क्या सिखाती है महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुई ऐतिहासिक दांडी यात्रा..

अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से ऐतिहासिक दांडी मार्च से हुई।

दांडी मार्च मुश्किल वक्त में सही फैसले की राह दिखाता है। यह संकेत देता है कि लक्ष्य की राहें भले कितनी ही लंबी हों असंभव सी जान पड़ें पर हमें अधीर नहीं होना चाहिए। बस संकल्प शक्ति को मजबूत रखें और आगे बढ़ते रहें।

नई दिल्ली। शब्दों से परे थे बापू। वे ऐसे महामानव थे, जिन्होंने उस समय दुनिया की सबसे बड़ी ताकत यानी अंग्रेजों को घुटनों के बल लाकर खड़ा कर दिया था। अंग्रेजों ने तो देश में आम लोगों को भी देखा, नवाबों को देखा, दूसरे क्रांतिकारियों को देखा था, पर गांधी जैसा विरोधी उन्हें नहीं मिला। ऐसा विरोधी, जो कभी अधीर नहीं होता था, बल्कि शांति और सादगी के बल पर जिसने असंभव नजर आने वाले काम को भी संभव कर दिखाया। आजादी के अमृत महोत्सव की शुरुआत पिछले दिनों अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से ऐतिहासिक दांडी मार्च से हुई। आगामी 6 अप्रैल तक चलने वाली यह यात्र प्रतीकात्मक है, पर इसमें छिपा है जीवन में आगे बढ़ने का महान संदेश। दांडी मार्च मुश्किल वक्त में सही फैसले की राह दिखाता है। यह संकेत देता है कि लक्ष्य की राहें भले कितनी ही लंबी हों, असंभव सी जान पड़ें, पर हमें अधीर नहीं होना चाहिए। बस संकल्प शक्ति को मजबूत रखें और आगे बढ़ते रहें। आइए जानें कि क्या सिखाती है महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुई ऐतिहासिक दांडी यात्रा..

आमतौर पर ऐसा संभव है, जब हमारे सामने ताकतवर दुश्मन हो, जीवन में विषम परिस्थितियां पैदा हो जाएं तो लोग बीच राह में थकने लगते हैं, मुश्किलों की दुहाई देकर कदम पीछे खींच लेते हैं, पर गांधी के साथ बात दूसरी थी। वे चौंकाते थे। आप पाएंगे कि वे अपनी संकल्प शक्ति को हारने नहीं देते थे, बल्कि दोबारा अपनी सामथ्र्य को जुटाते और कुछ ही समय बाद एक और बड़ा ताकतवर आंदोलन खड़ा कर देते थे। उन्होंने जब नमक आंदोलन का निर्णय लिया, तो इसकी गूंज दुनियाभर में सुनाई दी। अखबारों की सुर्खियां बनी। लोगों को आभास हो गया था कि यह कोई साधारण घटना नहीं है, बल्कि एक इतिहास बन रहा है। इस कारण आंदोलन के दौरान घटने वाली पल-पल की खबर ली जा रही थी।

सुनें मन की: गांधी जी अपने मन की सुनना पसंद करते थे। यह उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। यही बात अंग्रेजों के मन में खीझ और क्षोभ पैदा कर देती थी। मुङो लगता है कि अंग्रेज उनके मन की थाह नहीं ले पाते थे। यही कारण रहा कि गांधी को परास्त करने का उनका हर दांव छोटा पड़ जाता था। अंग्रेज आक्रमण करते तो गांधी बचाव करते और जब अंग्रेज अपना बचाव करने लगते तो गांधी उन पर एकदम से आक्रमण कर देते। गांधी क्या करने वाले हैं, इसका अनुमान अंग्रेज नहीं लगा पाते थे। दरअसल, इसका कारण यह था कि गांधी ने कभी सामान्य राजनीति में अपनाये जाने वाले दांवपेच का प्रयोग नहीं किया। वे हमेशा अपने भीतर से आने वाली आवाज को सुनते थे। जब उन्हें लगता कि यह कदम सही है, उसी वक्त फैसला कर लेते। अनशन कब करना है, कब लगाम कसनी है, कब उसे छोड़ना या रोकना है, यह सब उसी अंदरूनी आवाज को सुनकर तय करते थे। इंद्रियों की सीमा होती है, लेकिन जो इंसान अपने सहज बोध से संचालित हो रहा होता है, उसकी शक्ति की सीमा नहीं हो सकती।

तैयारी की मजबूती

हम जो कुछ करें, उसे पूरे आत्मविश्वास से करें। इसके लिए जरूरी है कि हमारी तैयारी वास्तविक धरातल पर की गई हो। गांधी की तैयारी ऐसी ही होती थी। नमक आंदोलन का जब निर्णय लिया था तो उससे पहले कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा कर दी थी। असहयोग आंदोलन के दस साल हो चुके थे। सब सोच में थे कि अब गांधी ऐसा क्या कदम उठाएंगे, जिससे दमनकारी सरकार की नीतियों के खिलाफ संघर्ष तेज किया जा सके। कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेता इस प्रयास में थे कि समानांतर सरकार बना ली जाए। सरदार पटेल ने कानून को तोड़ते हुए दिल्ली मार्च करने का सुझाव दिया, पर गांधी ने दांडी मार्च को चुना क्योंकि उन्हें लगा था कि इससे जनता में एक गहरा संदेश जाएगा। लोग इस आंदोलन से खुद को जोड़ सकेंगे और अंग्रेजी दमन के खिलाफ बड़ी संख्या में जमीन पर उतरेंगे। यह सच भी हुआ।

