नासा के रोवर ने लाल ग्रह पर खोजा 'रहस्‍यमयी पत्‍थर', प्राचीन जीवन की टोह में जुटे वैज्ञानिक

 

नासा के रोवर ने लाल ग्रह पर खोजा 'रहस्‍यमयी पत्‍थर', प्राचीन जीवन की टोह में जुटे वैज्ञानिक। फाइल फोटो।

दरअसल ये चट्टानें ज्वालामुखी में विस्फोट के बाद बनती हैं। भूवैज्ञानिकों के लिए यह एक तरह से घड़ियों के तौर पर काम करती हैं। वैज्ञानिक इनकी मदद से जेजेरो क्रेटर के इतिहास और उसके विकास को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

वाशिंगटन, एजेंसी। अमेरिकी स्‍पेश एजेंसी नासा के पर्सिवियरेंस रोवर  ने मंगल ग्रह पर काम शुरू कर दिया है। पिछले 35 दिनों से इनजेनयुटी नाम का यह हेलिकॉप्‍टर रोवर की हर गतिविधियों एवं क्रियाकलापों पर पूरी नजर बनाए हुए है। बता दें कि इनजेनयुटी नाम का हेलीकॉप्टर मंगल के उन स्थानों से आंकड़ों को लाने में सक्षम होगा, जहां रोवर नहीं पहुंच सकता है। धरती के बाहर किसी हेलीकॉप्टर की यह पहली उड़ान थी। इस बीच पर्सिवियरेंस रोवर ने भी अपना काम जारी रखा है। रोवर ने अपने आस-पास के इलाके की मास्टकैम-जेड इमेजिंग सिस्टम के जरिए हाई-रेजोल्यूशन वाली तस्वीरों को लिया है। रोवर द्वारा इन तस्वीरों में 45 किमी चौड़े जेजेरो क्रेटर की पत्थरों से भरी चट्टानी सतह को देखा जा सकता है। मंगल ग्रह पर यह पत्थर काफी रहस्यमयी दिख रहे हैं।

वैज्ञानिकों के लिए उपयोगी है ये पत्‍थर

दरअसल, ये चट्टानें ज्वालामुखी में विस्फोट के बाद बनती हैं। भूवैज्ञानिकों के लिए यह एक तरह से घड़ियों के तौर पर काम करती हैं। वैज्ञानिक इनकी मदद से जेजेरो क्रेटर के इतिहास और उसके विकास को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। जेजेरो क्रेटर को लेकर माना जा रहा है कि यहां अरबों साल पहले एक झील और नदी का डेल्टा रहा होगा। दूसरी ओर, तलछटी चट्टानें समय के साथ गंदगी और रेत के जमाव की वजह से बनती हैं। यदि जेजेरो क्रेटर में जीवन रहा होगा, तो इन चट्टानों में मंगल ग्रह पर जीवन को बचाकर रखने की अधिक क्षमता है।

वर्ष 2031 तक इन पत्थरों को पृथ्वी पर लाने की संभावना

नासा के इस रोवर के दो प्रमुख लक्ष्‍य हैं। इसका प्रहला उद्देश्‍य पहला मंगल पर जीवन के निशानों को तलाशना है, जबकि दूसरा मिशन संभावित एस्ट्रोबायोलॉजिकल महत्व के कई दर्जन सैंपल्स इकट्ठा करना है। इसमें इन पत्थरों को भी शामिल किया जा सकता है। नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के संयुक्त अभियान द्वारा इस प्राचीन मंगल सामग्री को पृथ्वी पर लाया जाएगा। शायद इसके लिए 2031 तक एक मिशन शुरू किया जाएगा. पसादेना में कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के और परसिवरेंस परियोजना के वैज्ञानिक केन फार्ले ने एक बयान में कहा, जब आप इन पत्थरों के देखते हैं तो आपको मंगल की एक कहानी नजर आती है।

19 फरवरी को रोवर ने मंगल ग्रह की सतह पर लैंडिंग की

गौरतलब है कि 19 फरवरी को नासा का पर्सिवियरेंस रोवर ने मंगल ग्रह की सतह पर लैंडिंग की थी। मंगल ग्रह तक पहुंचने के लिए रोवर ने आधा अरब किलोमीटर की दूरी तय की थी। रोवर मंगल पर मानव जीवन के निशानों की खोज करेगा। इसके साथ यह एक लाख पुरानी सूख चुकी झील की जमीन की जांच करने के साथ अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर माइक्रो ऑर्गानिज्‍म की किसी भी गतिविधि यानी जीवन के हाने के चिन्‍हों की जांच करेगा। एक टन वजन वाले रोवर को मंगल ग्रह पर एक लंबा सफत तय करना है, लेकिन उसने 19 दिनों में 6.5 मीटर यानी 21 फीट का ही सफर तय किया था। इस दूरी को तय करने के बाद रोवर 150 डिग्री को मोड़ लिया और वापस अपनी जगह पर लौट आया। वैज्ञानिकों ने उसकी इस गति को एक महत्‍वपूर्ण उपल्बिध करार दिया था। पर्सिवियरेंस करीब दो वर्ष के कालखंड में मंगल सतह पर करीब 15 किलोमीटर तक का सफर तय करेगा।

 ऐसा है नासा का हेलीकॉप्टर

लगभग 1.8 किलोग्राम का यह रोबोट रोटरक्राफ्ट अपने चार कार्बन फाइबर ब्लेड के सहारे उड़ान भरने में सक्षम है। इसके ब्लेड 2400 राउंड प्रति मिनट की दर से घूम सकते हैं। यह स्पीड धरती पर मौजूद हेलीकॉप्टरों के ब्लेड की गति से लगभग आठ गुना ज्यादा है। साढ़े आठ करोड़ डॉलर (करीब 640 करोड़ रुपये) की लागत वाला यह हेलीकॉप्टर लाल ग्रह पर नमूने एकत्र करने में मददगार बताया जा रहा है। यह उन जगहों से भी नमूने एकत्र कर सकता है, जहां रोवर नहीं पहुंच सकता है। हेलीकॉप्टर उड़ान भरने के करीब पौने तीन घंटे बाद आंकड़े मिलना शुरू हो जाएंगे। नासा को इससे चित्र और वीडियो मिलने की भी उम्मीद है। इनजेनयुटी नाम का हेलीकॉप्टर मंगल के उन स्थानों से आंकड़ों को लाने में सक्षम होगा, जहां रोवर नहीं पहुंच सकता है। धरती के बाहर किसी हेलीकॉप्टर की यह पहली उड़ान होगी।