बंगाल को राजनीतिक प्रतिशोध और हिंसा के दुष्चक्र से बाहर निकाल सकती है भाजपा

 

नतीजा 2019 के लोकसभा चुनाव में सामने आया जब भाजपा ने राज्य की 18 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की।

 भाजपा से उम्मीद है कि वह बंगाल को राजनीतिक प्रतिशोध और हिंसा के दुष्चक्र से बाहर निकालने का काम करेगी ताकि यह राज्य अपनी सारी संभावनाओं को सच्चाई में बदलने में सफल हो सके।

 बंगाल विधानसभा चुनाव में दो चरणों में 60 सीटों के लिए मतदान के बाद सत्ताधारी तृणमूल और उसे चुनौती दे रही भाजपा इनमें से ज्यादातर सीटें जीतने के दावे कर रही हैं। हालांकि तीसरे चरण के लिए छह अप्रैल को मतदान से पहले राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस तरह से भाजपा को देश के लिए खतरा बताते हुए सभी दलों से उसे हराने की अपील की है, उससे तो यही लगता है कि उनकी स्थिति कमजोर हो रही है। उन्होंने दूसरे चरण के मतदान के दिन भाजपा विरोधी सभी दलों को पत्र लिखकर समर्थन मांगा, पर अभी तक उन्हें सिर्फ पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और शिव सेना प्रमुख एवं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का ही साथ मिला है।

कांग्रेस और माकपा जैसी पार्टियों ने भले ही ममता की चिट्ठी का जवाब नहीं दिया है, लेकिन बंगाल में चुनाव लड़ रहे भाजपा विरोधी दलों में अंदरखाने यह सहमति बनती दिख रही है कि जो जहां मजबूत है, उसे वहां सभी मिलकर समर्थन करें। इस तरह राज्य विधानसभा चुनाव भाजपा बनाम बाकी दलों के बीच की लड़ाई में बदलता दिख रहा है। ममता बनर्जी की पूरी कोशिश है कि अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन न हो, जबकि भाजपा की रणनीति हिंदू वोटों को इकट्ठा रखने पर है। ममता येन-केन-प्रकारेण हिंदू वोटों की गोलबंदी की भाजपा की कोशिश को विफल करना चाहती हैं। चुनावी मंचों से चंडी पाठ करने के बाद अपना गोत्र बताने की उनकी कोशिश को इसी रणनीति के तहत देखा जा रहा है।दूसरी तरफ, भाजपा पूरे दमखम के साथ अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट रखने के ममता के प्रयासों को उजागर कर लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रही है। सिर्फ ममता बनर्जी के लिए ही नहीं, बल्कि राजनीतिक पंडितों के लिए भी यह चुनाव काफी चुनौती भरा है। इस राजनीतिक संग्राम के परिणाम के लिए तो हमें दो मई तक का इंतजार करना होगा, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि 10 साल के शासन के दौरान ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही है। हालांकि तृणमूल के जीत के दावे कर रहे राजनीतिक पंडितों को लगता है कि सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद अभी भी ममता अपने व्यक्तिगत करिश्मा के दम पर इस चुनाव में पार्टी की नैया को पार लगा देंगी, क्योंकि उन्हें चुनौती दे रही भाजपा एवं दूसरे दलों के पास उनके जैसा कोई नेता नहीं है।

