कितनी हकीकत कितना फसाना, कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर अहम तर्कों और पड़ावों पर डालें एक नजर...

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, जहां से वायरस के लीक होने की बात आ रही है। रायटर

हाल ही में प्रसिद्ध ब्रिटिश साइंस जर्नलिस्ट और लंबे समय तक न्यूयार्क टाइम्स के साथ काम कर चुके निकोलस वेड ने विस्तृत लेख लिखकर चीन से कोरोना वायरस के प्रसार के संबंध में कई बातें साफ की हैं।

नई दिल्‍ली। कोविड-19 यानी कोरोना महामारी से पूरी दुनिया जूझ रही है। सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस-2 यानी सार्स-कोव-2 इस महामारी के फैलने का कारण है। यह वायरस चीन में 2002 में फैली सार्स महामारी और 2012 में सऊदी अरब से शुरू हुई मर्स (मिडल ईस्ट रेस्पिरेटर्री ंसड्रोम) महामारी का कारण बनने वाले कोरोना वायरस की ही तरह का एक वायरस है। साथ ही यह अब तक पहचाने गए विभिन्न कोरोना वायरस से बहुत अलग और घातक भी है। इससे प्रभावी लड़ाई के लिए अब दुनिया इसकी उत्पत्ति की मूल वजह जानने में भी संजीदगी से लग चुकी है। तीन तरह की अवधारणाएं फिजा में तैर रही है। ये वायरस प्राकृतिक हो सकता है, ये वायरस चीन की लैब से निर्मित हो सकता है। तीसरी बात कि चीन ने इसे जान-बूझकर जैविक हथियारों के रूप में विकसित किया है। विशेषज्ञों में मत-भिन्नता है लेकिन कोई भी इसे नहीं खारिज कर रहा है कि यह लैब निर्मित हो सकता है। आइए, वायरस की उत्पत्ति को लेकर अहम तर्कों और पड़ावों पर डालें नजर:

पहला मामला कोविड-19 का पहला मामला चीन के वुहान प्रांत में मिला था। इसके बाद इसने दुनिया को चपेट में ले लिया। संक्रमण की शुरुआत से ही एक वर्ग इसके पीछे चीन का हाथ होने की आशंका जाहिर करने लगा था। इस मामले में दो तरह की राय है। कुछ लोग मानते हैं कि चीन के वुहान इंस्टीट्यूट आफ वायरोलॉजी में इस वायरस को तैयार किया गया। वहां प्रयोग के दौरान गलती से लीकेज इस महामारी की शुरुआत का कारण बनी। वहीं, एक पक्ष इसके पीछे जैविक हथियार से युद्ध की चीन की साजिश मान रहा है। जो भी हो, सभी अवधारणाओं में चीन कामन है।

ब्रिटिश साइंस जर्नलिस्ट निकोलस वेड के अचूक तर्क: हाल ही में प्रसिद्ध ब्रिटिश साइंस जर्नलिस्ट और लंबे समय तक न्यूयार्क टाइम्स के साथ काम कर चुके निकोलस वेड ने विस्तृत लेख लिखकर चीन से कोरोना वायरस के प्रसार के संबंध में कई बातें साफ की हैं। वेड बताते हैं कि संक्रमण का पहला मामला आते ही चीन ने इसे अपने वुहान वेट मार्केट से जोड़ दिया। इस बाजार में मांस के लिए जानवर बहुत बड़े पैमाने पर बेचे जाते हैं। महामारी से जुड़ा जैसे ही यह तथ्य सामने आया, तभी से लोगों ने इसे साल 2002 में आई सार्स नामक महामारी से जोड़ना शुरू कर दिया। उस समय भी महामारी की शुरुआत यहीं से हुई थी। इसलिए चीन के बयान के बाद सब इसे प्राकृतिक वायरस मानकर चलने लगे। वायरस के जीनोम को डीकोड करने से भी पिछली दोनों महामारियों का कारण बनने वाले वायरस से इसकी समानता मिली। लेकिन वुहान में ही चीन की बड़ी वायरोलॉजी लैब होने के कारण एक वर्ग वायरस के प्राकृतिक होने पर सवाल उठाने लगा था। ऐसे में वायरस को प्राकृतिक मानने के पक्ष में कुछ विज्ञानियों की दलील सामने आई। 19 फरवरी, 2020 को कुछ वायरोलॉजिस्ट ने प्रतिष्ठित पत्रिका लैंसेट में लेख लिखकर वायरस के गैर प्राकृतिक होने या लैब निर्मित होने जैसी सभी आशंकाओं को सिरे से खारिज कर दिया।

