जीवन में मिली उपलब्धियों और खुशियों के बारे में सोचें और संयम रखें

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को बेहतर रखते हुए जिंदगी से संतुलन व सामंजस्‍य बिठा पाएंगे...

पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया की अध्‍यक्ष और खेल रत्‍न विजेता मोटिवेशनल स्‍पीकर दीपा मलिक ने बताया कि अगर हम जीवन में मिली उपलब्धियों और खुशियों के बारे में सोचें संयम रखें और सब कुछ अच्‍छा होने की उम्‍मीद रखें तो हममें आत्‍मसंतुष्टि का भाव पैदा होगा।

नई दिल्‍ली। कोरोना के कठिन काल में हमारे उद्विग्‍न होने का कोई मतलब नहीं है। आत्‍मसंतुष्टि ही हमें शांति व आत्‍मबल देगी। महामारी का यह दौर अपने नुकसान या नाकामियों के बारे में सोचने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि हमने आज तक क्‍या पाया है? अगर हम जीवन में मिली उपलब्धियों और खुशियों के बारे में सोचें, संयम रखें और सब कुछ अच्‍छा होने की उम्‍मीद रखें तो हममें आत्‍मसंतुष्टि का भाव पैदा होगा और हम अपने मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को बेहतर रखते हुए जिंदगी से संतुलन व सामंजस्‍य बिठा पाएंगे... 

पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया की अध्‍यक्ष और खेल रत्‍न विजेता मोटिवेशनल स्‍पीकर दीपा मलिक ने बताया कि मैंने यह संकल्‍प लिया था कि मैं आत्‍मसंतुष्‍ट रहूंगी। मुझे निजी कार्यों के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ा। अजीब सा लगता था कि अपने रोजमर्रा के कामों में भी दो हाथ साथ चाहिए होते थे। लेकिन मुझे इस बात की आत्‍मसंतुष्टि रही कि मैं जीवित हूं। फिर जीवित रहने के अच्‍छे कारण ढूंढ़े। मुझे अपनी दो बेटियां, उन्‍हें बड़ा होते देखना, नजर आया। आगे मैंने खुद को खेलों से जोड़ा तो देश के लिए मेडल जीते। अगर आप भी सकारात्‍मकता के साथ आत्‍मसंतुष्टि के कारण ढूंढ़ेंगे तो आपको भी मिल जाएंगे। अगर हम आत्‍मसंतुष्‍ट नहीं होंगे तो इस कठिन समय को निकाल नहीं पाएंगे। मेरे तो जीवन का सार ही यही है।

इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि आप और बेहतर करने की न सोचें। बेहतर करने के लिए यह वक्‍त तैयारी का होना चाहिए। जैसे मैंने बेहतर करने के लिए नये सिरे से, नये ढंग से अपने शरीर को सीखा। एक ओर मेरी सोच यह हो सकती थी कि कि मेरी जिंदगी रुक गई है, मैं अपंग हो गई हूं। अब मेरे लिए कुछ नहीं बचा है। लेकिन मैंने उस परिस्थिति को पहले अपनाया, फिर समझौता किया और स्‍वीकार किया कि यही सच है। फिर उसे स्‍वीकार करते हुए नये तरीके से सीखा।  हर इंसान के अंदर एक प्रतिभा है, एक हुनर है, एक काबिलियत है या एक शौक है। अब आप अपने शौक को भी दिल से पूरा करेंगे तो अचीवर बन जाएंगे। मैंने क्या किया, मुझे तैरने का शौक था, गाड़ी, मोटरसाइकिल चलाने का शौक था। यह शौक ही तो थे जो अब मेरी उपलब्धियां बन गए। क्योंकि मैंने इन्हें अच्छी तरह से सीखा, निखारा, संवारा, मेहनत की और अव्वल दर्जे पर ले गई।

