हिमंता बिस्व सरमा और सुवेंदु अधिकारी के जरिए बड़े संकेत को समझने की जरूरत

 

अन्य दल से आए इन दोनों नेताओं का एक ही दिन अहम पद संभालना सिर्फ संयोग नहीं है।

सरमा-सुवेंदु जैसे नेता चुनाव जीतने के लिए भाजपा का चेहरा बन सकते हैं लेकिन संगठन का असली नियंत्रण संघ के पुराने नेतृत्व के हाथों में ही होगा। दूसरी ओर सरमा और सुवेंदु ने जिस तरह से हालिया चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण को हवा दी वह भी काफी अहम है

कोलकाता। यह संयोग ही था कि दो पड़ोसी राज्यों असम और बंगाल में एक ही दिन 10 मई को दो घटनाएं हुईं। सामान्य रूप से इन दोनों घटनाओं में अधिक मेल नहीं दिखेगा। एक में जीत और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की खुशी है तो दूसरे में हार के बाद विधायक दल के नेतृत्वकर्ता और नेता प्रतिपक्ष के चयन का निर्णय। पर इन दोनों घटनाओं का बारीकी से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि दोनों में बहुत समानता है। पिछले सप्ताह सोमवार को एक ओर कोलकाता में भाजपा की बैठक में सुवेंदु अधिकारी को बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुना गया तो दूसरी ओर उसी दिन हिमंता बिस्व सरमा ने असम के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। अन्य दल से आए इन दोनों नेताओं का एक ही दिन अहम पद संभालना सिर्फ संयोग नहीं है। इसके निहितार्थ बड़े संदेश और संकेत हैं।

सरमा और सुवेंदु के राजनीतिक जीवन को देखें तो दोनों ने दल बदला है। एक कांग्रेस तो दूसरे तृणमूल छोड़कर आए हैं। ऐसा नहीं है कि दोनों भाजपा की विचारधारा से प्रेरित होकर भगवा रंग में रंगे हैं। असल में इनका एक ही मकसद है सत्ता के शिखर पर पहुंचना। कांग्रेस में रहते सरमा को लगा कि जिस तरुण गोगोई को वे अपना सियासी गुरु मानते हैं, वे अपने बेटे गौरव गोगोई को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने की कोशिश में हैं। इसके बाद उन्होंने विद्रोह कर दिया। ठीक इसी तरह अपनी सियासी महत्वाकांक्षा को लेकर आगे बढ़ रहे सुवेंदु को जब पता चला कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तृणमूल की विरासत अभिषेक बनर्जी को सौंपना चाहती हैं तो उन्होंने भी बगावत कर दी।

तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सुवेंदु अधिकारी बंगाल में बने नेता प्रतिपक्ष। फाइल

इसके बाद वर्ष 2015 में सरमा तो नवबंर, 2020 में सुवेंदु भाजपा में शामिल हो गए। अब दोनों को अहम जिम्मेदारी देकर भाजपा ने उन नेताओं को बड़े संकेत दिए हैं, जो अन्य दलों से आए हैं या आने पर विचार कर रहे हैं। अब तक कहा जाता था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या फिर भाजपा के पुराने सदस्यों को ही पार्टी में अहम पद मिलता है, जिसका उदाहरण मनोहर लाल और रघुवर दास हैं। यह प्रचलित था कि भाजपा में अन्य दलों से आए नेताओं को तुरंत अहम पद नहीं मिलता। कई ऐसे नेता हैं, जिन्हें लंबे इंतजार के बाद पार्टी में पद मिला। वैसे तो इन दोनों की नियुक्ति को लेकर सियासी जानकारों की अलग-अलग राय है।

कुछ का कहना है कि दोनों प्रदेशों के वर्तमान हालात के मद्देनजर संघ-भाजपा को मजबूरी में उन्हें सीएम व नेता प्रतिपक्ष का पद देना पड़ा है। पसंद-नापसंद, इच्छा-अनिच्छा की भावना, मूल और नई भाजपा में सर्वोपरि की लड़ाई के बीच यह निर्णय लिया गया है। हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से भाजपा ने कांग्रेस समेत अन्य दलों से आए और अब भी विपक्ष में बैठे नेताओं को संकेत दे दिया है कि बैरियर टूट चुका है। वहीं ये नियुक्तियां तृणमूल या कांग्रेस से आए मुकुल रॉय, टॉम वडक्कन, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं में नई ऊर्जा का संचार करने वाला साबित हो सकता है।

कांग्रेस से भाजपा में आए हिमंता बिस्व सरमा बने असम के मुख्यमंत्री। फाइल

ऐसा लगता है कि सरमा-सुवेंदु भाजपा के ‘अच्छे दिनों’ के लेटेस्ट वर्जन वाले अस्त्र हो सकते हैं, जिनके सहारे मोदी-शाह नए एक्शन प्लान से विपक्षी पार्टियों का सिरदर्द बढ़ाना चाहते हैं। खैर, इसके निहितार्थ चाहे जो भी हों, लेकिन पूर्व के एक बड़े हिस्से में भाजपा का नियंत्रण चुपचाप कांग्रेस और तृणमूल से आए दो प्रभावशाली नेताओं के हाथों में चल गया। वैसे असम या बंगाल पहला सूबा नहीं है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह के दौर की भाजपा में कई राज्यों में कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों के नेता भाजपा का मुख्य चेहरा बने हैं। इसकी दो प्रमुख वजह है। पहला, भाजपा के पास विकल्प नहीं था।

कई राज्यों में भाजपा के पास ऐसे नेताओं की कमी थी जो कुशल प्रशासक, सांसद विधायक के रूप में छाप छोड़ सके। प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा सामने रखकर केंद्र के साथ राज्यों में सरकार बनाने के लिए भाजपा को जनाधार वाले नेताओं की तलाश है। दूसरा, शायद अमित शाह की सोच है कि सरमा-सुवेंदु जैसे नेता चुनाव जीतने के लिए भाजपा का चेहरा बन सकते हैं, लेकिन संगठन का असली नियंत्रण संघ के पुराने नेतृत्व के हाथों में ही होगा। दूसरी ओर सरमा और सुवेंदु ने जिस तरह से हालिया चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण को हवा दी, वह भी काफी अहम है। ऐसे में इन दोनों नियुक्तियों के निहितार्थ और संकेत को समझने की जरूरत है।