वायरस प्राकृतिक नहीं होने के पक्ष में मजबूत संकेत: इसके प्राकृतिक होने की सबसे मजबूत दलील है कि यह चमगादड़ से आया वायरस है। इसी दलील में इसका खंडन भी छिपा है। असल में सार्स-कोव-2 पूरी तरह से चमगादड़ में मिले वायरस जैसा नहीं है, कुछ मिलता-जुलता है। सवाल यह भी है कि मनुष्यों में वायरस कैसे पहुंचा। अगर कहा जाए कि चमगादड़ से किसी अन्य जानवर में और फिर उस जानवर से मनुष्य में पहुंचा, तो अगला सवाल है कि वह जानवर कौन सा है। सार्स के मामले में चार महीने में पता लगा लिया गया था कि वायरस चमगादड़ से सिवेट (बिल्ली जैसी प्रजाति) में और उससे मनुष्य में पहुंचा। मर्स के मामले में नौ महीने में यह पता चल गया था कि वायरस चमगादड़ से ऊंट और उससे मनुष्य में पहुंचा। इस बार डेढ़ साल होने को हैं और अब तक उस जानवर का पता नहीं लग पाया, जिससे वायरस चीन के वुहान वेट मार्केट तक पहुंचा। इस स्रोत का पता न लग पाना ही, इसके प्राकृतिक न होने का मजबूत आधार है।

लैंसेट को वेड का जवाब: वेड अपने लेख में लैंसेट में प्रकाशित विज्ञानियों के तर्कों की धज्जियां उड़ाते हैं। लैंसेट में छपे लेख को पीटर डेसजैक के नेतृत्व में तैयार किया गया था। पीटर न्यूयार्क के इकोहेल्थ अलायंस के प्रेसिडेंट हैं। इस संगठन ने वुहान की वायरोलॉजी लैब में कोरोना वायरस पर हो रहे प्रयोगों के लिए र्फंंडग की है। ऐसे में लैब से वायरस लीक होने की आशंकाओं को खारिज करना और उसे प्राकृतिक बताना उनके हित में है।

जारी रहे वेड के तर्क: 17 मार्च, 2020 को जर्नल नेचर मेडिसिन में स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के क्रिश्चियन एंडरसन की अगुआई में फिर पांच विज्ञानियों ने इस वायरस के प्राकृतिक होने के पक्ष में दलील दी। उनका कहना था कि वायरस के जीनोम में छेड़छाड़ और बदलाव का कोई प्रमाण नहीं मिला। वेड इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए बताते हैं कि विज्ञान के पास मौजूदा दौर में ऐसी उन्नत तकनीकें हैं, जिनमें किसी वायरस के जीनोम में स्पष्ट प्रमाण छोड़े बिना उसकी संरचना में बदलाव किया जा सकता है। वायरस को लगातार एक सेल कल्चर से दूसरे सेल कल्चर में भेजते हुए उसमें प्राकृतिक दिखने जैसे बदलाव किए जा सकते हैं।

अन्य विज्ञानियों ने क्यों साध ली चुप्पी: सवाल यह भी उठता है कि आखिर एंडरसन की अगुआई में लिखे लेख में विज्ञानी स्तर पर खामियां होने के बाद भी अन्य विज्ञानियों ने उसका खंडन क्यों नहीं किया। इस पर वेड सीधे शब्दों में कहते हैं कि शोध का काम बहुत जटिल है। लीक से हटकर कुछ कहने की कोशिश किसी के लिए भी नुकसान का कारण बन सकती है।

जैविक युद्ध की तैयारियों में जुटा चीन: इस महामारी के पीछे चीन की जैविक युद्ध की साजिश की बात भी कही जा रही है। पिछले दिनों खबर आई कि अमेरिका के हाथ कुछ ऐसे दस्तावेज लगे हैं, जिनमें पांच साल पहले ही चीन के विज्ञानी ऐसे वायरस की चर्चा कर रहे थे। फिलहाल अमेरिकी सरकार ने वायरस का स्रोत पता लगाने के लिए कमर कस ली है। देखना है कि इस जांच के बाद कौन की परतें खुलती हैं।