अपनी ही पार्टी में विरोधियों से घिरे कैप्टन अमरिंदर सिंह, मात देने के लिए अपना रहे हर रणनीति

 

कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिद्धू, प्रताप सिंह बाजवा, परगट सिंह व चरणजीत सिंह चन्नी की फाइल फोटो।

पंजाब कांग्रेस में इन दिनों खूब घमासान मचा हुआ है। पार्टी संगठन व सरकार के मंत्री अपने ही मुख्यमंत्री को घेरने में कसर नहीं छोड़ रहे। कैप्टन भी विरोधियों को चित करने के लिए हर तरह की रणनीति अपना रहे हैं।

चंडीगढ़ । पंजाब में कांग्रेस पार्टी में घमासान चल रहा है। कांग्रेस का एक धड़ा जिसमें कैबिनेट मंत्री से लेकर राज्यसभा सदस्य और नवजोत सिंह सिद्धू भी शामिल हैं वह मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। कैप्टन भी विरोधियों को मात देने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की रणनीति अपनाए हुए हैं। कांग्रेस में होने वाले इस ‘मल्ल युद्ध’ का सीधा फायदा शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी को मिलता दिख रहा है। वहीं, कांग्रेस हाईकमान चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा। अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या हाईकमान कुछ करना नहीं चाहता या वह कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है या फिर वह सही समय का इंतजार कर रही है।

सिद्धू ने की शुरूआत

कांग्रेस में घमासान का बीज नवजोत सिंह सिद्धू ने बोया। सिद्धू लगातार इंटरनेट मीडिया पर अक्टूबर 2015 में हुए बेअदबी कांड को लेकर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को कटघरे में खड़ा करते रहे। सिद्धू के सवालों की बौछार से मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह इतना परेशान हो गए कि उन्होंने सिद्धू को पटियाला से चुनाव लड़ने की चुनौती तक दे डाली। यही नहीं, आधा दर्जन मंत्री भी सिद्धू को पार्टी से निकालने के लिए सामने आ गए।

नवजोत सिंह सिद्धू व कैप्टन अमरिंदर सिंह की फाइल फोटो। 

सिद्धू के सवालों को उन्होंने पार्टी विरोधी गतिविधि बताकर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग तक कर डाली। एक तरफ पार्टी में सिद्धू को पार्टी से निकालने की मांग उठ रही थी तभी तकनीकि शिक्षा मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी सिद्धू के नजदीक आ गए। चन्नी सिद्धू से मिलने के लिए पटियाला गए। इस ग्रुप में फिर कैबिनेट मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा भी शामिल हुए। धीरे-धीरे यह कुनबा बढ़ने लगा।

चन्नी की महत्वाकांक्षा और MeToo

चरणजीत सिंह चन्नी राजनीतिक रूप से हमेशा ही महत्वाकांक्षी रहे हैं। दलित मंत्री होने के कारण चन्नी की चाह हमेशा ही उप मुख्यमंत्री या फिर दांव लगे तो मुख्यमंत्री के रूप में खुद को पेश करने की रही। यही कारण है कि चन्नी हमेशा कांग्रेस का दलित चेहरा बनने की जुगत में रहे। वह दलित विधायकों को अपने घर पर बुलाकर बैठक करते रहे। 2018 में चन्नी को तब झटका लगा जब एक महिला आइएएस अधिकारी ने मुख्यमंत्री और चीफ सेक्रेटरी को पत्र लिख कर चन्नी पर मी-टू का आरोप लगाया।

चन्नी इस महिला अधिकारी को आपत्तिजनक संदेश भेजते थे। महिला अधिकारी के मना करने के बावजूद चन्नी ऐसा करते रहे तो अधिकारी ने इस पर शिकायत कर दी। यह मामला इतना उछला कि चन्नी की कुर्सी जाने की नौबत आ गई, लेकिन मुख्यमंत्री ने चन्नी से माफी मंगवाकर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। हालांकि समय-समय पर यह मामला उभरता ही रहा। मामला चूंकि महिला अधिकारी का था अतः चन्नी जब भी मुख्यमंत्री को आंख दिखाने की कोशिश करते तो यह मामला सामने आ जाता। वर्तमान में भी पंजाब महिला आयोग की चेयरपर्सन मनीषा गुलाटी ने इस मामले को उभार कर चन्नी के लिए मुसीबत पैदा कर दी है।

