कोविड-19 की दूसरी लहर के बीच मुश्किलों में मिला ‘मां’ का संबल

 

Happy Mother's Day खुद की परवाह किए बगैर बच्चों की देखभाल की.

1 कोविड-19 की दूसरी लहर ने बच्चों और युवाओं को भी तेजी से अपनी गिरफ्त में लिया है। ऐसे भी परिवार रहे जहां बच्चों के साथ उनके माता-पिता व अन्य सदस्य संक्रमित हो गए। ऐसे में बच्चों का संबल बनीं उनकी मां।

नई दिल्ली,  कार्तिक को दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलना बहुत पसंद है, जो पिछले कुछ समय से बिल्कुल बंद-सा था। धीरे-धीरे उसने फिर से अपनी सोसायटी के बच्चों के साथ खेलना, साइक्लिंग आदि करना शुरू किया था। ग्रुप के कुछ बच्चे तो मास्क पहनने एवं सैनिटाइजेशन को लेकर काफी सजग थे। लेकिन कुछ थोड़े लापरवाह भी थे। ऐसे में एक दिन कार्तिक ने मम्मा से पेट दर्द की शिकायत की। मां ने इस उम्मीद से घरेलू इलाज किया कि वह ठीक हो जाएगा, जबकि अगले ही दिन से कार्तिक को तेज बुखार आने लगा। दो-तीन बीतने पर दसवीं में पढ़ने वाली बड़ी बहन इशिता को भी ऐसी ही परेशानी हुई। यहां तक कि उनकी मां तक अछूती नहीं रहीं। तत्काल सभी का टेस्ट कराया गया।

सभी की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद सबने घर में ही खुद को आइसोलेट कर लिया। इशिता बताती हैं, ‘पहली बार ऐसा हुआ था कि हम बुखार से तप रहे थे। शरीर में दर्द हो रहा था। लेकिन सिर पर ठंडी पट्टी रखने के लिए मम्मी नहीं थीं और न ही हम उनकी गोद में सिर रखकर सुकून पा सकते थे। करीब जाने का तो सवाल ही नहीं था। बावजूद इसके जिस तरह उन्होंने हमारे खाने-पीने का ध्यान रखा, समय से उठने और एक्सरसाइज आदि करने के लिए प्रेरित किया, खुद दर्द में रहते हुए हमारी देखभाल की, हमें मानसिक रूप से मजबूत बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया, वह कोई और नहीं कर सकता था। इसी ने हमें कोरोना से लड़ने का साहस दिया और हम सब जल्दी स्वस्थ हो पाए।’

मां से सीखा धैर्य रखना: लखनऊ की 12 वर्षीय अदित्री एवं उनकी बड़ी बहन आद्या रस्तोगी की हिम्मत का भी जवाब नहीं रहा। कोरोना रोधी टीके की पहली डोज लेने के बाद ही उनकी मां की तबीयत बिगड़ गई। कुछ समय बाद जब टेस्ट कराए गए, तो मां की रिपोर्ट पॉजिटिव आई और उन दोनों की निगेटिव। पिता दूसरे शहर में थे और घर में सिर्फ वे तीन सदस्य ही थे।

परिवार के प्रति बदली सोच: ‘जब पता चला कि मैं और परिवार के बाकी सभी सदस्य पॉजिटिव हैं, तो सभी घबरा गए। फिर अगले दिन मैंने कुछ नोट्स बनाए और तय किया कि कैसे स्ट्रॉन्ग होकर रहना है। अच्छी बात यह रही कि इस बहाने अकेले कमरे में रहने को मिला। खुद के साथ समय बिताने को मिला।’, यह कहना है बेंगलुरु के न्यू हॉरिजन गुरुकुल स्कूल की नौवीं की स्टूडेंट यशस्वी मदान का।

बकौल यशस्वी कोरोना काल में उन्होंने मां और परिवार की अहमियत को समझा। उनकी बातों व नसीहतों पर ध्यान दिया। खाने-पीने में अपनी कोई मनमानी नहीं चलायी। वह कहती हैं, ‘पहले मुझे अकेले नींद नहीं आती थी। लेकिन इस बार कोई विकल्प नहीं था। हां, मम्मा जरूर फोन से लगातार मेरी खैरियत पूछती रहती थीं। इसलिए डर नहीं लगा। ठीक होने के बाद हमारी आपस की बॉन्डिंग और बेहतर हो गई है।’ यशस्वी पहले कई मुद्दों पर मां से सहमति नहीं रखती थीं। परिवार के प्रति भी खास लगाव नहीं था। लेकिन कोरोना पॉजिटिव होते हुए भी जब उन्होंने मां को घर के सभी सदस्यों का भरपूर खयाल रखते देखा, तो उनकी सोच पूरी तरह से बदल गई। उनका कहना है कि मां को देखकर बहुत कुछ सीखती हूं। उनसे सीख लेकर अपनी गलतियों को सुधारा भी है।

