पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो कितना ही हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो सारा संसार !

 

धैर्यशीलता जो मां के रूप में पूजनीय धरती की होती है।

विचलित कर रहा है वर्तमान संकट। आप साहसी हैं तो संभव है कि आगे बढ़कर इस तूफान से टकराने की तैयारी में जुट जाएं। पर यदि साहस के साथ धैर्य नहीं है तो आप शीघ्र ही थक जाएंगे। इसलिए जरूरत है धैर्यशीलता की।

नई दिल्ली,  धैर्य, यानी कितनी भी बड़ी समस्‍या को, उससे पैदा हुए झंझावातों का सामना करें। शांत भाव से समाधान की तरफ देखें। यदि हम झंझावातों में फंस जाएंगे तो वहीं रुक जाएंगे, समस्‍या बढ़ेगी, समाधान दूर चला जाएगा। हम यह सब जानते हैं लेकिन सवाल यही है कि वक्‍त आने पर इसका प्रदर्शन नहीं कर पाते। आज जब हम सब वर्तमान कोरोना की दूसरी जबर्दस्त लहर के संकट से जूझ रहे हैं, ऐसे में यह समझना होगा कि धैर्य सबसे अधिक जरूरी है। धैर्य हमारा वह साथी है, जो हर संकट से उबरने में हमारी मदद करता है। एक कहावत है कि एक पल का धैर्य आपको बड़ी से बड़ी आपदा से उबार सकता है तो एक पल की अधीरता जिंदगी को तबाह भी कर सकती है!

हमने मान लिया था कि अब चीजें सुधर गई हैं। पर अब जब स्थितियां बिगड़ीं तो ऐसा लग रहा है कि सचमुच हम गलत थे। इसकी उम्‍मीद नहीं की थी हमने। पर उम्‍मीद करना भी गलत है क्‍योंकि हम अपने व्‍यवहार को उस अनुरूप नहीं बना सके थे जो समस्‍या से‍ निपटने में हमारी मदद करे। ज्‍यादातर लोग धैर्य नहीं रख पाते क्‍योंकि वे सामान्‍य स्थिति की तरफ लौटने के लिए व्‍यग्र रहते हैं। वे वास्‍तविकता को इसलिए समझ नहीं पाते या समझना नहीं चाहते, क्‍योंकि भावनात्‍मक रूप से प्रयास नहीं कर पाते। इस प्रयास में जो मेहनत लगती है उससे बचना चाहते हैं।

पर जिनमें तमाम परेशानियों को सहने और मुश्किल परिस्थितियों से निकलने का भरोसा है, वे शांतचित्‍त रहते हैं। यही तो धैर्य है। ऐसे धैर्यवान की तुलना धरती से की जा सकती है। वह इंसानों का हर आघात सहती है। इंसान अपनी स्‍वार्थपूर्ति के लिए उस पर वार करता है लेकिन वह अपने पथ से विचलित नहीं होती। महात्‍मा गांधी कहते थे कि पृथ्वी के पास इतना है कि वह सबको संतुष्‍ट कर देती है लेकिन उसमें हमारे लालच को पूरा करते जाने की क्षमता नहीं।

जीत का भ्रम तो नहीं

हमें लगा था कि अब स्थितियां ठीक हो रही हैं। पटरी पर लौट रही है जिंदगी। पहले तो हम बड़े सजग थे। एक बार अपील करने पर खुद आगे बढ़कर पालन करते थे। लोगों को लगने लगा कि अब तो हम घर पर भी ठीक हो सकते हैं इसलिए ज्‍यादा परवाह करना बंद कर दिया। हालांकि स्‍वस्‍थ होने की संख्‍या भी बढ़ी़। अब तो हम सुरिक्षत हैं यह एहसास भी होने लगा। इसकी वजह से यह सहज प्रवृत्ति बनी कि जल्‍द ही सब ठीक होगा। इस तरह हम अधीरता की तरफ तेजी से बढ़ रहे थे। इसकी भी अपेक्षा नहीं थी कि वैक्‍सीन के बाद भी लोग पीड़ित हो जाएंगे। वैक्‍सीन आने के बाद लोग यह मान रहे थे कि कुछ ही समय बाद यह जंग जीत लेंगे हम, पर ऐसा नहीं हुआ। अब तो वे भी शिकार हो रहे हैं जिनके बारे में पहले कल्‍पना नहीं की थी। बच्‍चे और युवाओं को भी संक्रमण हो रहा है। साथ ही, जिन्‍होंने वैक्‍सीन की दोनों खुराक ले ली, उन्‍हें भी वायरस अपना शिकार बना रहा है। इससे परेशान होना स्‍वाभाविक है लेकिन यही तो है आपके धैर्य की परीक्षा। यहां वर्तमान संकट को लेकर एक बड़ी सटीक कहानी है।