परिवर्तनशील है जिंदगी: परिवर्तन एक ऐसी चीज है जो निरंतर है। परिवर्तन रुकता नहीं है। कोरोना भी एक तरह का परिवर्तन है। हमारी जिंदगी परिवर्तित हुई है। हमारी दिनचर्या परिवर्तित हुई है। हमारे खाने का ढंग बदला है। हमारा घूमना-फिरना बंद हो गया है। लेकिन नये ढंग में भी तो जीने का एक तरीका है। डार्विन का सिद्धांत है कि ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्‍ट’। जीवन का रूप परिवर्तनशील है जिसके कारण निरंतर नये प्रकार के जीवों का विकास होता रहता है। जो जीव अपने को समकालीन वातावरण के अनुकूल ढाल लेते हैं वे जीवन के विकास क्रम में आगे बढ़ते हैं और अधिक दिनों तक स्थायी बने रहते हैं। इसके विपरीत जो अपने को वातावरण के अनुकूल नहीं बता पाते हैं, वे जैविक विकास की लंबी दौड़ में अपने आप को जीवित नहीं रख पाते हैं और नष्ट हो जाते हैं अथवा उन्हें विवश होकर अपने वातावरण के अनुकूल ढलना होता है।

तकनीक का सकारात्‍मक प्रयोग: खिचड़ी रसोईघर में ही पकती है तो रोगी को निरोगी करती है लेकिन वही खिचड़ी दिमाग में पकती है तो निरोगी को रोगी करती है। इस समय दवा, दुआ और दोस्‍त की जरूरत है। सबसे संपर्क में रहें। मैं इस समय को आगे की तैयारी के लिए सही मान रही हूं। मैं पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया की अध्‍यक्ष हूं। मेरे पास तो घर से करने के लिए बहुत काम है। खिलाडि़यों का डाटा इकट्ठा कर रही हूं। खिलाडि़यों की छोटी-छोटी प्रेरक वीडियोज बनवा कर डलवाती हूं। उनकी भलाई के लिए वेबिनार करवाती हूं। खेल मंत्रालय में योग और मेंटल फिटनेस, न्‍यूट्रिशन और डाइट की क्‍लास करवाती हूं। अभी फील्‍ड पर ज्‍यादा खिलाड़ी नहीं खेल पा रहे हैं तो उनके लिए हम तकनीक विकसित कर रहे हैं। आज तक पैराथलीट के लिए इसका अभाव था। साल में दो-चार टूर्नांमेंट हो जाते थे बस। कोरोना ने सबको आपस में बांध दिया। आज हम तकनीक का सकारात्‍मक प्रयोग कर रहे हैं। पैराथलीट बच्‍चे कभी तकनीक का प्रयोग करने के अभ्‍यस्‍त नहीं थे। यह उनका माइनस प्‍वाइंट था। वे अपनी एंट्री तक नहीं देख पाते थे। यह जान नहीं पाते थे कि अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर क्‍या चल रहा है? अब उनको वेबसाइट आदि लगातार देखने की आदत हो गई है। वे जान गए हैं कि उन्‍हें किन-किन चीजों की जानकारी रखनी है। एक तरीके से यह समय उनके लिए लाभप्रद रहा। जहां दुनिया ने इम्‍युनिटी और न्‍यूट्रिशन के बारे में समझा है वहीं खिलाडि़यों ने भी इसे बेहद गंभीरता से लिया है। ये बातें भी सकारात्‍मकता का संदेश दे रही हैं।