विचारों को रचनात्मक स्वरूप

हमारा चिंतन अध्ययन से समृद्ध हो, हमें यह प्रयास करना चाहिए। नमक आंदोलन का विचार यूं ही नहीं सामने आ गया। दरअसल, इस विचार को गांधी ने बहुत सोच-विचार कर जमीन पर उतारा। नमक के बारे में वे काफी कुछ लिख चुके थे। दादा भाई नौरोजी ने भी नमक कर और इसके कारण अंग्रेजों का भारत से धन खींच लिए जाने पर लिखा था। गांधी उन सभी के विचारों को पढ़ चुके थे। सारी बातों पर मंथन करते थे। इन सबके साथ उनकी एक और बड़ी खासियत थी कि वे विचारों को रचनात्मक स्वरूप देते थे, अन्यथा भारत जैसे विविधतापूर्ण देश को एक सूत्र में पिरोकर आंदोलन करना और उसमें जीत हासिल करना बहुत कठिन था। आचार्य आनंद स्वामी के शब्दों में कहें तो गांधी को भारत के लोगों के ‘मेंटल एटमॉस्फियर’ यानी उनके मन में क्या चल रहा है, उस मनोदशा की गहरी समझ थी। वे एक कुशल कलाकार थे। एक श्रेष्ठ मूर्तिकार की तरह लोगों के मन में, उनके जीवन में, उनकी रसोई में, गोशाला में घुस जाते और बड़ी ही कुशलता से मृतप्राय मूर्ति (अंग्रेजों की दमनकारी नीति से त्रस्त समाज) को जीवंत कर देते थे। यह किसी भी कलाकार की कला की श्रेष्ठता की कसौटी होती है कि वह अपने विचारों को इस तरह बुनता जाए कि उसकी कृति में प्राण आ जाएं।

श्रम से खत्म हो सकती है अधीरता

गांधी हिंसा को अधीरता का परिणाम मानते थे। वे अधीरता को आलसीपन कहते थे, जिसे श्रम से साधा जा सकता है। दरअसल, श्रम के दौरान विचार एक लय में होते हैं, जो किसी महान सृजन के लिए जरूरी हैं। नमक आंदोलन के दौरान वे जहां ठहरते, वहां लोगों को समझाते थे कि नमक श्रम का प्रतीक है। श्रम के बाद पसीना निकलता है, वह भी नमक है। अगली बार श्रम कर सकें, इसके लिए हमें नमक की जरूरत होगी और यह नमक हमें खुद पैदा करना चाहिए। किसी गांव को कितना नमक चाहिए और वहां के पशुओं को कितना नमक चाहिए, वे इसकी पूरी मात्र को सटीक माप के साथ बता देते। इससे लोगों को सहज ही समझ में आ जाता था कि वे कमजोर नहीं हैं, बल्कि श्रम करें तो खुद नमक पैदा कर सकते हैं। उसके बाद लोगों ने नमक को आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता से जोड़ लिया, जो आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता थी।

संतो सहज समाधि भली

कौन सोच सकता था कि नमक जैसी साधारण सी चीज को भी आंदोलन का हथियार बनाया जा सकता है? पर गांधी जी ऐसा कर सकते थे और उन्होंने किया भी। जैसा कबीर ने कहा कि संतो सहज समाधि भली। दरअसल, गांधी जैसी सहजता सामान्य बूते की बात नहीं। उन्हें अपने कार्य पर तनिक भी संदेह नहीं होता था, बल्कि वह अपने हर कदम को लेकर स्पष्ट रहते थे। इसलिए जब नमक आंदोलन का निर्णय लिया तो उनकी सहजता ने अंग्रेजों को बुरी तरह असहज कर दिया। नमक आंदोलन में मुट्ठी भर नमक उठाकर संदेश देना था कि अब हम नमक कानून तोड़ रहे हैं, पर इसमें बड़ा महान संदेश छिपा था।

गांधी जी की जीवनयात्र यह स्पष्ट संदेश देती है कि अपनी संकल्प शक्ति की बदौलत इंसान शिखर पर पहुंच सकता है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी के बारे में लिखा है,‘अपने राष्ट्र का ऐसा नेतृत्वकर्ता जिसे बाह्य शक्ति का सहारा प्राप्त नहीं था। एक ऐसा राजनेता, जिसकी सफलता किसी प्रयोजन या तकनीक पर नहीं, बल्कि मात्र उसके व्यक्तित्व की प्रभावी शक्ति पर निर्भर थी। एक ऐसा संघर्षकर्ता, जिसने शक्ति के प्रयोग से नफरत की। ऐसा व्यक्ति, जिसके दिमाग में प्रबुद्धता और स्वभाव में शालीनता थी। जिसने अपनी संपूर्ण क्षमता अपने राष्ट्र के कल्याण पर लगा दी और इस तरह सदैव के लिए उत्कृष्ट हो गया।’