कैसे जब एक राजा ने युद्ध जीत लिया तो हाथी पर अपने सभी अस्त्र-शस्त्र रखकर आराम करने लगा। यह उसके शत्रु ने देख लिया। अब दोबारा उसने ललकारा कि अब तो तुम हार गए, थक गए। इसका असर ऐसा हुआ कि राजा जीता हुआ युद्ध भी हार गया। जरा सोचिए, क्‍या ऐसे उसे हारना चाहिए था। बेशक नहीं, उसे आराम नहीं करना चाहिए था और शत्रु पर भरोसा भी नहीं। उसे सजग, सावधान रहना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगर वह शिथिल नहीं पड़ा होता, तो दुश्मन उसे कभी हरा नहीं पाता।

खुद पर नियंत्रण खोया क्‍यों

अक्‍सर हम दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। कोई संभाल ले, कोई राह दिखा दे तो ऐसा लगता है कि हम अकेले नहीं। कोई है जो संभाल ही लेगा। इस संकट में भी यही हुआ। इसे मनोवैज्ञानिक भाषा में 'कंप्लिलियंस बिहेवियर' कहते हैं। जैसे, कोई कहेगा कि अमुक नियम का पालन करना है तो कर लेंगे और बचाव होगा। जुर्माना लग रहा है तो दे दिया और इस डर से चलो मास्‍क पहन लेंगे आदि। हम खुद नहीं सोचते कि ये हमारा जीवन बचाने से जुड़ी चीजें हैं। यह अनिवार्य है कि खुद स्थिति को समझें और आगे बढ़ें। जैसे कोई पायलट ऑटोमोड में आकर यदि मशीन पर ही निर्भर रहे और खुद निर्णय लेने से बचे तो बड़ी से बड़ी दुर्घटना संभव है। ध्यान दें, अभी के परिवेश में यही हुआ है। धैर्य का परिचय दें, अपनी जिम्‍मेदारी खुद लें।

धैर्य सबको चाहिए

यहां मैं अपना अनुभव बता रहा हूं कि मैं और मेरा परिवार खुद कोरोना संक्रमण का शिकार रहा। हाल ही में हम इससे बाहर निकले हैं। उस पूरी अवधि में कुछ भी संभव था पर अपने अनुभव से कह सकता हूं कि हमने बिना घबराए वह किया जो केवल उस वक्‍त जरूरी था। आगे क्‍या होगा, इसे दिमाग में अधिक समय तक नहीं रहने दिया। मेरा पूरा घर अस्‍पताल में तब्‍दील हो गया था। बाहर जाना भी मजबूरी थी लेकिन हरेक को बताते फिरता था कि सामने से हटो मैं पॉजिटिव हूं। यह मेरी मजबूरी थी लेकिन यह सतर्कता रखनी ही थी। बहुत से लोग यह सतर्कता नहीं बरतते और बात बिगड़ जाती है।

बस हमें इसी धैर्य का परिचय देना है। बहुत सोच- समझकर चलना है। यह न सोचें कि कोई संकट टल गया, अब नहीं आएगा। आप भावुक होंगे तो तार्किक नहीं हो पाएंगे। तार्किक होने के लिए धैर्य चाहिए। यह धैर्य सबको चाहिए। व्‍यक्ति को नहीं देश को भी चाहिए। जरा सोचिए, परमाणु बम का प्रयोग करना भी तो अधीरता ही थी। उस एक अधीरता के कारण कितना नुकसान हुआ और आज तक मानवता उस एक गलती को भूल नहीं पायी। हर स्‍तर पर जरूरी है धैर्य। समूचे राष्‍ट्र को धैर्य रखने की जरूरत है।

