विधानसभा चुनावों में गैर विकास से जुड़े बढ़ते मुद्दे और राजनेताओं की बदलती रंगत

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आखिर चुनाव के ऐन समय वे क्यों इन गैर जरूरी मुद्दों को उछालने पर विवश हैं?

 सरकार ने विकास का काम किया होता तो आज दावे के साथ वह अपने कामों को गिना सकती थी। खैर..मतदाता किसी लोकतंत्र का सबसे ताकतवर प्राणी होता है। अगर वह सत्ता तक पहुंचा सकता है तो उसकी सुधि न लेने पर सत्ताबदर करने की उसे सुध आ सकती है।

नई दिल्‍ली। बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी समेत पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों की सरगर्मी अपने चरम पर है। हर राजनीतिक दल साम-दाम-दंड भेद से अगली बार सत्ता में आने की मंशा दिखा रहा है। इन प्रदेशों के लोग भी नई सरकार के गठन को लेकर काफी उत्सुक दिख रहे हैं। बंगाल और असम में हुए पहले दो चरणों के चुनावों में मतदाताओं की जबरदस्त भागीदारी कम से कम यही कहानी कह रही है।

उन्हें उम्मीद है कि अपने जिस कल्याण और जीवन स्तर सुधरने का वह सपना सालों से देखते रहे हैं, जल्द ही बनने वाली नई सरकार उनके उन अरमानों को पूरा करेगी। उनकी सोच कतई गलत नहीं है। हर चुनाव में मतदाता इसी अपेक्षा के साथ राजनीतिक दलों को अपना मत देने जाता है लेकिन यह क्या.. सहज और सरल आम आदमी की इस सोच से प्रतिकूल नेताओं का आचार-विचार और व्यवहार कुछ और सच्चाई बयां कर रहा है। कोई अपना गोत्र बता रहा है, तो कोई धर्मस्थलों के चक्कर काट रहा है।

जनेऊधारी और गैरजनेऊधारी की बहस छिड़ी हुई है। बाहरी-भीतरी के आरोप-प्रत्यारोप मढ़े जा रहे हैं। गोल टोपी बहस के केंद्र में है। रोटी, कपड़ा, मकान और बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा स्वास्थ्य पर ये तथाकथित मुद्दे भारी पड़े हुए हैं। विकास..तीन अक्षरों से बने इस शब्द का बड़ा नाम सुना और सुनाया जाता है। लेकिन लगता है कि हमारे राजनेताओं ने अपने शब्दकोश से इस शब्द को हटा दिया है। आखिर चुनाव के ऐन समय वे क्यों इन गैर जरूरी मुद्दों को उछालने पर विवश हैं? बात मतदाताओं जैसी ही सीधी और सरल है। अगर सरकार ने विकास का काम किया होता तो आज दावे के साथ वह अपने कामों को गिना सकती थी। खैर..मतदाता किसी लोकतंत्र का सबसे ताकतवर प्राणी होता है। अगर वह सत्ता तक पहुंचा सकता है तो उसकी सुधि न लेने पर सत्ताबदर करने की उसे सुध भी आ सकती है। ऐसे में विधानसभा चुनावों में गैर विकास से जुड़े बढ़ते मुद्दे और राजनेताओं की बदलती रंगत की पड़ताल हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

बिगड़े बोल:

जो भी भाजपा से हैं सुनें, दूध मांगोगे तो खीर देंगे, अगर बंगाल मांगोगे तो चीर देंगे

टीएमसी नेता मदन मित्र (20 जनवरी)

भाजपा सिर्फ झूठे वादे करती है। वह मीर जाफर और डकैतों की पार्टी है। यूपी में आज क्या हो रहा है। महिलाओं और दलितों की हालत वहां खराब है।

ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, बंगाल

दिवंगत वरिष्ठ भाजपा नेता सुषमा स्वराज और अरुण जेटली का इसलिए निधन हो गया, क्योंकि वे पीएम मोदी द्वारा दिए जा रहे दबाव को सहन नहीं कर पा रहे थे

उदयनिधि स्टालिन, द्रमुक नेता, तीन अप्रैल को तमिलनाडु में रैली के दौरान

के. पलानीस्वामी गुड़ और चीनी के मार्केट में काम करते थे। ऐसे में वो कैसे स्टालिन को चुनौती दे सकते हैं। स्टालिन के चप्पल की कीमत भी पलानीस्वामी से एक रुपये ज्यादा होगी

ए राजा, पूर्व केंद्रीय मंत्री और द्रमुक सांसद, तमिलनाडु में एक चुनावी सभी के दौरान (27 मार्च)

अगर भारत के 30 फीसद मुसलमान एक हो जाएं तो भारत में चार नए पाकिस्तान बन सकते हैं।

शेख आलम, तृणमूल कांग्रेस नेता (25 मार्च)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी रैली में जिस तरह से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ‘दीदी-ओ-दीदी’ कहकर बुला रहे हैं, वे बिल्कुल सड़क छाप लड़के की तरह बर्ताव कर रहे हैं।

महुआ मैत्र, तृणमूल कांग्रेस सांसद

ममता बनर्जी के बरमूडा पहनने में हर्ज ही क्या है। फिर भी अगर उन्हें इससे परहेज है तो बंगाल में एक ‘छोटू साड़ी’ आती है। उसे पहन लेने पर चोटिल पैर दिखाने में आसानी होगी।

अग्निमित्र पाल, अध्यक्ष, बंगाल महिला मोर्चा

मुख्यमंत्री अपना प्लास्टर चढ़ा पैर सबको दिखाना चाहती हैं। वह साड़ी के बदले बरमूडा क्यों नहीं पहन लेतीं? मैंने अब तक किसी को इस तरह साड़ी उठाकर अपना पैर दिखाते नहीं देखा।

दिलीप घोष, अध्यक्ष बंगाल भाजपा

जिसका नमक खाते हैं, उससे दगाबाजी नहीं करते। चुनाव बाद उन सभी से मिलूंगा, जिन्होंने धोखा दिया है। बेईमान लोगों को किसी भी हालत में नहीं बख्शेंगे और उनके साथ खेल खेला जाएगा।