आखिर कोरोना वायरस संक्रमित मरीज को क्यों पड़ती है वेंटिलेटर की जरुरत

 

वायरस से संक्रमित मरीज को वेंटिलेटर पर क्यों डालना पड़ रहा है। क्या है इसके पीछे का कारण।

 कोरोना वायरस शरीर सीधे मनुष्य की श्वसन प्रणाली पर हमला करता है। कोरोना वायरस से संक्रमित मामलों में देखा जा रहा है कि वायरस फेफड़ों के इतने अंदर बैठा जाता है कि मरीज के लिए सांस लेना ही मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जल्द से जल्द वेंटिलेटर लगाने की जरूरत पड़ती है।

नई दिल्ली, आनलाइन डेस्क।  कोरोना वायरस का संक्रमण जिस तरीके से बढ़ रहा है उस हिसाब से गंभीर मरीजों की संख्या में भी इजाफा होता जा रहा है। किसी बीमारी से पीड़ित मरीजों को बचा पाना मुश्किल हो रहा है। वायरस का संक्रमण होने पर उन्हें सीधे वेंटिलेटर पर डालना पड़ रहा है। जिनको वेंटिलेटर नहीं मिल पा रहा है उनकी मौत हो जा रही है। हम आपको बताते हैं कि आखिर वायरस से संक्रमित मरीज को वेंटिलेटर पर क्यों डालना पड़ रहा है। क्या है इसके पीछे का कारण।

दरअसल कोरोना वायरस शरीर सीधे मनुष्य की श्वसन प्रणाली पर हमला करता है। कोरोना वायरस से संक्रमित मामलों में देखा जा रहा है कि वायरस फेफड़ों के इतने अंदर बैठा जाता है कि मरीज के लिए सांस लेना ही मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जल्द से जल्द वेंटिलेटर लगाने की जरूरत पड़ती है। समस्या तब शुरू होती है जब मरीजों की संख्या वेंटिलेटर से ज्यादा हो जाए। दुनिया के विकसित देश भी इस वक्त इस समस्या से जूझ रहे हैं। वायरस के पहले चरण में कुछ देशों में तो डॉक्टरों ने यहां तक तय कर लिया था कि कोरोना से संक्रमित किन मरीजों को वेंटिलेटर लगाना है और किन्हें नहीं, उसके बाद ही कुछ काबू पाया जा सका था।

कैसे काम करता हैं वेंटिलेटर?

फेफड़े जब काम करना बंद कर देते हैं तब शरीर को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और ना ही शरीर के अंदर मौजूद कार्बन डायऑक्साइड बाहर निकल पाती है। ऐसे में कुछ ही देर में दिल भी काम करना बंद कर देता है और मरीज की मौत हो जाती है।

वेंटिलेटर के जरिए शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है। यह ऑक्सीजन फेफड़ों में वहां पहुंचती है जहां बीमारी के कारण तरल पदार्थ भर चुका होता है। आधुनिक वेंटिलेटर मरीज की जरूरतों के हिसाब से शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाते हैं। पीसीवी यानी प्रेशर कंट्रोल्ड वेंटिलेटर सांस की नली और फेफड़ों की कोशिकाओं के बीच कुछ इस तरह से दबाव बनाते हैं कि शरीर में ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन पहुंच सके। जैसे ही सही प्रेशर बनता है शरीर से कार्बन डायऑक्साइड निकलने लगती है, इस तरह से वेंटिलेटर की मदद से इंसान सांस लेने लगता है।

वेंटिलेटर लगे मरीज का हाल

वेंटिलेटर अलग अलग तरह के होते हैं। नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन में नाक और मुंह को ढंकता हुआ एक मास्क लगाया जाता है जो सांस लेने में मदद करता है। इंवेसीज वेंटिलेशन जिसे इंट्यूबेशन भी कहा जाता है में नाक या मुंह के जरिए एक ट्यूब को सांस की नली यानी विंड पाइप में डाला जाता है। अगर मरीज की हालत बहुत ज्यादा खराब हो तो ट्रेकिआटमी का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें गले में एक छोटा सा सुराख कर ऑक्सीजन वाली ट्यूब को सीधे विंड पाइप में डाला जाता है। जिस मरीज को वेंटिलेटर लगा हो वह ना बोल सकता है, ना कुछ खा सकता है। एक अलग ट्यूब के जरिए उसके शरीर में ग्लूकोस पहुंचाया जाता है।


वेंटिलेटर की इतनी कमी क्यों है?

कोरोना वायरस का जिस तरह से संक्रमण पूरी दुनिया में फैला हो उसको देखते हुए इन दिनों पूरी दुनिया में वेंटिलर की किल्लत हैं। कम समय में वेंटिलेटर की संख्या बढ़ाना विकसित देशों के लिए भी मुश्किल हुआ है। एक हाय परफॉर्मेंस वेंटिलेटर की कीमत यूरोप में 50,000 यूरो तक होती है यानी करीब 40 लाख रुपये। ऐसी गिनी चुनी कंपनियां हैं जो इस तरह के अत्याधुनिक वेंटिलेटर बनाती हैं जो कृत्रिम फेफड़े की तरह काम करने में सक्षम हैं। हालांकि इन कंपनियों ने इस बीच तेजी से वेंटिलेटर का उत्पादन शुरू कर दिया है लेकिन यह अभी भी काफी नहीं है।

वेंटिलेटर बढ़ जाना समस्या का समाधान नहीं

अगर भारी मात्रा में वेंटिलेटर मिल भी जाएं तो भी समस्या खत्म नहीं होगी क्योंकि अस्पताल का हर स्टाफ इन पेचीदा वेंटिलेटर का इस्तेमाल नहीं जानता है। ऐसे में प्रशिक्षित स्टाफ की कमी भी एक मुद्दा बन जाएगी। 2010 के आंकड़ों के मुताबिक इटली में एक लाख पर महज 12.5 इंटेंसिव केयर बेड थे। हालांकि कोरोना संकट के शुरू होने के बाद इनकी तादाद को बहुत तेजी से बढ़ाया गया है।