उसके बाद ही तो दिखेंगे विकल्‍प

परिस्थितियां कितनी भी भयावह जान पड़ें, यदि धैर्य का साथ है तो आपको अनेक विकल्‍प नजर आएंगे। यदि धैर्य का साथ छूटा तो आप भावनाओं के दलदल में फंसते चले जाएंगे। नकारात्‍मक भावनाएं तो दलदल की तरह होती हैं आप जितना इसमें हाथ-पांव मारेंगे, डरेंगे, रोएंगे, घबराएंगे वह आपको और ज्‍यादा धंसा देंगी। नकारात्‍मकता से जितना बचने का प्रयास करते हैं तो वह भाव और बढ़ता जाता है। प्रत्‍यक्ष न दिखे पर अचेतन में बहुत ज्‍यादा हो जाता है।

जरूरी सलाह

  • आपके मन में जो नकारात्‍मक भावनाएं अभी आ रही हैं उसे नकारना नहीं है। उसे पहचानना है। उससे देखकर आंखें नहीं मूंदनी, बल्कि उस पर प्रतिक्रिया नहीं करनी है।
  • किसी चीज को स्‍वीकारने से अधिक कष्‍ट नहीं होता। आप उसे किसी भी रूप में स्‍वीकार कर सकते हैं। चाहे उसे प्रारब्‍ध कहें या ईश्‍वर का प्रसाद मानकर आपकी इच्‍छा, लेकिन उसे स्‍वीकरेंगे तो भावनाओं के भंवर में उलझने से बच जाएंगे।
  • यह बड़ी परस्‍पर विरोधी बात है कि यदि आप भय और भावनात्‍मक उबाल के कारण कार्यविमुख होंगे तो अवसाद होगा। आपको राह नहीं मिलेगी। वहीं यदि कार्योन्‍मुख यानी समस्‍या को स्‍वीकार कर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे तो धीरे-धीरे आप उस अवसाद वाली स्थिति से बाहर निकलते जाएंगे। ऐसा आप तभी कर पाएंगे जब धैर्य होगा।
  •  स्‍वीकार करना सीखें। आप कर सकते हैं तो करें नहीं तो यह भी न भूलें कि आगे बढ़ने के लिए स्‍वीकृति के अलावा दूसरी राह नहीं। धैर्य यही है।

तब वे खोने लगते हैं धैर्य

इंसानों में व्‍यक्तिगत विभिन्‍नताएं हैं। सभी लोग नकारात्‍मक भाव की ओर नहीं जाते। कुछ तनाव से बाउंस बैक करते हैं यानी उसी ऊर्जा से जोरदार प्रहार करते हैं जैसी समस्‍या से वे परेशान हैं। पर अधिकांश में यह प्रवृत्ति होती है कि वे तुरंत घबरा जाते हैं। पसीना छूटने लगता है। उनकी भाषा नकारात्‍मक हो जाती है। इसमें उनके अपने पुराने अनुभव का योगदान होता है। इसे मनोवैज्ञानिक भाषा में ‘सेंसिटविटी टूवर्ड थ्रेट’ कहा जाता है। यह उन लोगों में अधिक होता है जो जीवन में आने वाले संकट से पीड़ित रहे और समाधान नहीं मिला। जबकि यह नहीं भूलना चाहिए कि वातावरण में दोनों चीजें मौजूद हैं। आप कोविड से बचाव के बारे में सोच सकते हैं और सकारात्‍मक पहल कर सकते हैं, पर पुराने अनुभवों के आगे बाध्‍य हो जाते हैं। बस इसी को समझना है और यह बाध्‍यता अपनी सकारात्‍मक ऊर्जा से खत्‍म करनी है।