800 हजार दक्षिण एशियाई लोगों तक है। अपने देश से दूर होने के बावजूद आधुनिक पीढ़ी को एफएम रेडियो से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। वह भारत में विभिन्न कॉलेजों के छात्रों संग ऑनलाइन कार्यशालाओं के माध्यम से रेडियो के क्षेत्र में निष्पक्षता व नजरिये के अहम रोल के बारे में प्रशिक्षित कर रही हैं। ईशा बताती हैं कि रेडियो इंडस्ट्री में खुद की आवाज पर ध्यान देने के अलावा लगातार कड़ी मेहनत करनी होती है

कम्युनिटी रेडियो से लोगों से जुड़ने का मिला मौका

राजस्‍थान केे आबू रोड की रेडियो मधुबन आरजे आरुषि  ने बताया कि  बचपन से ही रेडियो सुनने का शौक रहा है। लेकिन मास कम्युनिकेशन में एमफिल करने के बाद जब कम्युनिटी रेडियो डेवलपमेंट कम्युनिकेशन के बारे में पढ़ना शुरू किया, तो इसमें रुचि पैदा हुई। मुझे पता चला कि कैसे किसी भी क्षेत्र के विकास में कम्युनिटी रेडियो महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मुझे लिखना पसंद है, नये-नये लोगों से बातें करना पसंद है, लेकिन किसी विषय पर बोल भी सकती हूं, इसका विश्वास नहीं था।

2013 में ‘ज्ञानवाणी’(एजुकेशनल रेडियो एफएम) में कैजुअल अनाउंसर के लिए ऑडिशन दिया औऱ उसमें सेलेक्शन हुआ,तब विश्वास आया कि मैं बोल सकती हूं। कुछ समय वहां काम करने एवं सीखने के बाद कम्युनिटी रेडियो, ‘रेडियो मधुबन’ की जानकारी मिली और मैं यहां आ गई। पिछले तीन-चार वर्षों से शो कर रही हूं।‘युवा मंच’शो में स्थानीय युवा हमसे रुबरू होते हैं। वे अपनी परेशानियां, गांव की बातें या सामाजिक पहल आदि के बारे में अपनी बातें साझा करते हैं कि कैसे वे एक चेंजमेकर की भूमिका रहे हैं। इसी प्रकार,‘मधुबन अनप्लग्ड’ एक म्यूजिकल शो है,जिसमें हम स्थानीय टैलेंट को प्लेटफॉर्म देते हैं। वहीं,‘बच्चों की दुनिया’ शो में सीधे बच्चों से उनके सपनों,डर,स्कूल आदि के बारे में बातें करते हैं। उनके लिए नाटक आदि भी बनाते हैं। इस तरह रेडियो के जरिये तमाम तरह एवं आयु वर्ग के लोगों से जुड़ना बहुत उत्साह देता है। रेडियो है ही एक ऐसा प्लेटफॉर्म,जहां लोगों से जुड़े मुद्दों पर बातें होती हैं। इस कारण आरजे अपने से लगने लगते हैं। यही अपनापन श्रोताओं को बेझिझक अपने मन की बात साझा करने के लिए प्रेरित करता है। 

विश्व रेडियो दिवस

स्पेन रेडियो एकेडमी ने पहली बार 2010 में विश्व रेडियो दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था। उसके बाद 2011 में यूनेस्को की महासभा के 36वें सत्र में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने की घोषणा हुई। तत्पश्चात 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसकी मंजूरी दी। इस दिन रेडियो की महत्ता के बारे में चर्चा की जाती है। इस वर्ष की थीम है, न्यू वर्ल्ड, न्यू रेडियो (इवोल्यूशन, इनोवेशन ऐंड कनेक्शन) ।