जीवन का त्‍योहार रोज मनाइए: जीवन एक त्‍योहार है जिसे हम रोज मना सकते हैं। इस त्‍योहार को मनाने के लिए अंदरूनी खुशी चाहिए और यह अंदरूनी खुशी क्‍या है कि आप सकुशल हैं। आप सुरक्षित हैं। आप कुछ नया सीख पा रहे हैं। मैंने हमेशा यही सोचा कि जो हमारे पास है उसका पूर्ण रूप से धन्‍यवाद किया जाए। उसका उत्‍सव मनाया जाए। कुछ लोगों के प्रियजन चले गए हैं यह काफी दुखद है लेकिन यह समय अध्‍यात्‍म का भी है। मैं सुबह उठते ही सूर्य को धन्‍यवाद देती हूं कि मैंने आपके दर्शन के साथ एक नया दिन देखा। आत्‍मसंतुष्टि के लिए भावना की जरूरत है। मुझे अपने बच्‍चे सामने दिखते हैं, सर पर छत दिखती है। यह सोचती हूं कि बेशक कम कमाया लेकिन कमाया तो। कम खाया लेकिन खाया तो। एक आदमी को आखिर क्‍या चाहिए। अगर चार जोड़ी कपड़े नहीं खरीदे तो क्‍या हुआ जो चार जोड़ी कपड़े पहले से हैं वे तो पूरे पड़ रहे हैं। अभी तो जो कपड़े अल्‍मारी में रखे हैं उनके बिना भी काम चल रहा है। आज एक सूट धोते हैं तो कल उसे ही पहन लेते हैं। शोकेस से नये कप और क्रॉकरी नहीं निकालते हैं तो भी चाय और खाने का स्‍वाद बढ़िया है। न्‍यूनतम वस्‍तुओं के प्रयोग में भी संतुष्टि का एहसास आ गया है। यह मुश्किल समय तो है लेकिन एक संतोष सांत्‍वना के साथ आत्‍मशक्ति और संयम बरतने का समय है। पॉज है, फुलस्‍टॉप नहीं है। कई बार हम कोई पिक्‍चर देखते हुए पॉज कर लेते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि पिक्‍चर खत्‍म हो गई। हम कोई काम करते हैं तो कई बार उसे बीच में रोक कर नया काम कर लेते हैं और फिर दोबारा पहले वाले काम को शुरू कर लेते हैं।

ईश्‍वर का करें धन्‍यवाद: आत्‍मसंतुष्टि का मतलब यह नहीं है कि आप आगे बढ़ना नहीं चाहते बल्कि इसमें आभार व्‍यक्‍त करने की एक भावना रहनी चाहिए। मुझे लगता है कि जब यह भावना होती है तो आप उन चीजों को ध्‍यान में रखते हैं जो ईश्‍वर का धन्‍यवाद करने के योग्‍य हैं। यह तभी होता है जब आपमें अच्‍छाई देखने की समझ विकसित हो जाती है। ये दोनों चीजें आपस में जुड़ी हैं। जब आप अच्‍छाई देखते हैं तो ईश्‍वर का धन्‍यवाद करते हैं और सकारात्‍मक सोच के व्‍यक्ति बनते हैं। जब तक आप किसी चीज को अच्‍छा नहीं मानेंगे तब तक आप धन्‍यवाद की भावना का एहसास नहीं कर सकते। हमारे बड़े कहते थे कि जब आप उठें तो सबसे पहले इस धरती का नमन करें और धन्‍यवाद करें कि आज मैं इस धरती पर हूं। सूर्य को नमन करें कि मैंने नया उजाला देखा। भोजन करें तो ईश्‍वर का धन्‍यवाद करें। यह छोटी-छोटी आदतें थीं जो अब खत्‍म हो गईं । अब हम मोबाइल फोन लेकर डाइनिंग टेबल पर बैठ जाते हैं और जब खाना खत्‍म हो जाता है तो उठ जाते हैं। हम यह नहीं सोचते कि खाना बनाया किसने, परोसा किसने। आपके जूठे बर्तन धोए किसने। अपने अभिभावकों को मैं धन्‍यवाद देती हूं कि उन्‍होंने मुझमें धन्‍यवाद देने की भावना डाली। मैं जब भी कोई नया काम कर पाती हूं तो ईश्‍वर को धन्‍यवाद देती हूं।

