वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद का होगा पुरातात्विक सर्वे, कोर्ट ने दी मंजूरी

पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की अपील पर पक्षकारों की बहस पूरी हो चुकी है।

इस बाबत प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ की ओर से वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने कोर्ट में दलील दी कि वर्तमान वाद में विवादित स्थल की धार्मिक स्थिति 15 अगस्त 1947 को मंदिर की थी अथवा मस्जिद की इसके निर्धारण के लिए साक्ष्य की आवश्यकता है।

वाराणसी। ज्ञानवापी मामले में वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी द्वारा परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की अपील पर पक्षकारों की बहस पूरी हो चुकी है। पूर्व में बहस के दौरान दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) आशुतोष तिवारी ने दो अप्रैल को निर्णय के लिए आठ अप्रैल की तिथि तय कर दी थी। आखिरकार लंबे समय बाद ज्ञानवापी मामले में पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने के वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी की अपील (प्रार्थना पत्र) को कोर्ट ने मंजूर कर लिया है। वहीं, सुन्‍नी सेंट्रल वक्‍फ बोर्ड के अधिवक्‍ता अभय नाथ यादव ने कहा कि वह फैसले से संतुष्‍ट नहीं हैं और इसे हाइकोर्ट में चुनौती देंगे। अदालत के फैसले को लेकर परिसर में काफी गहमागहमी का दौर सुबह से ही बना रहा, लंच के बाद दोपहर ढाई बजे फैसला आते ही प्रकरण को लेकर चर्चा का माहौल बना रहा। 

ज्ञानवापी मस्जिद मामले में पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने के मामले में वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी की अपील (प्रार्थना पत्र) को कोर्ट ने गुरुवार को अपने फैसले के दौरान मंजूर कर लिया है। वहीं इस मुकदमे के मामले में सुनवाई के क्षेत्राधिकार को लेकर सुन्‍नी सेंट्रल वक्‍फ बोर्ड और अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने सिविज जज सीनियर डिवीजन फास्‍ट ट्रैक के कोर्ट में सुनवाई करने के लिए अदातल में क्षेत्राधिकार को चुनौती दी थी। बीती 25 फरवरी 2020 को सिविल जज सीनियर डिवीजन ने इस चुनौती को खारिज कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ सुन्‍नी सेंट्रल वक्‍फ बोर्ड और अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने जिला जज के यहां निगरानी याचिका दाखिल किया था। जिसपर आगामी 12 अप्रैल को सुनवायी होनी है। उधर, इसी मुकदमे की पोषणीयता को लेकर हाइकोर्ट में भी सुनवायी चल रही है। इस मामले में दोनों पक्षों की ओर से बहस भी पूरी हो चुकी है, इस पर हाइकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है।

कोर्ट में चली लंबी जिरह

इस बाबत प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ की ओर से वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने कोर्ट में दलील दी कि वर्तमान वाद में विवादित स्थल की धार्मिक स्थिति 15 अगस्त 1947 को मंदिर की थी अथवा मस्जिद की इसके निर्धारण के लिए साक्ष्य की आवश्यकता है। विवादित स्थल विश्वनाथ मंदिर का एक अंश है इसलिए एक अंश की धार्मिक स्थिति का निर्धारण नहीं किया जा सकता, बल्कि ज्ञानवापी परिसर का भौतिक साक्ष्य लिया जाना जरूरी है। जिसे पुरातात्त्विक विभाग जांचकर वस्तुस्थिति स्पष्ट कर सकता है कि ढांचा के नीचे कोई मंदिर था अथवा नहीं। तथ्‍यों के आधार पर प्राचीन विश्वनाथ मंदिर के ध्वस्त अवशेष प्राचीन ढांचा के दीवारों में अंदरुनी और बाहरी तौर पर विद्यमान बताए गए हैं। पुराने मंदिर के दीवारों और दरवाजों को चुनकर वर्तमान ढांचा का रुप दिया गया बताया है। कहा गया है क‍ि पुराने विश्वनाथ मंदिर के अलावा पूरे परिसर में अनेक देवी-देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर थे जिनमें से कुछ आज भी विद्यमान हैं। वहीं वर्तमान ज्योर्तिलिंग की स्थापना 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। यह भी दलील दी गई कि अयोध्या केस में भी पुरातात्विक विभाग से रिपोर्ट मंगाई गई थी, जिसके बाद ही अंतिम फैसला आया था।