क्या है रक्तरंजित राजनीतिक हिंसा और कराहते बंगाल का इतिहास

 

भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए रक्तरंजित होते बंगाल

बंगाल की राजनीतिक हिंसा के ठेकेदारों में भाजपा के कार्यकर्ता सबसे ज्यादा निशाने पर भले रहे हों लेकिन इसका खामियाजा वामपंथी दलों कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी उठाना पड़ सकता है। फाइल

देश में कुल चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणाम दो मई को आ रहे थे, लेकिन सबसे ज्यादा नजर बंगाल पर ही लगी हुईं थीं। दो मई को जब मतगणना शुरू हुई तो जब तक भारतीय जनता पार्टी सत्ताधारी तृणमूल को चुनौती देते नजर आई, तब तक शांति बनी रही, लेकिन जैसे ही रुझानों में तृणमूल कांग्रेस पार्टी भारी अंतर से भारतीय जनता पार्टी को हराते हुए दिखने लगी, पूरे परिणाम आने से पहले ही ‘खेला होबे’ पर मदमस्त तृणमूल कार्यकर्ताओं ने मारकाट, आगजनी, हत्या और दुव्र्यवहार शुरू कर दिया।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता प्राप्त करने वाली भाजपा इस राज्य से 18 सांसद जिताने में कामयाब हो गई थी और उसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी लगातार ममता बनर्जी को पूरी ताकत से चुनौती देती दिख रही थी, इसीलिए राष्ट्रीय मीडिया की दिलचस्पी बंगाल में बहुत ज्यादा थी। और यही वजह रही कि बंगाल में परिवर्तन की उम्मीद से नजर गड़ाए बैठे राष्ट्रीय मीडिया के जरिये बंगाल में हिंसा की खबरों ने समूचे देश को हिलाकर रख दिया।

राष्ट्रीय मीडिया के अलावा इंटरनेट मीडिया के विभिन्न मंचों के जरिये भी बंगाल का हिंसक राजनीतिक परिदृश्य देश को पीड़ा दे रहा था। बंगाल में नारे, नेता, राजनीतिक दल और सत्ता बदलती रही, लेकिन राजनीतिक हिंसा रक्तरंजित बंगाल का स्थाई भाव बन गया है। जब तक पूरे चुनावी नतीजे आते, बंगाल से करीब एक दर्जन लोगों का जीवन राजनीतिक हिंसा में खत्म होने की खबर आ गई। कई जिलों से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोगों के पलायन की खबरें भी आने लगीं। बंगाल से लगे असम के धुबरी में सैकड़ों लोगों के पहुंचने की बात तस्वीरों के साथ असम के कैबिनेट मंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने खुद बताई। और यह सब तब हो रहा था, जब राज्य में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी बनी हुई थी। आठ चरणों में चुनाव कराने के चुनाव आयोग के निर्णय को राजनीति से प्रेरित बताने वालों के लिए यह करारा तमाचा पड़ने जैसा था। बंगाल के अलावा कहीं से कोई सामान्य विवाद की भी खबर नहीं आ रही थी। इस सबके बावजूद राष्ट्रीय मीडिया, विशेषकर अंग्रेजी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा बंगाल में लोगों के जानमाल के नुकसान को खबर मानने को भी तैयार नहीं था। कोलकाता से छपने वाले एक बड़े अंग्रेजी अखबार के सत्ता विरोधी रुख को लेकर देश में बहुत चर्चा होती है, लेकिन बंगाल में हुई हिंसा की खबरों को दबाने से यह स्पष्ट हो गया कि सारी रचनात्मकता केवल मोदी विरोध तक सीमित है।

नक्सल आंदोलन : मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने बंगाल में वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी से हिंसक राजनीतिक विरोध की शुरुआत की थी। तत्कालीन सरकार ने हिंसक हो चुके नक्सलबाड़ी आंदोलन पर पुलिस बल का प्रयोग करके उसे कुचलने का प्रयास किया और उसके बाद कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच शुरू हुई राजनीतिक हिंसा की बेहद खराब परंपरा बंगाल में आज और ज्यादा वीभत्स रूप में बनी हुई है। वर्ष 1972-77 के दौर में कांग्रेस सरकार के दौरान नक्सलियों और सरकार के बीच संघर्ष बहुत बढ़ गया था। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में वामपंथी पार्टियों ने हिंसक राजनीति को सत्ता परिवर्तन का जरिया बना लिया। इसके बाद वर्ष 1977 में राज्य में वामपंथी पार्टियां सत्ता में आईं तो करीब साढ़े तीन दशकों तक उनका कब्जा बना रहा और सत्ता पर कब्जा बरकरार रखने का तरीका वही राजनीतिक हिंसा बनी, जिसका इस्तेमाल करके वामपंथी दल सत्ता में आए थे।

