अश्लील सामग्री पर संसद में बने कठोर कानून, दर्शकों के भीतर कायम हो भय

 

संसद अश्लील सामग्री को लेकर इतना कठोर कानून बनाए कि इसके दर्शकों के भीतर भय कायम हो सके।
सरकार द्वारा जब भी अश्लील वेबसाइटों को प्रतिबंधित करने की बात की गई या इस दिशा में कोई कदम उठाया गया तब-तब उसे विरोध का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने 857 अश्लील सामग्री वाली साइटों को प्रतिबंधित किया था।

नई दिल्ली,  पिछले दिनों उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा इस आशय की एक सूचना दी गई कि राज्य में अश्लील देखने वाले अब पुलिस की निगरानी में रहेंगे। यदि कोई अश्लील देखता है तो पुलिस को पता चल जाएगा खबर यह भी आई कि ऐसा करने वालों को एकबार चेतावनी दी जाएगी और सुधार न होने पर गिरफ्तारी भी की जा सकती है। हालांकि जब सोशल मीडिया पर इस निर्णय की आलोचना हुई तो यूपी पुलिस ने इस बात का खंडन करते हुए स्पष्टीकरण दिया कि यह निगरानी केवल बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री खोजने वालों के लिए है, जिन्हें पॉप-अप संदेश के माध्यम से सचेत किया जाएगा। चूंकि सूचना एवं प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत भारत में बच्चों से संबंधित अश्लील देखना अपराध की श्रेणी में आता है। अत: यूपी पुलिस के उक्त अभियान को इसी कानूनी दायरे में रखकर देखा जा सकता है। यूपी पुलिस का अभियान भले अल्प-वयस्क अश्लील सामग्री की रोकथाम का हो, परंतु इस संदर्भ में ही यह विमर्श भी एकबार पुन: प्रासंगिक हो गया है कि देश में संपूर्ण रूप से अश्लील सामग्री के देखने पर प्रतिबंध लगना चाहिए या नहीं?

गौर करें तो पूर्व में सरकार द्वारा जब भी अश्लील वेबसाइटों को प्रतिबंधित करने की बात की गई या इस दिशा में कोई कदम उठाया गया, तब-तब उसे विरोध का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने 857 अश्लील साइटों को प्रतिबंधित किया था, लेकिन विरोध के बाद सरकार द्वारा केवल बच्चों के अश्लील से संबंधित साइटों पर प्रतिबंध को जारी रखते हुए शेष प्रतिबंध वापस ले लिए गए थे। 2015 में ही अश्लील पर प्रतिबंध से संबंधित हालांकि एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से इस संबंध में कदम उठाने को कहा था।जाहिर है सरकार को पहल करनी चाहिए। यदि आवश्यक हो तो व्यक्ति की वैयक्तिक स्वतंत्रता के दायरे को पुनर्परिभाषित करते हुए इस संबंध में मार्ग निकाला जा सकता है। यद्यपि अश्लील पर प्रतिबंध की राह में तकनीकी चुनौतियां और जटिलताएं भी कम नहीं हैं, परंतु एक बार यदि इस पर प्रतिबंध का वैधानिक रास्ता खुल जाए तो फिर सरकार इस दिशा में निर्णय लेते हुए विरोध के दबाव से मुक्त होगी तथा खुलकर कदम उठा सकेगी। संसद के माध्यम से अश्लील को लेकर इतना कठोर कानून बने कि इसके दर्शकों के भीतर भय कायम हो सके, ताकि यदि अश्लील पर तकनीकी रूप से पूर्ण प्रतिबंध लगने में कठिनाई भी हो तब भी लोग ऐसी सामग्रियों को कानूनी भय के चलते देखने से बचें। इस प्रकार के कदमों से अश्लील के दर्शक पूरी तरह से खत्म भले न हों, परंतु उनकी मात्र में भारी कमी अवश्य लाई जा सकती है। वहीं अब अश्लील सामग्रियों के अलावा ओटीटी माध्यमों के विकास ने ‘सॉफ्ट अश्लील’ के रूप में एक नई समस्या खड़ी कर दी है, इस पर लगाम लगाना भी अश्लील जितना ही जरूरी है।