क्या कभी किसी ने यह सोचा था कि माकपा के नेता अपनी गलत नीतियों से पार्टी को मटियामेट कर देंगे?

बंगाल में आसान नहीं वाम दलों की राह। फाइल

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए अब कौन इस नतीजे पर पहुंचेगा कि बंगाल में निकट भविष्य में वाम दलों का पुनर्जीवन संभव है? यह सवाल कांग्रेस के लिए भी है जिसने केरल में अपनी विरोधी माकपा से बंगाल में हाथ मिलाया।

 यदि कोई पार्टी अपनी गलतियों को जान-समझ ले, उन्हें सार्वजनिक तौर स्वीकार भी कर ले, फिर भी उन्हें सुधारने की कोई गंभीर कोशिश न करे तो उसका क्या हश्र होगा? वही होगा जो सीपीएम यानी माकपा का बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार हुआ। उसे एक भी सीट नहीं मिली। कांग्रेस भी खाली हाथ रही। कांग्रेस को माकपा के हश्र से सबक लेना चाहिए। माकपा और कांग्रेस के कुछ नेतागण अपनी गलत नीतियों के कारण एक दिन पार्टी को मटियामेट कर देंगे, क्या यह कभी किसी ने सोचा भी था? अब बंगाल में राजनीति और चुनाव के मुद्दे बदल चुके हैं। देशहित और प्रदेशहित के उन मुद्दों पर मौजूदा पक्ष और विपक्ष में मजबूती से अड़े रहने वाले दो मजबूत राजनीतिक दल अब आमने-सामने हैं। बंगाल में तीसरे दल के लिए फिलहाल कोई जगह नहीं नजर आती।

वर्ष 1977 में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ माकपा बंगाल की सत्ता में आई थी। आपातकाल की पृष्ठभूमि में कांग्रेस के कुशासन से ऊबे लोगों ने वाम मोर्चा का साथ दिया। वाम मोर्चा सरकार ने बटाईदारों को हक दिलाने जैसे कुछ जनपक्षीय काम किए। इससे उसका एक बड़ा वोट बैंक तैयार हुआ। वह वोट बैंक बांग्लादेशी घुसपैठियों से भी बड़ा था। आरंभिक दिनों में माकपा के बड़े नेताओं की सादगीपूर्ण जीवनशैली से भी प्रभावित होने वाले लोग थे, पर धीरे-धीरे उसके अनेक नेता बुर्जुआ दलों के अवगुण अपनाते चले गए। नेतृत्व मूकदर्शक होकर देखता रहा या फिर लाभ भी उठाता रहा। एक समय था जब माकपा के कुछ अच्छे कामों को देखते हुए लोग इस दल के 1962 के चीनपरस्त रवैये के पाप को भूल रहे थे, किंतु एकछत्र सत्ता के दस साल बीतते-बीतते स्थिति ऐसी हो गई कि प्रमुख नेता डॉ. अशोक मित्र को यह कहना पड़ा कि हमारी पार्टी में 18वीं सदी के जमींदारों का चरित्र घर कर गया है। माकपा नेतृत्व ने इस टिप्पणी से सबक लेने से इन्कार किया।

नतीजतन 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की बंगाल में भारी पराजय हुई। 2010 में केंद्रीय कमेटी की बैठक में आत्ममंथन किया गया। पार्टी ने माना, ‘बुर्जुआ दलों से चुनावी तालमेल नुकसानदेह साबित हो रहा और कुछ सदस्यों के गलत रुझानों ने भी दल को नुकसान पहुंचाया। पार्टी के कुछ लोगों में बेहतर जीवनशैली, व्यक्तिवादिता और करियरपरस्त होने की महत्वाकांक्षा बढ़ी। इससे उनमें सामूहिक रूप से काम करने की प्रवृत्ति घटी। सामूहिकता के अभाव में पार्टी में भ्रष्टाचार और गुटबाजी को बढ़ावा मिला। कई कामरेडों ने अकूत संपत्ति बनाई। शिकायतें आने पर भी उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई।’ इन कमियों को स्वीकार करने के बावजूद माकपा ने अपनी राह नहीं बदली।

