कोरोना काल में महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, दूसरों के लिए भी रोजगार के साधन किए पैदा

 

महिलाओं ने हौसले से कोरोना काल में फर्श से अर्श तक का सफर तय किया।

कोरोना काल में ऐसी बहुत सी महिलाएं सामने आईं जो नए संकल्प लेकर न सिर्फ आत्मनिर्भर बनीं बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार के साधन पैदा किए। यह जानना सुखद है कि इस मुश्किल दौर में भी विदेश की तुलना में भारत की महिलाएं सशक्त रहीं।

 कोरोना काल में ऐसी बहुत सी महिलाएं सामने आईं, जो नए संकल्प लेकर न सिर्फ आत्मनिर्भर बनीं, बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार के साधन पैदा किए। यह जानना सुखद है कि इस मुश्किल दौर में भी विदेश की तुलना में भारत की महिलाएं न केवल सशक्त रहीं, बल्कि एक-दूसरे का सहारा भी बनीं। आइए रू-ब-रू होते हैैं फौलादी हौसले वाली कुछ ऐसी ही महिलाओं से और जानें उनकी जिजीविषा के मंत्र, संघर्ष के सूत्र... 

जहां पहुंच के कदम डगमगाए हैं सबके, उसी मकाम से अब अपना रास्ता होगा... शायर आबिद अदीब की ये पंक्तियां कितने मुकम्मल अंदाज में बयां करती हैं उन महिलाओं के हौसले को जिन्होंने कोरोना काल में फर्श से अर्श तक का सफर तय किया। वक्त की र्गिदशों का गम न कर अपने हौसले का दीया आंधियों में जलाए रखा। खुद तो रोशन रहीं, अपने आसपास भी उम्मीद बरकरार रखी। जहां चूल्हे ठंडे पड़ने की आशंका थी साथ ही अपने कलेजे के टुकड़ों को क्या खिलाऊं-क्या पकाऊं के ऊहापोह से गुजर रही थीं, वहीं हौसले से भरे अपने चंद कदमों की बदौलत आसपास भी खुशहाली की रोशनी बिखेर दी और बता दिया जमाने को मशहूर शायर साहिर लुधियानवी के शब्दों में कि हजार बर्क गिरे लाख आंधियां उट्ठें, वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं।

जिंदगी बदल दी इंटरनेट ने

गजब दौर था वह भी, न देखा, न सुना। भय का माहौल। फैक्ट्री-कारखाने सब बंद। कब खुलेंगे, पता नहीं। कल चूल्हा कैसे जलेगा, इसका जवाब भी किसी के पास न था। घर लौटने पर शायद कोई उम्मीद जगती, पर लौटने के सारे रास्ते भी बंद नजर आ रहे थे। बस्ती के दुबौलिया ब्लॉक के खुशहालगंज गांव की मीना सिंह के पति बाहर दूसरे शहर में प्राइवेट नौकरी करते थे। ऊहापोह के इसी दौर से गुजर कर वह किसी तरह घर वापसी कर पाए। अब आगे क्या की चिंता, पति-पत्नी दोनों को खाए जा रही थी। आसपास के हालात का जायजा लिया तो पता चला कि इस दौर से केवल मीना सिंह का परिवार ही नहीं, बल्कि उनका पूरा इलाका जूझ रहा है। ऐसे में मीना सिंह को यूट्यूब पर देखा चप्पल बनाने का दृश्य याद आया। उन्होंने इंटरनेट पर ही इससे जुड़ी कुछ और जानकारियां बटोरीं।

सभी ने मिलकर एक स्वयं सहायता समूह बनाया

पता चला कि इसके लिए मशीनें लेनी पड़ेंगी यानी पैसे का जुगाड़ करना होगा। यह तो सबसे बड़ा सवाल है, पर हौसले हैं तो रास्ता भी। उन्होंने आसपास की महिलाओं से इस बाबत बात की। साझा दर्द, साझा हालात। सबने तय किया कि मिलकर पैसा एकत्र करेंगे। वही हुआ। सभी ने मिलकर एक स्वयं सहायता समूह बनाया और इसी के जरिए काम शळ्रू किया। उन्हेंं कुछ र्आिथक सहायता भी मिली। फिर आगरा जाकर उन्होंने चप्पल बनाने वाली मशीनें खरीदीं साथ ही आगरा और लखनऊ से कच्चे माल की खरीदारी की। समूह की रुखसाना, जरीना खातून, अकीला बानो, जमीतुलनिशा, जैबुननिशा, मोमिना, जाहिदा, फिरोजा, रुखसार, अंजुम आदि महिलाएं जुट गईं चप्पल बनाने में। जल्द ही इलाके में उनकी बनाई चप्पलें पहचानी और मांगी जाने लगीं। हौसले के साथ शुरू किया गया यह सफर रोशन हुआ और कई परिवारों को राह दिखा गया। इससे महिलाओं को अच्छी आमदनी हो रही है और घर-परिवार की र्आिथक स्थिति भी संवर रही है।

