हिंदी पत्रकारिता दिवस: इसी लेन से 195 साल पहले निकला था देश का पहला हिंदी अखबार, नहीं बचा है उदंत मार्त्तंड का निशां

 

हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस

 अमरतल्ला स्ट्रीट व अमरतल्ला लेन आज भी मौजूद है पर 37 नंबर हो चुका है गायब कानपुरवासी जुगलकिशोर शुक्ल ने 30 मई1826 को इसी लेन से निकाला था अखबार उदंत मार्त्तंड के माध्यम से देश को प्रथम हिंदी समाचार पत्र की प्राप्ति हुई जिसका केंद्र कोलकाता बना।

राजीव कुमार झा, कोलकाता। हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। क्योंकि, इसी दिन करीब 195 वर्ष पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) से हिंदी का पहला अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ था। जिस स्थान से हिंदी का पहला समाचार पत्र उदंत मार्त्तंड शुरू हुआ, आज वहां उसका निशां तक नहीं बचा है। मध्य कोलकाता के कोलू टोला नामक मोहल्ले के 37 नंबर अमरतल्ला लेन स्थित जिस मकान से कानुपुर निवासी पंडित जुगल किशोर सुकुल(शुक्ल) ने 30 मई, 1826 में उदंत मार्त्तंड का प्रकाशन शुरू किया था, आज उस मकान का नामोनिशान मिट चुका है।

बड़ाबाजार के इस इलाके में अमरतल्ला स्ट्रीट व अमरतल्ला लेन आज भी मौजूद हैं, पर 37 नंबर मकान नहीं है। अमरतल्ला लेन जिसे अमरतल्ला गली भी यहां के लोग कहते हैं, वह एक से शुरू होकर 27 पर खत्म हो जाता है। वहीं, इसी से सटा अमरतल्ला स्ट्रीट एक से शुरू होकर 29 नंबर पर समाप्त हो जाता है। 37 नंबर अमरतल्ला लेन जिस जगह से यह अखबार शुरू हुआ था उस मकान के बारे में वर्तमान समय में रहने वाले वाले लोगों को भी पता नहीं है। इसी लेन व स्ट्रीट में 40-50 सालों से रहने वाले बिहार-उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी लोगों को भी नहीं पता है कि कभी इस स्थान से हिंदी का पहला अखबार प्रकाशित हुआ था।

अमरतल्ला लेन व अमरतल्ला स्ट्रीट इलाका मुख्य रूप से व्यवसायिक केंद्र है और यहां ज्यादातर दुकानें और गोदाम है। यहां छोटे-मोटे व्यवसाय व दुकान चलाने वाले अधिकतर लोग हिंदी भाषी हैं। 29 नंबर अमरतल्ला स्ट्रीट में दुकान चलाने वाले बिहार के छपरा जिले के निवासी मोहम्मद हाशिम (70) ने बताया- 'हम यहां लगभग 50 साल से रह रहे हैं, लेकिन कभी नहीं सुना कि यहां से कोई हिंदी अखबार निकलता था। वह जब से यहां हैं, अमरतल्ला स्ट्रीट या अमरतल्ला लेन (गली) में 37 नंबर का कोई मकान नहीं देखा। इसी तरह अमरतल्ला लेन में पिछले 40 साल से रह रहे चाय दुकान चलाने वाले बिहार के दरभंगा निवासी बैजनाथ साव (55) ने भी बताया- 'मैंने कभी नहीं सुना कि यहां से कोई अखबार निकलता था।'मोहम्मद हाशिम व बैजनाथ साव की तरह यहां लंबे समय से रह रहे और भी कई लोगों से बात किया गया, लेकिन कोई भी व्यक्ति न तो देश के पहले अखबार और ना ही उस मकान का पता बता सका। ऐसे में यह विडंबना ही है कि जहां से पहला हिंदी अखबार शुरू हुआ उस स्थान का इतिहास तक मिट चुका है। न तो कभी किसी सरकार ने और ना ही किसी संस्था या व्यक्ति ने इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने या इसकी पहचान कायम रखने के लिए कोई पहल की। हालांकि, उत्तर प्रदेश के प्रयाग स्थित आध्यात्मिक, साहित्यिक, सामाजिक चिंतन मनन के प्रति समर्पित पं.देवीदत्त शुक्ल, पं.रमादत्त शुक्ल शोध संस्थान की ओर से प्रस्ताव रखा गया है कि उदंत मार्त्तंड के प्रकाशन स्थल की पहचान कर या उसके समीप स्मारक का निर्माण समय की मांग है।

