सरकारी बनाम निजी की बहस की पड़ताल एक बड़ा मुद्दा, विनिवेश और निजीकरण को ठीक से समझना जरूरी

 

देश में सरकारी बनाम निजी की बहस जारी है। (फोटो: दैनिक जागरण)

कारोबार करना कारोबारियों के जिम्मे छोड़ा जाना चाहिए। पीएम मोदी ने हाल ही में कहा था कि कारोबार करना सरकार का काम नहीं है। कंपनियों और कारोबार को मदद देना सरकार का काम है। इसलिए सरकारी बनाम निजी की बहस की पड़ताल आज एक बड़ा मुद्दा है।

नई दिल्ली, आज से 2600 साल पहले दुनिया के सबसे पुराने गणराज्यों में से एक वैशाली में मौजूद कायदा-कानूनों से आज के तमाम लोकतंत्र पुष्पपित-पल्लवित हैं। उस जमाने में राजा का मूल दायित्व प्रजा का कल्याण सुनिश्चित करना था। सबके काम तय थे। कौन अध्ययन-अध्यापन करेगा, कौन सैनिक बनकर देश की रक्षा करेगा और कौन कारोबार करेगा। राजा आम जनता के कल्याण के लिए मालगुजारी, लगान और टैक्स वसूल करता था जिससे अपने राज्य के विकास संबंधी तमाम जरूरतों के साथ लोगों के कल्याण को वह सुनिश्चित कर सके।

जनता के कल्याण के रास्ते में कोई बाधा न खड़ी हो, इसके लिए उसके पास समुचित तंत्र होता था कि कोई अधिकारी अपनी मनमानी न कर सके। इस बात की पुष्टि हमारे पौराणिक ग्रंथ भी करते हैं। मनु स्मृति के श्लोक 7.124 में कहा गया है कि राजा के कुछ अधिकारी दूसरे के धन को हरण करने वाले होते हैं। इसलिए राजा उन लोगों से प्रजाओं की रक्षा करे, जो पापात्मा कर्मचारी घूस लें राजा उनका सर्वस्व हरण करके उन्हें देश से निकाल दे।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कारोबार करना सरकार का काम नहीं है। कंपनियों और कारोबार को मदद देना सरकार का काम है। भले ही कुछ लोग इस बात में जबरदस्ती का मीन-मेख निकालें, लेकिन सच्चाई यही है कि रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्रों को छोड़ दें तो सरकार को कारोबार से किनारा करने में ही भलाई है। इस बात की तस्दीक ये आंकड़े करते हैं।

मार्च 2004 में सार्वजनिक कंपनियों की कुल बाजार पूंजीकरण में हिस्सेदारी करीब 31.6 फीसद थी, 2019 यानी सिर्फ 15 साल में ये हिस्सेदारी घटकर 11 फीसद रह गई। इन कंपनियों पर जनता के खून-पसीने से अर्जति धन फूंकने से अच्छा है कि भारत जैसे विकासशील देश में लोगों के कल्याण पर खर्च किया जाए। इसी लक्ष्य के मद्देनजर हर केंद्रीय बजट में विनिवेश का लक्ष्य तय किया जाता रहा है, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ज्यादा सक्रियता दिखाने की जरूरत है। कारोबार करना कारोबारियों के जिम्मे छोड़ा जाना चाहिए। ऐसे में सरकारी बनाम निजी की बहस की पड़ताल आज बड़ा मुद्दा है।

क्या होता है विनिवेश ?

सरकार द्वारा किसी सरकारी संपत्ति की बिक्री अथवा उसकी प्रक्रिया को अंतिम दौर में ले जाने की प्रक्रिया को विनिवेश कहा जाता है। सामान्यतौर पर केंद्र व राज्य सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम, परियोजनाओं या अन्य अचल संपत्तियों का विनिवेश करते हैं। आमतौर पर यह कदम अपने ऊपर वित्तीय भार को कम करने अथवा जरूरत के अनुरूप धन इकट्ठा करने के होता है। कुछ मामलों में विनिवेश के तहत सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंप दिया जाता है, हालांकि सभी विनिवेश का आशय निजीकरण नहीं होता। विनिवेश देश के दीर्घकालिक विकास में मददगार साबित होता है।

विनिवेश बनाम निजीकरण

सरकार को जब जरूरत होती है वह किसी उद्यम को पूरी तरह या उसके बड़े हिस्से को निजी निवेशक के हाथों में सौंप सकती है। इसके बाद कंपनी का मालिकाना हक व उसका नियंत्रण सरकार के पास नहीं रह जाता। सामान्य तौर पर सरकार इससे बचती है। सरकार आधा या उससे ज्यादा हिस्सेदारी अपने पास रखती है, ताकि सार्वजनिक उद्यम का नियंत्रण उसके पास बरकरार रहे। लेकिन, जब ऐसा नहीं होता है तो कंपनी का मालिकाना हक निजी हाथों में चला जाता है और उसे निजीकरण कहा जाता है।

ऐसे पूरी होती है प्रक्रिया

वित्त मंत्रलय के अंतर्गत एक अलग विभाग है जो विनिवेश संबंधी कार्य करता है। 10 दिसंबर, 1999 को अलग से विनिवेश विभाग का गठन किया गया। बाद में इसका नाम निवेश व सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग पड़ गया। केंद्रीय बजट में ही विनिवेश का लक्ष्य तय कर दिया जाता है और हर साल इसमें बदलाव होता है। सरकार यह निर्णय लेती है कि विनिवेश के लक्ष्य को बढ़ाना है अथवा नहीं।

मिले-जुले रहे हैं नतीजे

वर्ष 1990 के बाद विनिवेश लगभग हर केंद्रीय बजट का हिस्सा रहा। इसके जरिये सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री से राशि जुटाई जाने लगी। हालांकि, इसका प्रभाव मिश्रित रहा। ज्यादातर मामलों में लक्ष्य से हम पीछे रहे।