मुख्तारनामा : मुख्‍तार अंसारी को जिसने अपना माना, कुछ समय बाद वह बना उसका निशाना

 

जो मुख्‍तार के यहां किसी काम से गए तो फिर हमेशा के लिए परिधि में कैद हो गए।

सैकड़ों लोग हैं जो मुख्‍तार के यहां किसी काम से एक बार गए तो फिर हमेशा के लिए वह मुख्तार की परिधि में कैद हो गए। उसकी पकड़ से बाहर होना फिर उनके लिए फिर इतना आसान न रहा। किसी ने कोशिश की तो खामियाजा भी भुगता।

वाराणसी । पूर्वांचल की एक कहावत, "सटला त गइला.." मऊ विधायक कुख्यात मुख्तार अंसारी पर सटीक बैठती है। इस माफिया से दुश्मनी तो अपनी जगह, जिसने दोस्ती भी की, उसे भी इसने ठिकाने लगा दिया। विहिप के अंतरराष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे नंदकिशोर रूंगटा रहे हों, दिल्ली के व्यापारी विजय गोयल या फिर मऊ की डा. अलका राय, उनके साथ रिश्तों की आड़ में की गई धोखाधड़ी किसी से छिपी नहीं है।

इसके अलावा भी ऐसे सैकड़ों लोग हैं जो उसके यहां किसी काम से एक बार गए तो फिर हमेशा के लिए वह मुख्तार की परिधि में कैद हो गए। उसकी पकड़ से बाहर होना फिर उनके लिए फिर इतना आसान न रहा। किसी ने कोशिश की तो खामियाजा भी भुगता। वाराणसी निवासी कोयला व्यवसायी नंदकिशोर रूंगटा को मुख्तार बाबूजी कहता था। बाद में जब 22 जनवरी 1997 को उनका अपहरण हो गया, तीन करोड़ की फिरौती मांगी गई। आरोप मुख्तार अंसारी व उसके गुर्गों पर लगा। दो करोड़ स्वजनों ने दिए, फिर भी उनकी हत्या हो गई। शव आज तक नहीं मिला। सीबीआइ जांच के बाद भी दो-दो लाख के इनामी उसके गुर्गें नहीं पकड़े जा सके, दोष सिद्ध न होने से मुख्तार बच गया।

इसी तरह दिल्ली के व्यवसायी विजय गाेयल की भी मुख्तार से मित्रता थी, एक पार्टी से बुलाकर कुछ लोग कार में बैठा कर ले गए, फिर उनका पता न चला। अपहर्ताओं ने एक करोड़ रुपये फिरौती मांगी, रुपये लेकर भी हत्या कर दी। इस घटना में भी मुख्तार और उसके गुर्गाें का ही नाम आया। अभी उसकी धोखाधड़ी का ताजातरीन मामला मऊ की स्त्री रोग विशेषज्ञ, भाजपा नेता डाॅ. अलका राय के साथ सामने आया है। एक विवाद के मामले में मुख्तार ने उनकी मदद की। अपनी बड़ी बहन बताते हुए दीदी कहने लगा। बाद में जनसेवा के नाम पर एंबुलेंस चलवाने की बात कह गुर्गों ने अस्पताल के कागजात लिए और फर्जी आइडी व पते पर एंबुलेंस निकलवा ली, जो क्षेत्र में कभी नहीं आई। मुख्तार उसे बुलेट प्रूफ बनवाकर अपने लिए उसका इस्तेमाल करता रहा, मामला खुला तो चिकित्सक इस मामले में कागजात देकर फंस गई हैं। 

राबिनहुड के चेहरे के पीछे की असलियत: गरीबों की मदद के नाम पर राबिनहुड की छवि प्रचारित करवाने वाले मुख्तार की असलियत यह नहीं है। सच तो यह है कि मुख्तार जिसकी भी मदद करता है, उसका अपने कामों के लिए भरपूर उपयोग करता है। जो इसके यहां एक बार गया, वह बकायदा उसके आफिसियल कंप्यूटर में नाम-पता सहित दर्ज हो जाता है। वह आम हाे या खास, जो जिस लायक हो, उसके जिम्मे वह काम लगा दिया जाता है। प्रभाव वाले लोगों को चुनाव में वोटों का ठेका दिया जाता है, खर्च के लिए रुपये भी। चुनाव बाद दी गई जिम्मेदारी के मुताबिक वोट नहीं मिले तो मतदाताओं में बांटे जा चुके रुपयों की उससे निर्ममता से वसूली की जाती है। आम आदमी के लिए भी किसी को वाेट दिलाने, किसी और गरीब को उसके यहां तक मदद के लिए लिवा जाने के काम सौंपे जाते हैं। मतलब यह कि मुख्तार जिसका काम करता है, उससे बदले में उसकी औकात के अनुसार काम लेना भी बखूबी जानता है।