शोध केंद्र की ओर से प्रस्ताव के कुछ अहम बिंदु

उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद निवासी पंडित जुगल किशोर शुक्ल और उदंत मार्त्तंड के माध्यम से देश को प्रथम हिंदी समाचार पत्र की प्राप्ति हुई, जिसका केंद्र कोलकाता बना। इसके कारण कोलकाता व पश्चिम बंगाल के गौरव में अभिवृद्धि हुई, लेकिन अधिकांश लोग इस तथ्य से अभी भी अपरिचित हैं। अतः उदंत मार्त्तंड का प्रकाशन कोलकाता के जिस 37 नंबर अमरतल्ला लेन, बड़ाबाजार से होता था, उस स्थान की पहचान कर अथवा उसके समीप भव्य स्मारक का निर्माण कराया जाना आज समय की मांग है। उस स्मारक में पंडित शुक्ल की प्रतिमा और उदंत मार्त्तंड के प्रारंभिक अंकों का प्रदर्शन और उससे संबंधित इतिहास की जानकारी उपलब्ध कराई जाए। यह स्मारक कोलकाता, बंगाल को हिंदी जगत से जोड़ने में निश्चय ही एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में भूमिका निभाएगा।

- बंगाल सरकार द्वारा प्रतिवर्ष 30 मई को हिंदी दिवस के मौके पर बृहद हिंदी कार्यक्रम के आयोजन की परंपरा भी प्रारंभ की जाए, जिसमें कोलकाता- बंगाल तथा समीपवर्ती अन्य अहिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहयोग करने वाले पत्रकारों/साहित्यकारों/ हिंदी- हितैषियों को उदंत मार्त्तंड एवं पंडित जुगल किशोर सुकुल स्मृति शिखर सम्मान से पुरस्कृत किया जाना चाहिए।

- इसके साथ ही चूंकि पंडित शुक्ल कोलकाता न्यायालय में कार्य करते थे, अतः कोलकाता और बंगाल के न्यायालयों में हिंदी के प्रयोग के प्रति समर्पित अधिवक्ताओं को पुरस्कृत कर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्तर की हिंदी संगोष्ठी (हिंदी पत्रकारिता के विकास में बंगभूमि की भूमिका)/ काव्य- संध्या के आयोजन विशेष आकर्षण हो सकते हैं।

- वाराणसी के पराड़कर भवन की भांति कोलकाता में पंडित जुगल किशोर शुक्ल पत्रकारिता भवन की स्थापना का प्रयास निश्चय ही हिंदी पत्रकारिता के इस पुरोधा की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने की दृष्टि से ऐतिहासिक कार्य हो सकता है। इसके लिए वरिष्ठ पत्रकारों/ साहित्यकारों, विशिष्ट जनों एवं जनप्रतिनिधियों/ प्रशासनिक अधिकारियों की एक शीर्ष समिति गठित कर स्थान के चयन एवं अन्य आवश्यक कार्यवाही कराई जानी चाहिए। यह महानगर के लिए ऐतिहासिक कार्य होगा। इस वृहद कार्य में बंगाल सरकार को भारत सरकार तथा उत्तर प्रदेश सरकार से यथासंभव सहयोग मिल सकता है।