वैसे भ्रष्टाचार के आरोप तो केरल की माकपा सरकार पर भी हैं, किंतु उसने इस बार अतिरिक्त सांप्रदायिक वोट बैंक हासिल करके गद्दी बचा ली। बंगाल के माकपा नेतृत्व ने बारी-बारी से तीन रणनीतिक गलतियां कीं। केंद्र में मोदी के सत्तासीन हो जाने के बाद ममता बनर्जी अपने राजनीतिक भविष्य के प्रति चिंतित हो गई थीं। उन्होंने अगस्त, 2014 में कहा कि हम वाम दलों से हाथ मिलने को तैयार हैं। हमारे लिए कोई अछूत नहीं है। बिहार की तरह यहां भी गठबंधन बनना चाहिए। तब बिहार में जदयू राजद के साथ था, किंतु माकपा ने ममता के ऑफर को ठुकरा दिया। सवाल है कि जो माकपा हिंदी पट्टी के राज्यों में राजद और सपा के साथ जा सकती है, उसे ममता के साथ जाने में एतराज क्यों था? दरअसल माकपा का अहंकार गया नहीं था। इसके साथ-साथ बांग्लादेशी घुसपैठियों के प्रति माकपा में दो राय रही। 2000 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा था कि प्रदेश के पूर्वोत्तर क्षेत्र के उग्रवादी संगठन आइएसआइ की मदद से गड़बड़ी फैला रहे हैं। भट्टाचार्य ने एक अन्य अवसर पर इस्लामिक आतंकवाद और संदिग्ध मदरसों के खिलाफ भी सार्वजनिक रूप से आवाज उठाई थी। तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में सत्ता पाने के बाद रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को समर्थन और संरक्षण दिया। नतीजतन जो तबका वाम मोर्चे के साथ था, वह उसके साथ हो गया।

पिछड़ों के आरक्षण को लेकर माकपा की ढुलमुल नीति के कारण 1993 से ही पिछड़े उससे सशंकित थे, पर उसके अन्य गुणों के कारण जनता ने उसे लगातार 34 साल तक सत्तासीन रखा। जब मंडल आरक्षण 1993 में लागू हुआ तो माकपा की तत्कालीन बंगाल सरकार ने कहा कि हमारे यहां कोई जातिवाद नहीं है। उसने मंडल आरक्षण लागू नहीं किया, पर जब 2009 के लोकसभा चुनाव में माकपा की भारी हार हुई तो उसे समझ आया कि आरक्षण को लेकर कुछ करने की जरूरत है। फिर बुद्धदेव सरकार ने 2010 में आधा-अधूरा और डंडीमार आरक्षण लागू किया। इस कारण माकपा को लाभ कम, हानि ज्यादा हुई। बंगाल की सरकारी नौकरियों में पहले से पिछड़ों के लिए सात प्रतिशत आरक्षण था। इसे बढ़ाकर वाम सरकार ने 17 प्रतिशत कर दिया। इसमें भी मुस्लिम वोट बैंक हावी रहा। बंगाल में मुस्लिम आबादी 27 प्रतिशत है। अतिरिक्त 10 प्रतिशत आरक्षण के दायरे में 56 लाभुक जातियां लाई गईं। वाम मोर्चा सरकार ने उनमें से 49 मुस्लिम जातीय समूह रखे। इससे बहुसंख्यक समुदाय के पिछड़े हिस्से में सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ा। 2011 के बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजे पर उसका असर भी पड़ा। 2011 में ही ममता पहली बार सत्ता में आई थीं। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए अब कौन इस नतीजे पर पहुंचेगा कि बंगाल में निकट भविष्य में वाम दलों का पुनर्जीवन संभव है? यह सवाल कांग्रेस के लिए भी है, जिसने केरल में अपनी विरोधी माकपा से बंगाल में हाथ मिलाया