कन्याकुमारी में लेफ्ट की स्थिति राइट नहीं, वामदलों को नहीं मिली एक भी सीट

  • चेन्नई, आइएएनएस। लेफ्ट पार्टियों की हालत केवल बंगाल के चुनाव में ही पतली नहीं है। दक्षिण भारत की एक विधानसभा सीट पर भी अब लेफ्ट का वर्चस्व लगभग खत्म हो गया है। तमिलनाडु और केरल की सीमा पर स्थित कन्याकुमारी जिले में कभी लेफ्ट की राजनीति का डंका बजता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। दृश्य बदल चुका है। न यहां लेफ्ट के प्रत्याशी का नाम है और न ही लेफ्ट विचारधारा के प्रचार का शोर।

एक समय था जब कन्याकुमारी जिले को वामपंथी राजनीति का गढ़ माना जाता था। यहां से सीपीएम के प्रत्याशी लगातार सांसद और विधायक का चुनाव जीतते थे। लेकिन अब वक्त ने करवट ली है और सीपीएम व सीपीआइ का एक भी प्रत्याशी कन्याकुमारी जिले की किसी भी सीट से विधानसभा चुनाव में दावेदारी नहीं कर रहा है। दरअसल इसकी वजह है तमिलनाडु में चुनाव लड़ रहा सेक्युलर प्रोग्रेसिव एलायंस (एसपीए)। दस पार्टियों के गठबंधन एसपीए का नेतृत्व एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके कर रही है और उसने कन्याकुमारी जिले में एक भी विधानसभा सीट लेफ्ट पार्टियों को नहीं दी है।

लेफ्ट पार्टियों के कैडर में निराशा

तमिलनाडु के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका है जब कन्याकुमारी जिले की एक भी सीट पर लेफ्ट का प्रत्याशी नहीं है। कहा जा रहा है कि इससे लेफ्ट पार्टियों के कैडर में निराशा है लेकिन डीएमके का मानना है कि कुछ पुराने कार्यकर्ताओं को छोड़कर कन्याकुमारी में लेफ्ट पार्टियों का कैडर शेष नहीं बचा है। एक समय था कि केरल की सीमा से लगती विलवानकोड, ओल्ड थिरुवत्तार और पद्मनाभपुरम सीटों पर लेफ्ट पार्टियों का वर्चस्व था। लेकिन अब लगातार कमजोर होते वामपंथी दलों के कैडर की उपस्थिति इन सीटों पर न के बराबर है

तमिलनाडु-केरल की सीमा पर स्थित जिले में कभी था लेफ्ट का वर्चस्व
इतिहास में झांकें तो 1977, 1980, 1996, 2001 और 2006 में सीपीएम ने विलवानकोड की सीट पर जीत हासिल की, लेकिन 2016 में जब सीपीएम ने किसी द्रविड़ विचारधारा के दल के समर्थन के बिना चुनाव लड़ा तो उसे तीसरा स्थान मिला। नजदीक के ही कुझीथुरा निकाय में सीपीएम का लगातार तीन बार अधिकार रहा। पद्मनाभपुरम सीट पर सीपीएम को 1980, 1984, 1999 और 2001 में जीत हासिल हुई थी। यहां से जीतने वाले सीपीएम नेता जे. हेमचंद्रन तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे हैं। बाद में थिरुवत्तार और पद्मनाभपुरम को एक ही विधानसभा क्षेत्र में मिला दिया गया। तब सीपीएम यहां से जीत नहीं सकी। क्षेत्र में उपस्थिति और कैडर की कमजोरी के अलावा सीपीएम और सीपीआइ इस आरोप का भी सामना कर रही हैं कि उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में डीएमके ने 25 करोड़ रुपये दिए थे। इस बारे में लेफ्ट पार्टियों का कहना है कि यह रकम क्षेत्र में लेफ्ट उम्मीदवारों का प्रचार कर रहे डीएमके नेताओं के दौरे पर खर्च की गई थी। लेकिन कमल हासन ने इस बार फिर इस मुद्दे को हवा दे दी है।