मास्क लगाने को लेकर आप भी पढ़ लीजिये SC की यह अहम टिप्पणी, शुरू कर देंगे नियमों का पालन करना

 

दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थल पर कार में अकेले होने पर मास्क लगाना अनिवार्य होगा।

दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि मास्क नहीं लगाना और शारीरिक दूरी के नियम का पालन नहीं करना दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन है। बहुत से लोग दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहे हैं।

नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। कोरोना वायरस संक्रमण की ताजा लहर खतरनाक होती जा रही है। दिल्ली में जहां रोजाना 5000 से अधिक मामले सामने आ रहे हैं तो देशभर में बृहस्पतिवार को 24 घंटे के दौरान कोरोना के मामले सवा लाख आए हैं। वहीं, देश-दुनिया के तमाम विशेषज्ञ लगातार कह रहे हैं कि कोरोना वायरस को हराने का सबसे आसान रास्ता मास्क लगाना और शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करना है। ऐसे में अगर आप भूल गए हैं तो हम आपको याद दिला देते हैं कि दिसंबर महीने में सुनवाई के दौरान कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच मास्क लगाने और शारीरिक दूरी के नियमों के प्रति लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था। दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि मास्क नहीं लगाना और शारीरिक दूरी के नियम का पालन नहीं करना दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन है। बहुत से लोग दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा था कि मास्क और शारीरिक दूरी के नियमों का कड़ाई से पालन होना चाहिए, लेकिन लोग बेधड़क पूरे देश में कोरोना के दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं।

वहीं, बुधवार को भी कोरोना वायरस को फैलने से रोकने में मास्क को सुरक्षा कवच बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थल पर कार में अकेले होने पर भी मास्क लगाना अनिवार्य होगा। चालान काटने के फैसले को चुनौती देने वाली अधिवक्ताओं की चार याचिकाओं को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति प्रतिबा एम ¨सह की पीठ ने कार में अकेले होने पर भी मास्क लगाने के दिल्ली सरकार के फैसले में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। पीठ ने साफ किया कि कई ऐसे मौके होते हैं जब कार में अकेले होने के दौरान भी बाहर से उसके संक्रमित होने का खतरा होता है।

सार्वजनिक स्थल की व्याख्या करते हुए पीठ ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता है कि व्यक्ति कार में अकेले सफर कर रहा है तो कार सार्वजनिक स्थल नहीं है। अगर व्यक्ति कार में अकेले जा रहा है तब भी वह वायरस से संक्रमित कर सकता है या हो सकता है। संभव है कि कार में बैठने से पहले व्यक्ति बाजार, कार्यालय, अस्पताल गया हो। कार को ट्रैफिक सिग्नल पर भी रोककर लोग शीशा नीचे कर सामान खरीदते हैं। इस दौरान मास्क नहीं पहनने पर चालक स्ट्रीट वेंडर को संक्रमित कर सकता है या उससे संक्रमित हो सकता है। पीठ ने कहा कि पिछले वर्ष कोरोना महामारी का विस्फोट होने पर वैश्विक स्तर पर ही नहीं केंद्र सरकार व राज्यों के साथ वैज्ञानिकों, वैश्विक संगठनों ने मास्क पहनने को जरूरी बताया था।

जुर्माना काटने के अधिकार पर भी स्पष्ट की स्थिति

जुर्माना लगाने के अधिकार को लेकर याचिका में दी गई दलील पर असहमति जताते हुए पीठ ने कहा कि अधिकृत व्यक्तियों की परिभाषा समावेशी और व्यापक प्रकृति की है। जिला मजिस्ट्रेट के पास व्यापक अधिकार हैं कि वे किसी अन्य अधिकारियों को चालान जारी करने के लिए नामित कर सकते हैं। पीठ ने कहा कि अधिकारियों की सूची पर अदालत की राय है कि इसी विस्तृत रूप से व्याख्या की जानी चाहिए न की प्रतिबंधात्मक रूप में। सभी चालान विधिवत अधिकृत अधिकारियों द्वारा चालान जारी किए गए हैं और चालान को रद करने की मांग आधारहीन है।

याचिका में दलील दी गई थी कि जिन जिलाधिकारियों पर जुर्माना लगाने की शक्तियां निहित हैं वे अपनी शक्तियां दूसरों को नहीं सौंप सकते।मास्क है सुरक्षा कवच, बचाई लाखों की जान कोरोना वायरस को फैसले से रोकने में मास्क एक सुरक्षा कवच है और पहनने से यह लोगों को सुरक्षित रखता है। मास्क पहनना कोरोना वायरस के खिलाफ एक माध्यम है और इससे लाखों लोगों की जिंदगी इससे बची है। इतना ही नहीं अगर बुजुर्ग या गंभीर बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति है तो व्यक्ति को अपने घर में भी मास्क पहनना चाहिए। शहर में चलते हुए वाहन में अगर व्यक्ति अकेला है तो भी कोरोना महामारी के मद्देनजर मास्क पहनना अनिवार्य है। सवाल उठाने के बजाए अधिवक्ता करे नियमों का अनुपालन कोर्ट ने कहा सभी चार याचिकाकर्ता अधिवक्ता हैं और उन्हें सवाल उठाने के बजाए महामारी के निमयों को लागू करने में सहयोगी बनना चाहिए। अधिवक्ता को कानूनी प्रशिक्षण मिलता है और उन्हें महामारी जैसी परिस्थितयों में इससे जुड़े निमयों के अनुपालन में अपने सर्वाेच्च कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। मास्क पहनना अहम का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।