वामपंथियों ने राजनीतिक हिंसा को सत्ता में रहते हुए संस्थागत तरीके से संरक्षण देना शुरू किया। नक्सलबाड़ी अब सिंडीकेट बन चुका था और राजनीतिक हिंसा का शिकार सबसे ज्यादा कांग्रेस और बाद में कांग्रेस से अलग हटकर वामपंथियों का उग्र विरोध करने वाली ममता बनर्जी बनीं। सिंगूर और नंदीग्राम, ये दो घटनाएं ऐसी मील का पत्थर बन गईं, जिसने बंगाल में वामपंथियों के साढ़े तीन दशकों के हिंसक शासन को खत्म कर दिया। लेकिन बंगाल का दुर्भाग्य यहीं खत्म नहीं हुआ और हिंसक राजनीति के ठेकेदार सिंडीकेट बनाकर सत्ता से लाभ लेने और उसे लाभ देने की कला में पारंगत हो चुके थे। इसीलिए 2011 में भले ही वामपंथी पार्टियां सत्ता से बाहर हो गईं और अब विधानसभा में उनका कोई प्रतिनिधि नहीं रह गया, पर 1967 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुई हिंसा राजनीतिक लाभ के साथ बंगाल के हर क्षेत्र में मजबूत हो गई।यह महज संयोग नहीं है कि पिछली सदी के सातवें दशक के आखिर में रक्तरंजित हुआ बंगाल राजनीतिक हिंसा के संस्थागत होने के साथ ही प्रति व्यक्ति औसत आय के मामले में सबसे ज्यादा कमाने वाले राज्य से धीरे धीरे देश के गरीब राज्यों में शुमार होता चला गया। वहीं दूसरी ओर, रक्तरंजित बंगाल को सरोकारी विमर्श का फर्जी जामा पहना दिया गया था। यह फर्जी विमर्श उसी तरह का था, जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में जनता को सुविधाएं न मिलने का हवाला देकर नक्सल गतिविधियों को सही ठहराने की कोशिश शहरों में बैठा एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग करता रहा है, जबकि सच्चाई यही है कि नक्सलियों की वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताएं तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को नहीं मिल पाती हैं।

इधर फर्जी विमर्श ने लंबे समय तक इस नजरिये से देश में चर्चा नहीं होने दी और अब जाकर लोग यह कह रहे हैं कि नक्सलियों और आतंकवादियों में कोई अंतर नहीं है। लेकिन बंगाल के लिए अभी भी सरोकारी विमर्श भारतीय जनता पार्टी विरोध के आधार पर ममता बनर्जी के हक में चला गया था। राजभवन में शपथ ग्रहण के तुरंत बाद राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा कि उम्मीद है कि ममता बनर्जी संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करेंगी। संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए राज्यपाल ने राज्य में तीन दिनों से जारी हिंसा पर तीखी टिप्पणी की थी और जब बाहर पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने कहा कि पत्रकारों को इस समय सच दिखाने का साहस करने की जरूरत है।