कलम से कलछी तक

कई साल से देहरादून और देश के दूसरे शहरों में शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने वाली पूजा वर्मा जब अपने शहर रांची वापस आईं तो यहां के बच्चों के लिए कुछ अलग करने की सोची। उन्हेंं एहसास था कि बिहार और झारखंड के बहुत से बच्चे तमाम जानकारियों के बावजूद अभिव्यक्ति के स्तर पर पिछड़ जाते हैैं। इस कमी को अपने स्तर से दूर करने के लिए उन्होंने रांची आने पर अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी लगाकर प्ले स्कूल की शुरुआत की। यह संयोग ही था कि उनकी यह शुरुआत और कोरोना का आगमन, दोनों साथ-साथ हुआ। खुद एक बेटे की मां हैं, बखूबी समझ सकती हैं कि इस कठिन दौर में स्कूल के दरवाजे तक बच्चे का पहुंचना आसान नहीं। झारखंड में छोटे बच्चों के स्कूल अब तक खुले भी नहीं हैं। ऐसे में करें तो क्या करें। कई विकल्पों पर बात चल रही थी। इसी बीच एक मित्र ने उनके हाथ के स्वाद को समझते हुए अपने होटल में काम का ऑफर दिया। तब उन्हेंं खयाल आया कि जब कलछी ही उठानी है तो अपना ही कोई काम क्यों न शुरू करें। हालांकि खयाल को मुक्कमल जामा पहनाना आसान न था।

बहुत सी महिलाएं उनसे प्रेरणा लेकर अपने हाथों का हुनर दिखा रही हैं

पहला सवाल कि लोग क्या कहेंगे! फिर अगर मैं खुद बाहर बनाकर बेचने लगूं तो परिचितों की कैसी प्रतिक्रिया रहेगी! पूजा कहती हैं, फिर मैंने सोचा कि घरों में तो महिलाएं ही खाना बनाती हैं। मैं भी बनाती हूं और घर-बाहर के लोग सराहते भी हैं। आज जब स्थिति विकट है तो मेरा यह हुनर कोई बेहतर राह क्यों नहीं खोल सकता! फिर क्या था एप्रन पहनकर अपनी रिहायशी सोसायटी से कुछ ही कदम दूर उन्होंने लजीज व्यंजन बनाने शुरू किए। स्वाद का जादू ऐसा रहा कि कम ही समय में शाम ढलने का लोग इंतजार करते, जब वह अपने कर्मस्थल पर सक्रिय दिखतीं। अब बहुत सी महिलाएं उनसे प्रेरणा लेकर अपने हाथों का हुनर दिखा रही हैं।

लहलहाई उम्मीद की फसल

भले ही प्राइवेट स्कूल की नौकरी थी, पर परिवार के खर्चों का निर्वाह उसी से होता था। बात हो रही है हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले की रीता कुमारी की। कोरोना से पहले वह एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थीं। कोरोना काल में स्कूल बंद हुए तो बाद में उनकी नौकरी भी खत्म हुई और खाने के लाले... जैसे हालात पैदा हो गए। करें तो क्या करें। रीता कुछ ऐसा करना चाहती थीं, जो घर बैठे संभव हो। सजग रीता उस दौर में भी समाचारों के जरिए दुनियाभर की खबर रखती थीं। उन्हें बैंकों से महिलाओं को मिलने वाले लोन की जानकारी मिली और एक हर्बल कंपनी के संचालक से भी बातचीत हुई। कंपनी वालों ने एलोवेरा की मांग की बाबत बताया और इसकी खेती के तरीके के बारे में भी जानकारी दी। बस फिर क्या था रीता को अपने खेतों का ध्यान आया। उन्होंने बैंक से लोन के लिए आवेदन किया, जो स्वीकृत भी हो गया। उन्होंने पांच हजार पौधे मंगवाए और अपने खेतों में एलोवेरा की खेती शुरू कर दी। खेतों में अब एलोवेरा लहलहा रहा है साथ ही उम्मीदों के फूल भी। उन्हेंं विश्वास है कि जल्द ही वह बैंक का लोन चुका देंगी। उनका यह कदम औरों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन रहा है।

वक्त की र्गिदशों का गम न करो, हौसले मुश्किलों में पलते हैं

बहरहाल, अपने कर्म से महिलाओं ने कोरोना काल में एक बार फिर बता दिया कि परिस्थितियां जैसी भी हों, हम हौसला नहीं खोते। अपने और अपनों के लिए हथेली की ओट से उम्मीदों का दीया जलाना हमें आता है। ये महिलाएं दो चार नहीं, नजर दौड़ाइए तो सही, आपके आसपास भी नजर आ जाएंगी। बेहद खामोशी में उनके कर्मों में शायर महफूजुर्रहमान आदिल की ये पंक्तियां गुनगुनाती दिखेंगी- वक्त की र्गिदशों का गम न करो, हौसले मुश्किलों में पलते हैं।

अमेरिका में बेहाल भारत में खुशहाल

यूएन वुमन ने कोरोना में महिलाओं के हालात पर किए गए करीब 40 सर्वेक्षणों में कुछ ऐसे परिणाम प्राप्त किए हैं जिससे महिलाओं के हित में उठे कदम करीब 25 वर्ष पहले के हालात में पहुंचने के संकेत जाहिर कर रहे। कोरोना काल से पहले अगर पुरुष एक घंटे अवैतनिक कार्य करता था तो महिलाएं तीन घंटे अवैतनिक कार्य कर रही थीं। यूएन वुमन की डिप्टी एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनीता भाटिया के मुताबिक अब महिलाओं के हिस्से का अवैतनिक कार्य करीब दोगुना बढ़ गया है साथ ही इस समय महिलाओं के ऊपर परिजनों के देखभाल की जो जिम्मेदारी बढ़ी है, उससे दशकों पूर्व की लैंगिक रूढ़ियों के बढ़ने का खतरा है। यूएन रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल सितंबर महीने में अमेरिका के दो लाख पुरुषों के मुकाबले आठ लाख पैंसठ हजार महिलाओं ने नौकरी छोड़ी। इधर भारत में एक रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं के स्वरोजगार बढ़े हैं। बैंकबाजारडॉटकॉम की मनीमूड 2021 रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना काल में महिलाओं की औसत लोन राशि 25.66 लाख रुपए से बढ़कर 31.20 लाख रुपए हो गई है