सिद्धू पर विजिलेंस का शिकंजा

नवजोत सिंह सिद्धू जब स्थानीय निकाय मंत्री थे तो उनके विभाग में उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू का खूब दखल था। कई सरकारी बैठकों में भी सिद्धू की पत्नी साथ में शामिल होती थी। 2019 में जब सिद्धू ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया तो सरकार ने सिद्धू के कार्यकाल के दौरान के कामों की विजिलेंस जांच करवानी शुरू कर दी। विजिलेंस ब्यूरो ने कभी भी इस मामले में अधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा, लेकिन फाइलों की पड़ताल जारी रही। अब जब बेअदबी व कोटकपूरा गोलीकांड को लेकर सिद्धू मुख्यमंत्री को लगातार घेर रहे हैं तो विजिलेंस जांच की बात फिर से सामने आने लगी। हालांकि इस बार भी विजिलेंस ने अधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा, लेकिन जांच अखबारों की सुर्खियां बनी।

सिद्धू के करीबियों की विजिलेंस जांच का मामला जैसे ही सामने आया सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा सरीखे नेता सिद्धू के समर्थन में खड़े हो गए। सरकार को भी लगा कि मामला बिगड़ न जाए क्योंकि सवाल उठने लगे कि अगर सिद्धू के खिलाफ विजिलेंस के पास सुबूत थे तो फिर सरकार दो साल तक इंतजार क्यों कर रही थी। और तो और रंधावा ने तो यहां तक कह दिया कि विजिलेंस को सरकारे अपने विरोधियों को दबाने के लिए प्रयोग में लाती है। स्थिति हाथ से निकले इससे पहले कांग्रेस के प्रदेश प्रधान सुनील जाखड़ का बयान आ गया कि किसी के खिलाफ विजिलेंस जांच नहीं चल रही है।

परगट के बेखौफ बोल

पद्मश्री व भारतीय हाकी टीम के पूर्व कप्तान एवं कांग्रेस के विधायक परगट सिंह राजनीति बयानबाजी करने से कतराते हैं, लेकिन जब वह मुद्दों को उठाते हैं तो उन्हीं की सरकार बगलें झांकने लगती है। बेअदबी, ड्रग्स, ट्रांसपोर्ट को लेकर परगट सिंह कई बार अपनी ही सरकार की कारगुजारी को उजागर कर चुके हैं। परगट कांग्रेस में एकमात्र ऐसे विधायक हैं जो कि सिद्धू के सबसे करीबी हैं। सिद्धू और परगट सिंह एक साथ ही कांग्रेस में आए थे। सिद्धू पर दबाव बने इसके लिए मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार कैप्टन संदीप संधू ने परगट को ही धमकी दे डाली कि उनकी फाइलें भी तैयार हो गई हैं, लेकिन परगट ने पलटवार कर दिया कि जिन अधिकारियों के पांव अपना भार झेलने की क्षमता रखते वह उनसे पूछताछ कर सकते हैं।

राजनीति में कोई स्थायी दोस्त व दुश्मन नहीं

कहा जाता है कि राजनीति में कोई भी स्थायी दोस्त व दुश्मन नहीं होता। पंजाब में ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है। कभी सुखजिंदर सिंह रंधावा और प्रताप सिंह बाजवा एक-दूसरे के धुर विरोधी थे। दोनों एक ही जिले से हैं अतः 2015 में कांग्रेस ने प्रताप सिंह बाजवा को प्रदेश की कमान सौंपी तो कैप्टन अमरिंदर सिंह बाजवा का विरोध करते थे और रंधावा कैप्टन के खेमे में शामिल थे। बाजवा और रंधावा में कोई बातचीत नहीं होती थी लेकिन 2021 में सारी तस्वीर बदल गई। अब दोनों नेता आपस में बैठते भी है और एक दूसरे को समझते भी हैं।कमोबेश यही स्थिति तब बनी जब अक्टूबर 2020 में राहुल गांधी ने मोगा के बधनीकलां से ट्रैक्टर मार्च की शुरूआत की। एक साल से भी अधिक समय के बाद यह पहला मौका था जब नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस के मंच पर आए थे। इस मंच की कमान रंधावा ने संभाली थी और सिद्धू ने मंच से ही रंधावा को खरी-खोटी सुना दी थी। क्योंकि रंधावा सिद्धू को अपना भाषण खत्म करने के लिए कह रहे थे। सिद्धू का बात रंधावा को बहुत चुभी थी। वह मंच पर तो शांत रहे, लेकिन बाद में उन्होंने इस पर अपना गुस्सा जाहिर किया था। हालांकि अब रंधावा सिद्धू के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।