राज्यपाल के इस कहे को थोड़ा ठीक से समझने की आवश्यकता है, क्योंकि जिस समय सभी राजनीतिक दलों को इस राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध एकसाथ खड़ा होना था, सब अपनी सहूलियत देखकर ज्यादा बड़ा दुश्मन कौन, के आधार पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। राहुल गांधी ने ममता बनर्जी को जीत की बधाई देते हुए कहा कि आपने शानदार तरीके से भारतीय जनता पार्टी को हराया। राहुल गांधी ने बेहद शातिर तरीके से कांग्रेस के शून्य पर निपट जाने को पचा लिया, लेकिन खतरनाक बात यह है कि कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं के साथ हुई हिंसा पर भी राहुल गांधी कुछ नहीं बोले। हमें यह समझना चाहिए कि हिंसा एक बार शुरू हुई तो उसका शिकार कोई भी हो सकता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ की अध्यक्ष रहीं आयशी घोष लगातार बता रही हैं कि वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं को भी मारा गया। एक वाम कार्यकर्ता की बूढ़ी दादी के साथ हुई हिंसा तो हृदयविदारक है। इसके बावजूद आयशी घोष ने सीपीएम का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारे साथ भले हिंसा हो रही है, लेकिन हम किसी भी हाल में भाजपा का विभाजक एजेंडा नहीं चलने देंगे। संघ और भाजपा की विभाजनकारी नीतियों के खिलाफ लड़ने का संकल्प आयशी घोष सहित हर वामपंथी कैडर के जरिये सुना जा सकता है।

सरोकारी विमर्श का दुष्परिणाम: इन तमाम घटनाक्रमों के बीच कमाल की बात यह है कि वामपंथी पार्टियों के नेताओं की ही तरह मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी कह रहा है कि बंगाल में हिंसा हुई, लोगों की जान गई, बम फोड़े जा रहे, गोलियां चल रहीं, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोक लिया है। यह खुशी कुछ उसी तरह की है, जैसे वर्ष 1990 में सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा लेकर निकले लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने रोक दिया था। रक्तरंजित बंगाल को सरोकारी विमर्श में छिपाने-ढकने की कोशिश ठीक उसी तरह से हो रही है, जैसे बिहार में जंगलराज को सामाजिक न्याय के आवरण में ढकने की कोशिश की गई थी। इसका खामियाजा बिहार आज तक भुगत रहा है। राजनीतिक विचार अलग होने भर से हत्या, हिंसा और लूटपाट को सरोकारी विमर्श का जामा पहनाने का नतीजा अब बंगाल भुगत रहा है। शीतलकूची में अर्धसैनिक बलों पर हमला करते तृणमूल के कार्यकर्ता उसी भाव में थे कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पुलिस पर हमला कर रहे हैं। दुर्भाग्य से मीडिया में एक बड़ा वर्ग इसी प्रवृत्ति को बढ़ाने में लगा है। जनवरी 2016 में मालदा में एक लाख से ज्यादा मुसलमानों ने हिंदू नेता कमलेश तिवारी के बयान के खिलाफ प्रदर्शन किया और पुलिस चौकी में आग लगी दी।

हिंसा और आगजनी की इस घटना पर बंगाल की मुख्यमंत्री का बयान बताता है कि बंगाल में ममता किस तरह की राजनीति कर रही हैं। ममता ने कहा कि यह पूरी तरह से स्थानीय लोगों और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के बीच का मसला है। इसमें सांप्रदायिकता खोजना गलत होगा। ममता बनर्जी ने जैसे कहा, ठीक वैसा ही विमर्श मीडिया के एक खास वर्ग ने बनाया। इस बार भी ममता ने चुनाव की शुरूआत से पहले से ही अर्धसैनिक बलों को मोदी-शाह की पुलिस के तौर पर ही संबोधित किया। चुनाव आयोग को भी नरेंद्र मोदी की मशीनरी बताया। इस बारे में ममता बनर्जी ने तो मंच से यहां तक कहा कि केंद्रीय बल कितने दिन रहेंगे? फिर देखेंगे। तृणमूल के नेताओं ने भी ऐसे ही बयान दिए, लेकिन जब ममता यह सब कर रहीं थीं तो बंगाल का चेहरा और कुरुप करने की इस कोशिश को मीडिया का यह खास वर्ग सांप्रदायिकता से लड़ने की ममता बनर्जी की कोशिश बताते हुए कह रहा था कि अकेली महिला मोदी सरकार से लड़ रही है। वामपंथी प्रवृत्ति के पत्रकारों और मीडिया घरानों ने पहले वामपंथी की सत्ता बचाने के लिए और 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए रक्तरंजित होते बंगाल को सरोकारी विमर्श के आवरण में पेश करने का घिनौना काम करके पत्रकारिता की साख और मूल्यों को चोट पहुंचाई है।