सेल्फ हीलिंग से न सिर्फ आध्यात्मिक, बल्कि भावनात्मक एवं शारीरिक शक्ति को मिलती है मजबूती

समर्थ एवं शुभ संकल्पों से हम तन-मन दोनों को स्वस्थ रख सकते हैं।

आकांक्षा कहती हैं ‘सेल्फ हीलिंग से न सिर्फ आध्यात्मिक बल्कि मानसिक भावनात्मक एवं शारीरिक शक्ति को मजबूती मिलती है। मनुष्य दीर्घायु होता है उसके सर्व संबंधों में मिठास आने लगती है उदास जिंदगी उल्लास से परिपूर्ण हो जाती है। वह संतुष्टता का अनुभव करने लगता है।‘

नई दिल्‍ली, जब भी हमारे शरीर में कोई चोट लग जाती है या कोई जख्म हो जाता है, तो कई बार शरीर अपने तरीके से (प्रक्रिया) से उसका उपचार कर लेता है और व्‍यक्‍ति को पता भी नहीं चलता है। इसी प्रकार, जब भी शरीर के किसी अंग में कोई कंटीला या नुकीला तत्व चुभ जाता है, तो हम उसे फौरन निकालकर बाहर फेंकने का प्रयास करते हैं। क्योंकि अगर उसे नहीं निकाला गया, तो वह नासूर बन सकता है। ये तो हुई शारीरिक जख्मों की बात, किंतु जब किसी के कटु शब्दों या व्यवहार से हम व्यथित या रूष्ट हो जाते हैं, तो उसे मन से नहीं निकाल पाते। उलटा व्यर्थ एवं नकारात्मक सोचते-सोचते अपनी शारीरिक व मानसिक अवस्था को ही नुकसान पहुंचाने लगते हैं जबकि आवश्यक यह है कि किसी के प्रति भी मन में मैल या दुर्भावना नहीं होनी चाहिए। समर्थ एवं शुभ संकल्पों से हम तन-मन दोनों को स्वस्थ रख सकते हैं।

अमेरिका की सामाजिक मनोविज्ञानी डॉ. बारबरा ली फ्रेडरिक्सन के अनुसार, अपेक्षाओं के बोझ तले दबा होता है इंसान, जिनके पूरा न होने से सोच नकारात्मक होती जाती है। यही नकारात्मकता असहायपन एवं नाउम्मीदी का भाव उत्पन्न करती है, जिससे अंतत: शरीर के हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है और उससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है। व्यक्ति गंभीर तनाव एवं अवसाद, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग एवं पाचन तंत्र से घिर जाता है। चाहकर भी खुश नहीं रह पाता। लेकिन जैसे ही हम अपने संकल्पों, सोच को सकारात्मक बनाते हैं। जीवन में प्रेम एवं उद्गार को समाहित करते हैं, क्षमा भाव रखते हैं, प्रकृति से जुड़ते हैं, तन की तरह मन को भी शुभ संकल्पों का आहार देते हैं, तो शरीर की तमाम व्याधियां स्वयं ही किनारा करने लगती हैं। वहीं, अगर हम पुरानी व बीती घटनाओं, अप्रिय व कटु बोल पर ही चिंतन करते रहते हैं, व्यर्थ सोचते रहते हैं, तो मन हमेशा बोझिल रहता है। ऐसे में अच्छा यही रहेगा कि हम लोगों को, परिस्थितियों को स्वीकार करना, चीजों को नजरअंदाज करना और क्षमा करना सीखें। इससे हमारे अंदर एवं बाहर दोनों जगह शांति आती जाएगी।

शोध भी बताते हैं कि क्षमा करने या दया भाव रखने वाला व्यक्ति मानसिक, भावनात्मक एवं शारीरिक तीनों रूपों से अधिक स्वस्थ रहता है। महात्मा गांधी कहा करते थे, ‘जो कमजोर होते हैं, वही क्षमा नहीं कर पाते। क्षमा करना या पुरानी बातों को भूलना मजबूत इच्छाशक्ति वाले लोगों की ही विशेषता होती है।' कौन नहीं जानता है कि गांधी जी को कितनी ही यातनाएं झेलनी पड़ी थीं, लेकिन उन्होंने सभी को माफ कर दिया। रेकी हीलर आकांक्षा शर्मा के शब्दों में, ‘अगर हम स्वयं की हीलिंग अर्थात स्व-उपचार करना चाहते हैं, तो सर्वप्रथम हमें लोगों की बातों को चित्त पर रखना छोड़ना होगा। जो बीत चुका, उसे भूलना होगा। हम अतीत को कभी भी परिवर्तित नहीं कर सकते। उसे स्वीकार कर नई शुरुआत के लिए स्वयं को प्रेरित करने में ही समझदारी है।

हम जब अपने दिल को ठेस पहुंचाने वाले को क्षमा करते हैं, तो उससे हमें ही ज्यादा लाभ होगा। यह सकारात्मकता ही फिर शुभ संकल्पों का सृजन करेगी। हां, इसके लिए आप चाहें, तो सुबह की शुरुआत मेडिटेशन या ध्यान लगाने से कर सकते हैं, प्रकृति के बीच समय व्यतीत कर सकते हैं, मन एवं मुख, दोनों का मौन रख सकते हैं। यह सब आपके आंतरिक बल को बढ़ाएंगे। खुशी एवं ऊर्जा देंगे, जिससे आप पूरे दिन आने वाली परिस्थितियों का सहजता से सामना कर पाएंगे यानी बाहरी दुनिया या लोगों से जुड़ने से पहले स्वयं के साथ जुड़ना होगा। योग गुरु स्वाति का कहना है कि बहुत से लोग मंत्रोच्चार से स्वयं का उपचार कर लेते हैं, जबकि किसी के लिए संगीत एवं अन्य कोई कला ही उन्हें दिली खुशी देती है। उससे उनके मन-मस्तिष्क को सुकून मिलता है। शोध भी पुष्ट करते हैं कि मंत्रोच्चार से शरीर की प्राकृतिक उपचार प्रक्रिया सक्रिय हो जाती है और उससे हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारी भी ठीक हो सकती है। आकांक्षा कहती हैं, ‘सेल्फ हीलिंग से न सिर्फ आध्यात्मिक, बल्कि मानसिक, भावनात्मक एवं शारीरिक शक्ति को मजबूती मिलती है। मनुष्य दीर्घायु होता है, उसके सर्व संबंधों में मिठास आने लगती है, उदास जिंदगी उल्लास से परिपूर्ण हो जाती है। वह संतुष्टता का अनुभव करने लगता है।‘