बढ़ाई जीवन के प्रति उम्मीद: हाल ही में कोरोना को मात देने वाली श्रुति कहती हैं, ‘मेरा पूरा परिवार कोविड से जूझ रहा था। उस मुश्किल दौर में जिसने उम्मीद बंधाए रखी, वह थी मां। उन्होंने हर वक्त यह ध्यान रखा कि मैंने दवा ली या नहीं? हमेशा यह समझाती रहीं कि सब जल्दी ठीक हो जाएगा। हालांकि, मां को ही सबसे पहले लक्षण आए थे। उसके बाद बाकी सदस्य भी पॉजिटिव हो गए। उन्हें इस बात को लेकर बहुत ग्लानि हो रही थी। इसके लिए बार-बार खुद को दोष दे रही थीं। बावजूद इसके वह हमेशा साथ खड़ी रहीं।

यहां तक कि कोविड-19 जैसा खतरनाक वायरस भी उन्हें मेरे करीब आने से रोक नहीं सका।’ बीटेक की छात्रा श्रुति का कहना है कि मां की वजह से वह अपनी जिंदगी में कभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ती हैं। हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करती हैं, जिससे कि मां को गर्व और खुशी हो। वह कहती हैं, ‘मां के प्यार को किसी भी रूप में आंका नहीं जा सकता है। वह ऐसी शख्सियत होती हैं, जो हर वक्त अपने बच्चों एवं परिवार की जिंदगी को खुशनुमा बनाए रखने का पूरा प्रयास करती रहती हैं। हमारे लिए बड़े से बड़ा त्याग करती हैं। ऐसे में उनके लिए जो कुछ भी कर सकूं, वह कम ही होगा।’

बेटी को खुद से दूर रखने का बड़ा फैसला: बेंगलुरु की ब्रेक फ्री फ्रॉम स्ट्रेस की संस्थापक पूनम मदान ने बताया कि छह साल की छोटी बेटी को छोड़कर हमारा पूरा परिवार कोविड से पीड़ित था। उसकी सुरक्षा के लिए मैंने उसे उसकी बुआ के पास भेज दिया। पहली बार बेटी को खुद से दूर करना पड़ा था। बहुत मुश्किल था वह फैसला। इसके लिए बेटी को समझाना भी एक अलग चुनौती रहा। उसे समझाना पड़ा कि कैसे कुछ दिन उसे बुआ के घर पर रहना होगा। उनकी बात माननी होगी। समय से खाना और सोना होगा। काफी भावुक पल थे वे।

हालांकि नियति ऐसी रही कि वहां भी सभी लोग पॉजिटिव हो गए और मुझे बेटी को वापस अपने घर लाना पड़ा। हमने पूरे-पूरे दिन उसे घर की ऊपरी मंजिल पर स्थित कमरे में अकेले रखा। समय-समय पर उससे वीडियो कॉल पर बातें करते थे। मैंने बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों को यही समझाया कि कैसे मानसिक रूप से मजबूत रहकर कोविड को परास्त किया जा सकता है। कैसे सेल्फ हीलिंग के जरिये हम अपने शरीर की देखभाल कर सकते हैं? शरीर के अंगों को पॉजिटिव एनर्जी एवं वाइब्रेशन दे सकते हैं कि ‘ऑल इज वेज’। उसका शुक्रिया अदा कर सकते हैं। इस हीलिंग से काफी फायदा होता है।

दूर रहकर समझा मां का मोल: पटना के सेंट माइकल्स स्कूल के छात्र रोहिनीश सिन्हा ने बताया कि आप किसी चीज का मूल्य तभी जान पाते हैं, जब वह आपसे दूर हो जाती है। पैरेंट्सद की वैल्यू भी दूर रहने के बाद ही समझ में आती है। जैसे, मेरी मॉम और पापा दोनों कोविड पॉजिटिव हो गए थे। तब उन्होंने मेरी सुरक्षा के लिए मुझे अपने एक नजदीकी दोस्त के घर रहने के लिए भेज दिया। पहली बार मैं लंबे अर्से तक उनसे अलग रहा। हां, वीडियो कॉल से रोजाना बातें हो जाती थीं, जिसमें मॉम सिर्फ मेरा उत्साह बढ़ाती थीं। मुझे जरूर उनकी फिक्र रहती थी। खासकर मॉम की कि पता नहीं क्या होगा आगे? क्योंकि बीच में उनकी हालत थोड़ी नाजुक हो गई थी।

मैं यही मानता हूं कि जो मां नौ महीने अपने गर्भ में हमें रखती हैं, उनकी कद्र करना, उन्हें सम्मान देना हर बच्चे का फर्ज होना चाहिए। अगर वह कुछ सिखाती हैं या डांटती हैं, तो उसमें भी हमारी भलाई ही छिपी होती है। मेरी मां ने मुझे हमेशा आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित किया। उसी के अनुसार मेरी परवरिश की। कोरोना काल में यह काफी काम आ रही है। वैसे, मां के गुणों का बखान नहीं किया जा सकता। उनकी कोई तुलना नहीं। उनके आंचल में न जाने कितने ही गुण रूपी सितारे लगे होते हैं, जो हमें हर मुश्किल से लड़ने का हौसला देते हैं। मैंने मां से साहस पाया है। उनसे सीखा है कि कैसे बिना भेदभाव के हर किसी को सम्मान देना है। हर परिस्थिति में सकारात्मक रहना है।