सकारात्‍मक चीजों को ढूंढ़ें: अपने आप से बात करना भी बहुत जरूरी है। अपने आप से बात करें। जिंदगी के अच्‍छे पल याद करें। माहौल में नकारात्‍मकता तो है ही, लेकिन इसमें से भी हम सकारात्‍मक चीजों को देखें। चार खबरें खराब होती हैं तो कुछ मानवता की, मदद की भी कहानियां होती हैं। आप वापस देने की भावना रखते हैं तो आप आत्‍मसंतुष्‍ट रहते हैं। अगर आप किसी की मदद करते हैं और उससे उसे लाभ होता है तो आप आत्‍मसंतुष्टि महसूस करते हैं। मैं चल नहीं पाती हूं लेकिन रात-रात भर फोन पर लोगों की मदद करती हूं। इससे मुझे संतुष्टि मिलती है कि मैं किसी के जीवन में माध्‍यम बनी। इस समय हमें अपने उद्देश्‍य समझने की जरूरत है। मैं समस्याओं का हल ढूंढ़ती हूं। मैंने अपनी जिंदगी से माइंड ओवर बॉडी का संदेश लिया है। बदलाव को जितनी जल्दी अपना लें उतना ही अच्छा। नहीं तो उदासी और नकारात्मकता में गुम हो सकते हैं। ऊपर तैरने के लिए हाथ-पैर मारने पड़ते हैं। नहीं तो डूब सकते हैं। कहने का अभिप्राय यह कि नई चीजें करनी ही पड़ती हैं।

दिव्‍यांगता को स्‍वीकार कर पायी कामयाबी: बाइस साल पहले स्‍वस्‍थ थीं दीपा मलिक। विवाहित थीं, मां थीं और सैन्‍य अधिकारी की पत्‍नी होने के साथ अपने सपने भी पूरे कर रही थीं। जिस साल में ब्‍यूटी क्‍वीन बनीं, उसी साल उनकी कमर के नीचे का हिस्‍सा ट्यूमर के कारण बेकार हो गया । दिव्‍यांगता पूरी जिंदगी की साथी बन गई थी। जब खेलना शुरू किया था तो उम्र भी ज्यादा थी। पर 46 साल की उम्र में पैरालंपिक मेडल जीता। 47 साल की उम्र में फिर से एशियन रिकॉर्ड बनाया, मेडल जीता। शरीर ने बेशक साथ छोड़ा लेकिन जज्‍बे और मेहनत से पैरालंपिक जीत कर खेल रत्‍न प्राप्‍त कर अपनी मंजिल हासिल की। अपनी सफल जिंदगी का मंत्र वह आत्‍मसंतुष्टि को ही बताती हैं और इस कोरोनाकाल के कठिन समय को आत्‍मसंतुष्टि के बल पर ही पार करने की सलाह देती हैं।

हर छोटी खुशी का व्‍यक्‍त करें आभार: वरिष्‍ठ मनोविज्ञानी रचना खन्‍ना सिंह ने बताया कि आज के निराशाजनक माहौल में अपने आशीर्वाद की बातों को जितना गिनेंगे उतना ही अच्‍छा है। आज हमें दुख को आभार में बदलना है। यदि हम नकारात्‍मक बातों पर ध्‍यान दिए हुए रोज ऐसी पांच चीजें लिखें जो आपके लिए आशीर्वाद की तरह हैं तो आप हर चीज का सकारात्‍मक रूप देख सकेंगे। इससे मन को शांति तो मिलेगी साथ ही हमारा नजरिया भी बदलेगा। अगर हम सिर्फ यही सोचेंगे कि अब आगे तीसरी लहर में क्‍या होगा तो उससे कुछ हासिल नहीं होना है। हमें छोटी-छोटी खुशियों के प्रति आभार प्रकट करना होगा। परिवार के साथ रहने या अच्‍छा खा-पी सकने तक के लिए आभार व्‍यक्‍त करना होगा। किसी दोस्‍त से अच्‍छी बात हो सकने का शुक्रिया अदा करना होगा।