चुनाव में मुद्दों को मतदाताओं की धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर परोसा जा रहा

जब देश ‘मुफ्तखोर-राजनीति’ की गिरफ्त में हो तो मुद्दों की क्या अहमियत?

विधानसभा चुनावों में विचारधारा विकास और अस्मिता के चक्रवात से उठे गुबार के शांत होने पर क्या परिदृश्य उभरेगा यह दो मई 2021 को ही साफ हो पायेगा। चुनाव में मुद्दों को मतदाताओं की धाíमक आस्थाओं या सांस्कृतिक-सामाजिक अस्मिता से जोड़कर परोसा जा रहा है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव-प्रचार में लगभग सभी दलों ने राजनीतिक-आर्थिक मुद्दों को पीछे रख जाति, संप्रदाय, चंडी-पाठ, जनेऊ, गोत्र, मंदिर और गैर-राजनीतिक मुद्दों को प्राथमिकता दी है। क्या दलों के पास राजनीतिक मुद्दों का अकाल हो गया है? या उनको लगता है कि मतदाताओं को राजनीतिक-आर्थिक मुद्दों में कोई दिलचस्पी नहीं?

चुनाव-प्रचार मतदाताओं को लुभाने के लिए किया जाता है। मतदाता दो प्रकार के होते हैं; एक प्रतिबद्ध, जो दल-विशेष से जुड़े होते हैं; दूसरे ‘फ्लोटिंग’ जो किसी भी दल की ओर मुड़ सकते हैं। प्रतिबद्ध मतदाताओं को प्रचार से कोई फर्क नहीं पड़ता। ‘फ्लोटिंग’ मतदाता, जो कुल मतदाताओं का लगभग 6-7 प्रतिशत होते हैं, प्रचार से प्रभावित होते हैं। भारत में अनेक प्रत्याशी और राजनीतिक दल निर्वाचन-क्षेत्र में पैसा, शराब, साड़ियां, आभूषण या अन्य सामान बांटकर गरीब मतदाताओं को लुभाने का प्रयास करते हैं। तमिलनाडु में 1967 में द्रुमक के संस्थापक सीएन अन्नादुरई ने एक रुपये में 4.5 किग्रा चावल से जिस ‘मुफ्तखोर-राजनीति’ की शुरुआत की वह आज पूरे देश में परवान चढ़ चुकी है। जहां मार्च 2021 में चार लाख 85 हजार करोड़ रुपये घाटे का बजट प्रस्तुत हुआ हो वहां द्रमुक नेता स्टॉलिन द्वारा प्रत्येक परिवार की सबसे बुजुर्ग महिला को एक हजार रुपये और अन्नाद्रुमक के मुख्यमंत्री के पलानीस्वामी द्वारा डेढ़-हजार रुपये प्रतिमाह देने का चुनावी-वादा आत्मघाती लगता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने केरल में मुख्यमंत्री पिनरई विजयन की एलडीएफ द्वारा सोने की तस्करी से प्रदेश की जनता को धोखा देने की तुलना जुडस द्वारा ईसामसीह को दिए धोखे से की। उन्होंने एलडीएफ और यूडीएफ दोनों पर ईसाई धर्म में प्रचलित ‘सेवेन-सिंस’ अर्थात सात-पाप करने का आरोप लगाया। सबरीमाला मंदिर और जल्लीकट्टू के समर्थन द्वारा उन्होंने जनता से जुड़ने की कोशिश की। मोदी ने ‘फ्रास्ट’ अर्थात फिशरीज व फर्टलिाइजर, एग्रीकल्चर, आयुर्वेद, स्किल डेवलपमेंट व सोशल-जस्टिस, टूरिज्म और टेक्नोलॉजी द्वारा विकास को भी मुद्दा बनाया। असम में भी सीएए, एनआरसी, घुसपैठिए, डी-वोटर्स और ‘अजमल’ को असम की पहचान बनाना आदि मुद्दे हैं जो ‘असमिया-अस्मिता’ को केंद्र में लाते हैं। बंगाल में मतदाताओं की राजनीतिक निष्ठाएं जल्दी बदलती नहीं। उन्होंने 34 वर्षो(1977-2011) तक मार्क्‍सवादी-वामपथी दलों और 10 वर्षो से तृणमूल कांग्रेस (ममता बनर्जी) को सत्ता में रखा है। लेकिन इस बार वहां सत्ता-परिवर्तन की सुगबुगाहट है। वामपंथी-दलों का जनाधार ‘सर्वहारा’ मजदूर और गरीब रहा है।

यदि वह आर्थिक-रूप से संपन्न हो जाए तो वाम-दलों का जनाधार खत्म हो जाता है। अत: वामपंथी सरकारों ने औद्योगिक विकास नहीं होने दिया। परिणामस्वरूप, बंगाल के मजदूरों को मजबूरन वामपंथ छोड़ विकास हेतु ममता की ओर आना पड़ा। ममता ने वामपंथी जनाधार में शामिल मुस्लिमों को वोट-बैंक के रूप में रख लंबी राजनीतिक पारी खेलने की रणनीति बनाई। वे वामपंथी मतदाताओं में तालमेल बैठाने की जगह मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की नीति पर चल पड़ी। लिहाजा ममता का जनाधार सांप्रदायिक आधार पर दरकने लगा। 2014 व 2019 लोकसभा तथा 2015 विधानसभा चुनावों में दलित और पिछड़े-वर्ग के मतदाता ममता से कटने और भाजपा से जुड़ने लगे। मुर्शिदाबाद, मालदा और नार्थ-दीनाजपुर में मुस्लिम आबादी हंिदूू जनसंख्या को पार कर गई है। दैनिक जीवन में हिंदू-मुस्लिम संघर्षो में मुस्लिमों को संरक्षण दे ममता सरकार ने हिंदुओं में असुरक्षा का भाव भर दिया। ममता के विकास कार्यो पर हिंदू समाज में बढ़ती असुरक्षा भारी पड़ गई है। ममता ने बाहरी-भीतरी का जो मुद्दा भाजपा के विरुद्ध उठाया, वह स्वयं उन पर भारी पड़ सकता है क्योंकि नंदीग्राम में भाजपा के सुवेंदु के मुकाबले वे बाहरी मानी गई हैं। अत: बंगाल चुनावों में विचारधारा और विकास महत्वहीन तथा अस्मिता व सुरक्षा प्रधान मुद्दे हो गये हैं।

भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण को प्रमुखता दी है। बेटी-बचाओ, बेटी-पढाओ, अल्पसंख्यक लड़कियों के लिए 51 हजार रुपये की ‘शादी शगुन योजना’ और तीन-तलाक आदि से भाजपा ने मुस्लिम-महिला मतदाताओं का दिल भी जीता है। प्रधानमंत्री मोदी ने तमिलनाडु में द्रुमक के सांसद ए राजा पर मुख्यमंत्री पलानीस्वामी की माता और अन्य महिलाओं के प्रति असम्मानजनक टिप्पणियों को भी मुद्दा बनाया। यह इन चुनावों में ‘गेम-चेंजर’ हो सकता है। विधानसभा चुनावों में विचारधारा, विकास और अस्मिता के चक्रवात से उठे गुबार के शांत होने पर क्या परिदृश्य उभरेगा, यह दो मई, 2021 को ही साफ हो पायेगा।