सरकारी अस्पताल ने की पहल कूड़े से तैयार खाद से होगा धरा का श्रृंगार

अस्पताल परिसर में निगम से प्रेरित होकर नेट युक्त छह कंपोस्टिंग पिट स्थापित की गई है।

घरों में कूड़े की गाड़ी की राह देखनी पड़ती है और जिस दिन कूड़े की गाड़ी नहीं आती है उस दिन कूड़े की बदबू व मच्छर लोगों को काफी परेशान कर देते है। पर यदि हम उस कूड़े से खाद में तब्दील करना सीख जाए तो कितना बेहतर होगा।

नई दिल्ली , खैरा डाबर गांव स्थित चौ. ब्रह्म प्रकाश आयुर्वेदिक चरक संस्थान पहला ऐसा सरकारी अस्पताल है, जो पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझ रहा है। अस्पताल प्रशासन कूड़ा प्रबंधन से जुड़े एक ऐसे माडल को तैयार कर रहा है, जिसमें अस्पताल परिसर में ही गीले और सूखे कूड़े का निष्पादन होगा। कूड़े से बनी इस खाद का इस्तेमाल अस्पताल में बने पांच छोटे पार्कों व 48 एकड़ में फैले हर्बल गार्डन के पोषण में किया जाएगा। एक माह के अंदर कूड़े से खाद की पहली खेप बनकर तैयार हो जाएगी। यदि परिणाम बेहतर रहे तो संस्थान खाद के बाद बिजली व पानी के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में पहल करेगा। पिछले वर्ष इस योजना को तैयार किया गया था, पर कोरोना संक्रमण के कारण इस पर अमल नहीं किया जा सका। पर एक साल के बाद एक बार फिर इस दिशा में प्रयास शुरू किया गया है। अस्पताल परिसर में निगम से प्रेरित होकर नेट युक्त छह कंपोस्टिंग पिट स्थापित की गई है।

होगा काफी लाभ

अतिरिक्त निदेशक (प्रशासनिक) डा. योगेश कुमार पांडे ने बताया कि पहले हर दूसरे दिन अस्पताल से ट्रक भरकर गीला कूड़ा लैंडफिल साइट पर जाता था। कूड़े के पहाड़ की बढ़ती ऊंचाई को कम करने के लिए निगम के प्रयास से प्रेरित होकर अस्पताल प्रशासन ने भी इस दिशा में प्रयास शुरू किया। हालांकि अस्पताल से रोजाना कितना टन कूड़ा निकलता है, इसका कोई मापदंड नहीं है और उस कूड़े से कितने टन खाद बनेगी उसकी भी कोई जानकारी नहीं है। पर हमारी कोशिश है कि अस्पताल से जैविक कूड़ा बिल्कुल बाहर न जाए। इससे पहला कूड़े के पहाड़ को कम करने की दिशा में अस्पताल का महत्वपूर्ण योगदान होगा और दूसरा पेड़-पौधों के पोषण के लिए अब तक खाद को बाजार से खरीदने के लिए जो खर्च होता था उसकी भी बचत होगी। उन रुपयों का दूसरी जगह पर सदप्रयोग किया जा सकेगा। साथ ही कूड़े के निष्पादन को लेकर निगम का बोझ भी इससे काफी हद तक कम हुआ है।

एक-एक को जोड़ बनाएंगे कड़ी

प्रोजेक्ट के निरीक्षक डा. सुभाष साहू बताते हैं कि प्राथमिक स्तर पर अस्पताल के प्रशासनिक ब्लाक, वार्ड, रसोई घर, शिक्षा संस्थान व मेस से निकलने वाले गीले कूड़े और अस्पताल की जमीन पर विकसित पार्क से निकलने वाले सूखे कूड़े से खाद बनाने का प्रयास शुरू किया गया है। इन सब स्थानों पर गीले और सूखे कूड़े के लिए नीले और हरे डस्टबीन लगाए गए है। इसके अलावा अस्पताल के प्रत्येक कर्मचारी, जिसमें चिकित्सक व सफाई कर्मचारी सभी शामिल है को जागरूक किया गया है कि वे अपने-अपने घरों में कूड़े से खाद बनाने का प्रयास करें। यदि घर में संभव नहीं है तो अस्पताल में बनी कंपोस्टिंग यूनिट में लाकर कूड़ा डाल दें। आगामी दिनों में अस्पताल के शिक्षा संस्थान में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी इस अभियान से जोड़ा जाएगा। यदि अस्पताल प्रशासन तमाम स्तरों पर सफल रहा तो नजफगढ़ के एक-एक गांव में जाकर ग्रामीणों को भी इस दिशा में जागरूक किया जाएगा। खेत-खलिहान से निकलने वाले जैविक वेस्ट को किसान भी खाद में तब्दील कर उन्हें फसल के पोषण के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे। डा. सुभाष बताते है कि अस्पताल प्रशासन की कोशिश है कि वे लोगों को जागरूक करें और उन्हें आगे पांच लोगों को जागरूक करने के लिए प्रेरित करें। ताकि धीरे-धीरे एक कड़ी बन जाएं और पर्यावरण के लिए बढ़ते खतरे को कम किया जा सकें।

कूड़े की गाड़ी की नहीं देखनी होगी राह

अभी रोजाना घरों में कूड़े की गाड़ी की राह देखनी पड़ती है और जिस दिन कूड़े की गाड़ी नहीं आती है उस दिन कूड़े की बदबू व मच्छर लोगों को काफी परेशान कर देते है। पर यदि हम उस कूड़े को घर पर ही थोड़े से प्रयास से खाद में तब्दील करना सीख गए तो कूड़े की गाड़ी की राह देखने से निजात मिलेगी और पेड़-पौधों को हरा-भरा रखने के लिए खाद को बाजार से खरीदना नहीं पड़ेगा। डा. योगेश बताते हैं कि वार्ड में भर्ती मरीज व उनके तीमारदारों को इस तरह से जागरूक किया जाता है कि वे एक बार प्रयास जरूर करें। इस कार्य को खानापूर्ति न समझते हुए पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझकर अस्पताल प्रशासन कर रहा है।