 बंगाल विधानसभा चुनाव में दो चरणों में 60 सीटों के लिए मतदान के बाद सत्ताधारी तृणमूल और उसे चुनौती दे रही भाजपा इनमें से ज्यादातर सीटें जीतने के दावे कर रही हैं। हालांकि तीसरे चरण के लिए छह अप्रैल को मतदान से पहले राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस तरह से भाजपा को देश के लिए खतरा बताते हुए सभी दलों से उसे हराने की अपील की है, उससे तो यही लगता है कि उनकी स्थिति कमजोर हो रही है। उन्होंने दूसरे चरण के मतदान के दिन भाजपा विरोधी सभी दलों को पत्र लिखकर समर्थन मांगा, पर अभी तक उन्हें सिर्फ पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और शिव सेना प्रमुख एवं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का ही साथ मिला है।
कांग्रेस और माकपा जैसी पार्टियों ने भले ही ममता की चिट्ठी का जवाब नहीं दिया है, लेकिन बंगाल में चुनाव लड़ रहे भाजपा विरोधी दलों में अंदरखाने यह सहमति बनती दिख रही है कि जो जहां मजबूत है, उसे वहां सभी मिलकर समर्थन करें। इस तरह राज्य विधानसभा चुनाव भाजपा बनाम बाकी दलों के बीच की लड़ाई में बदलता दिख रहा है। ममता बनर्जी की पूरी कोशिश है कि अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन न हो, जबकि भाजपा की रणनीति हिंदू वोटों को इकट्ठा रखने पर है। ममता येन-केन-प्रकारेण हिंदू वोटों की गोलबंदी की भाजपा की कोशिश को विफल करना चाहती हैं। चुनावी मंचों से चंडी पाठ करने के बाद अपना गोत्र बताने की उनकी कोशिश को इसी रणनीति के तहत देखा जा रहा है।
दूसरी तरफ, भाजपा पूरे दमखम के साथ अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट रखने के ममता के प्रयासों को उजागर कर लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रही है। सिर्फ ममता बनर्जी के लिए ही नहीं, बल्कि राजनीतिक पंडितों के लिए भी यह चुनाव काफी चुनौती भरा है। इस राजनीतिक संग्राम के परिणाम के लिए तो हमें दो मई तक का इंतजार करना होगा, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि 10 साल के शासन के दौरान ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही है। हालांकि तृणमूल के जीत के दावे कर रहे राजनीतिक पंडितों को लगता है कि सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद अभी भी ममता अपने व्यक्तिगत करिश्मा के दम पर इस चुनाव में पार्टी की नैया को पार लगा देंगी, क्योंकि उन्हें चुनौती दे रही भाजपा एवं दूसरे दलों के पास उनके जैसा कोई नेता नहीं है।
प्रश्न यह है कि 10 साल पहले वामपंथियों के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंकने वाली ममता आज इस स्थिति में क्यों पहुंच गई हैं कि उन्हें जीतने के लिए अपने विरोधियों से भी समर्थन मांगने की जरूरत पड़ गई। सच्चाई यह है कि राज्य की जनता ने जिस अग्निकन्या को वोट देकर सत्ता पर बिठाया था, वह उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई हैं। जनता को उम्मीद थी कि ममता उन्हें वामपंथियों के सिंडिकेट राज से मुक्ति दिलाएंगी। औद्योगिक विकास का मार्ग प्रशस्त करेंगी और राज्य को उसका खोया हुआ गौरव वापस दिलाएंगी, लेकिन इसके ठीक उलट उन्होंने उसी सिंडिकेट राज को मजबूती प्रदान की, जिसके खिलाफ लड़कर वह सत्ता में आई थीं। एक विचारधारा विहीन पार्टी के मुखिया के तौर पर ममता ने प्रतिशोध और हिंसा की राजनीति को बढ़ावा दिया। जीत की शर्त पर वह अपने कार्यकर्ताओं व नेताओं की राजनीतिक उद्दंडता को नजरअंदाज करती रहीं, लेकिन यही राजनीतिक पूंजी अब उनके लिए बोझ बन गई है।
वामपंथियों को सत्ता से बेदखल करने के बाद ममता बनर्जी ने वह सब कुछ किया, जिसका वह पहले विरोध करती थीं। इस क्रम में 2018 का पंचायत चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। तृणमूल के आतंक का इतना ज्यादा असर हुआ कि पार्टी ने पंचायत की 30 प्रतिशत सीटें निíवरोध जीत लीं, क्योंकि विरोधी दलों को नामांकन ही नहीं भरने दिया गया। इस तरह 1978 में पहले पंचायत चुनाव के बाद तृणमूल ने निíवरोध सीटें जीतने का रिकार्ड बनाया। इस चुनाव के बाद ही वामपंथी दलों के समर्थकों ने तय किया कि अगर तृणमूल से लड़ना है तो भाजपा का साथ देना ही होगा। इसका नतीजा 2019 के लोकसभा चुनाव में सामने आया जब भाजपा ने राज्य की 18 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की।
इसमें दोराय नहीं कि राज्य की मौजूदा स्थिति के लिए वामपंथी ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। वर्ष 1977 में पार्टी के निशान पर पंचायत चुनाव कराने का फैसला कर राज्य में नागरिक समाज के बजाय पार्टी समाज बनाने का काम वामपंथियों ने ही किया। वामपंथी पार्टयिों का यह प्रयास बुरी तरह विफल हुआ। उस दौर में पंचायत चुनाव में निíवरोध जीत हासिल कर वामपंथियों ने अपनी सत्ता तो मजबूत की, पर लोकतंत्र कमजोर होता गया।
अब सवाल यह है कि अगर भाजपा राज्य में तृणमूल को सत्ता से हटाने में सफल हो जाती है तो क्या वह जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को फिर से स्थापित करने के लिए दलविहीन पंचायत चुनाव का रास्ता तैयार करेगी या अपने राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए अब तक चली आ रही आतंक की राजनीति को ही बढ़ावा देगी? भाजपा से उम्मीद है कि वह बंगाल को राजनीतिक प्रतिशोध और हिंसा के दुष्चक्र से बाहर निकालने का काम करेगी, ताकि यह राज्य अपनी सारी संभावनाओं को सच्चाई में बदलने में सफल हो सके।

