बंगाल चुनाव में बढ़ रही है पहचान की सियासत

 

कोलकाता,  हमारे देश में जाति-पंथ, धर्म और क्षेत्र आधारित ‘आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’ यानी पहचान की राजनीति और बढ़ेगी। चुनावी विमर्श से ‘क्लास पॉलिटिक्स’ यानी वर्ग की राजनीति दूर हो रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है सामाजिक सुरक्षा। पहले खबर आती थी कि अमुक जगह भूख से लोगों की मौत हो गई है लेकिन पिछले सात-आठ वर्षो में ऐसी घटनाएं नहीं हो रही हैं। लोगों को फ्री राशन से लेकर अन्य सरकारी सुविधाएं मिल रही हैं, जिसका नतीजा है कि राजनीतिक दल तो पहचान की सियासत कर ही रहे थे, अब आम लोगों को भी यह भाने लगी है। पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में विकास, रोजगार, किसान -मजदूर और आमजनों से जुड़े मुद्दे पीछे छूट गए हैं।

बंगाल से लेकर असम तक में नेता मंदिर-मंदिर जा रहे हैं। खुद को हिंदू बता रहे हैं। कुछ हैं जो चुनावी सभा में कलमा और चंडी पाठ कर रहे हैं। ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रहे हैं। कुछ हैं कुरान की आयतें चुनावी सभा में पढ़ रहे हैं तो धर्मगुरु पार्टी गठित कर वामो-कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि पहले मुस्लिम वोट बैंक के लिए राजनीति होती थी और अब हिंदू और उसमें भी अलग-अलग जाति, पंथ आधारित सियासत शुरू हो गई है। ऐसा नहीं है कि कोई एक दल ऐसा कर रहा है। हर दल की ओर से पहचान की राजनीति की जा रही है।

बंगाल में 2011 से पहले तक ‘आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’ नहीं थी। इसकी शुरुआत यहां मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने की। पहले उन्होंने मतुआ समुदाय को वोट के लिए तुष्ट किया, फिर कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों और वाममोर्चा समर्थक मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए इमाम व मोअज्जिम भत्ता शुरू कर दिया। उत्तर बंगाल में अलग गोरखालैंड राज्य के लिए चल रहे आंदोलन को खत्म करने के लिए ममता ने तमांग, गुरुंग जैसी 14 जातियों को साधने के लिए अलग-अलग विकास बोर्ड बना दिए। इस तरह अलग-अलग समुदाय, पंथ को साधने से ममता को 2014 केलोकसभा और 2016 के विधानसभा चुनाव में बहुत लाभ मिला, हालांकि बाद में पहचान की राजनीति का दांव ममता को उल्टा पड़ने लगा। भाजपा ने मुस्लिम तुष्टीकरण का मुद्दा उठाया तो ममता से हिंदू वोटर धीरे-धीरे दूरी बनाने लगे।

2016 के विधानसभा चुनाव के बाद से लेकर 2019 के बीच बंगाल में जितने भी उपचुनाव हुए, उनमें देखा गया कि ज्यादातर हिंदू वोट भाजपा की तरफ गया। इस बीच मुस्लिम समुदाय के अधिकतर नेता व कार्यकर्ता वाममोर्चा व कांग्रेस को छोड़कर तृणमूल कांग्रेस की ओर जाने लगे। वहीं हिंदू नेता व कार्यकर्ता का रूझान भाजपा की ओर बढ़ने लगा तो वाममोर्चा व कांग्रेस के समर्थक भी दो भागों में बंट गए। एक तरफ मुस्लिम तृणमूल की ओर तो हिंदू भाजपा की ओर से रूख करने लगे। इसके बाद ममता बनर्जी ने मुस्लिम समुदाय को अपने साथ बनाए रखने के साथ हिंदू वोट बैंक में दरार डालने के लिए गोरखा, लेपचा, आदिवासी, राजबंशी, मतुआ, बाउड़ी, बागदी को अलग-अलग तरीके से साधने की कोशिश की ताकि भाजपा पूरे बांग्ला के हिंदुओं को एकजुट न कर सके। भाजपा चाहती है कि मुस्लिमों के खिलाफ हिंदू वोटरों को एकजुट रखने के साथ यदि मुस्लिम वोटों का कुछ बिखराव कर दिया जाए तो उसके लिए राह और आसान हो जाएगी।

इसे लेकर तृणमूल व अन्य विपक्षी पार्टियां लगातार यह आरोप लगाती रही है कि मीम यानी असदद्दुीन ओवैसी और फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी जैसे लोग भाजपा की बी टीम के सदस्य हैं, हालांकि अब्बास सिद्दीकी, वाम व कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा हैं। दूसरी तरफ पहचान की राजनीति सिर्फ बंगाल में ही नहीं है। आप केरल में देख लें तो वहां यदि वामपंथी दल के लगातार दूसरी बार सत्ता में आने की इस बार संभावना है तो यह भी पहचान की राजनीति के ही चलते। वहीं असम में पहचान की राजनीति भाजपा के वहां जाने से काफी पहले से चल रही है। भाजपा ने तो सिर्फ वहां हिंदू वोटरों को एकजुट किया है। यदि लोगों को मुफ्त और दो रुपये किलो चावल-गेहूं देने जैसी योजना हो या अन्य सामाजिक सुरक्षा वाली स्कीमें तो इसका दायरा जितना बढ़ेगा, पहचान की राजनीति उतनी ही बढ़ेगी।