प्रश्न यह है कि 10 साल पहले वामपंथियों के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंकने वाली ममता आज इस स्थिति में क्यों पहुंच गई हैं कि उन्हें जीतने के लिए अपने विरोधियों से भी समर्थन मांगने की जरूरत पड़ गई। सच्चाई यह है कि राज्य की जनता ने जिस अग्निकन्या को वोट देकर सत्ता पर बिठाया था, वह उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई हैं। जनता को उम्मीद थी कि ममता उन्हें वामपंथियों के सिंडिकेट राज से मुक्ति दिलाएंगी। औद्योगिक विकास का मार्ग प्रशस्त करेंगी और राज्य को उसका खोया हुआ गौरव वापस दिलाएंगी, लेकिन इसके ठीक उलट उन्होंने उसी सिंडिकेट राज को मजबूती प्रदान की, जिसके खिलाफ लड़कर वह सत्ता में आई थीं। एक विचारधारा विहीन पार्टी के मुखिया के तौर पर ममता ने प्रतिशोध और हिंसा की राजनीति को बढ़ावा दिया। जीत की शर्त पर वह अपने कार्यकर्ताओं व नेताओं की राजनीतिक उद्दंडता को नजरअंदाज करती रहीं, लेकिन यही राजनीतिक पूंजी अब उनके लिए बोझ बन गई है।

वामपंथियों को सत्ता से बेदखल करने के बाद ममता बनर्जी ने वह सब कुछ किया, जिसका वह पहले विरोध करती थीं। इस क्रम में 2018 का पंचायत चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। तृणमूल के आतंक का इतना ज्यादा असर हुआ कि पार्टी ने पंचायत की 30 प्रतिशत सीटें निíवरोध जीत लीं, क्योंकि विरोधी दलों को नामांकन ही नहीं भरने दिया गया। इस तरह 1978 में पहले पंचायत चुनाव के बाद तृणमूल ने निíवरोध सीटें जीतने का रिकार्ड बनाया। इस चुनाव के बाद ही वामपंथी दलों के समर्थकों ने तय किया कि अगर तृणमूल से लड़ना है तो भाजपा का साथ देना ही होगा। इसका नतीजा 2019 के लोकसभा चुनाव में सामने आया जब भाजपा ने राज्य की 18 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की।

इसमें दोराय नहीं कि राज्य की मौजूदा स्थिति के लिए वामपंथी ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। वर्ष 1977 में पार्टी के निशान पर पंचायत चुनाव कराने का फैसला कर राज्य में नागरिक समाज के बजाय पार्टी समाज बनाने का काम वामपंथियों ने ही किया। वामपंथी पार्टयिों का यह प्रयास बुरी तरह विफल हुआ। उस दौर में पंचायत चुनाव में निíवरोध जीत हासिल कर वामपंथियों ने अपनी सत्ता तो मजबूत की, पर लोकतंत्र कमजोर होता गया।

अब सवाल यह है कि अगर भाजपा राज्य में तृणमूल को सत्ता से हटाने में सफल हो जाती है तो क्या वह जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को फिर से स्थापित करने के लिए दलविहीन पंचायत चुनाव का रास्ता तैयार करेगी या अपने राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए अब तक चली आ रही आतंक की राजनीति को ही बढ़ावा देगी? भाजपा से उम्मीद है कि वह बंगाल को राजनीतिक प्रतिशोध और हिंसा के दुष्चक्र से बाहर निकालने का काम करेगी, ताकि यह राज्य अपनी सारी संभावनाओं को सच्चाई में बदलने में सफल हो सके।