पिछले साल ही मिल गए थे डबल म्यूटेंट वैरिएंट के दोनों स्ट्रेन, तो दूसरी लहर बनकर कैसे कोहराम मचाया? पढ़ें- अहम जानकारी


पिछले साल ही मिल गए थे डबल म्यूटेंट वैरिएंट के दोनों स्ट्रेन, तो दूसरी लहर बनकर कैसे कोहराम मचाया?

अंतरराष्ट्रीय साइंस जनरल में प्रकाशित आइसीएमआर के अध्ययन से मिली जानकारी। पिछले साल नौ दिसंबर तक दोनों स्ट्रेन के मिलकर डबल म्यूटेंट वैरिएंट बनने के कोई सबूत नहीं। स्ट्रेन को लेकर कई बातें सामने आई हैं और कैसे यह जानना बेहत जरूरी है।

नई दिल्ली। भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार ठहराए जा रहे वायरस के डबल म्यूटेंट वैरिएंट के दोनों स्ट्रेन पिछले साल मार्च और मई में भी मिल गए थे। नवंबर के बाद अलग-अलग दोनों स्ट्रेन मिलकर एक हो गए और एक नए वैरिएंट का स्वरूप धारण कर लिया, जिसे डबल म्यूटेंट वैरिएंट भी कहा जाता है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है। इस जानकारी से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि दूसरी लहर ने आखिर प्रचंड रूप कहां से धारण किया।

अंतरराष्ट्रीय साइंस जनरल एमडीपीआइ में प्रकाशित आइसीएमआर की ताजा स्टडी के मुताबिक डबल वैरिएंट वायरस पहला स्ट्रेन ई 484 क्यू पहली बार पिछले साल मार्च में महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के एक सैंपल में पाया गया था। इसके चार महीने बाद जुलाई में महाराष्ट्र में दोबारा यह स्ट्रेन कोरोना वायरस के दो सैंपल में मिला। मई में दूसरा स्ट्रेन एल452आर तेलंगाना में सात सैंपल, आंध्र प्रदेश में पांच और असम में एक सैंपल में पाया गया। आइसीएमआर के अनुसार अलग-अलग रहते हुए इन दोनों स्ट्रेन के अधिक संक्रामक होने के सुबूत नहीं मिले हैं। इन दोनों से मिलकर बना डबल म्यूटेंट वैरिएंट सबसे पहले इस साल जनवरी-फरवरी के आसपास महाराष्ट्र में दिखा और फिर इसका प्रकोप गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से लेकर पूर्वोत्तर तक गया।

लोगों की आवाजाही से डबल म्यूटेंट वैरिएंट अस्तित्व में आया

आइसीएमआर का मानना है कि लाकडाउन और पाबंदियों के खत्म होने के बाद जनवरी से मार्च और अप्रैल तक लोगों का देश के भीतर और बाहर आना-जाना शुरू हुआ और इसी दौरान वायरस के दोनों स्ट्रेन एक होकर डबल म्यूटेंट वैरिएंट में बदल गए। आइसीएमआर ने यह भी दावा किया है कि पिछले साल नौ दिसंबर तक पूरी दुनिया के विज्ञानियों को इस डबल म्यूटेंट वैरिएंट के फैलने की जानकारी नहीं थी और इसकी कोई रिपोर्टिंग भी नहीं हुई थी। आइसीएमआर की स्टडी से साफ है कि कोरोना वायरस में परिवर्तन की शुरूआत पिछले साल से ही हो गई थी और वह नए-नए स्वरूप बदलाना शुरू कर दिया था।

विज्ञानियों के लिए आइसीएमआर की स्टडी अहम

आइसीएमआर की स्टडी दुनिया के विज्ञानियों को कोरोना वायरस के स्वरूप में परिवर्तन के बारे में काफी अहम जानकारी उपलब्ध कराती है, जिसके आधार पर भविष्य में वायरस के नए स्वरूपों और संक्रमण पर उनके प्रभावों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

1524 सैंपल की जीनोम सिक्वेंसिंग की गई

आइसीएमआर के एक वरिष्ठ विज्ञानी ने कहा कि यह स्टडी पिछले साल जनवरी से अगस्त के बीच वायरस के स्वरूप में बदलाव को लेकर है। इसमें देश के 25 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों से कोरोना वायरस के 1,603 सैंपल को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्युनोलॉजी में विस्तृत विश्लेषण के लिए भेजा गया था। इनमें से 79 सैंपल को तय मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाने के बाद हटा दिया गया। इसके बाद 1,524 सैंपल के वायरस के जिनोम सिक्वेंसिंग करके विस्तृत अध्ययन किया गया। अध्ययन से यह साफ हो गया है कि शुरू में वायरस में भले ही ज्यादा परिवर्तन नहीं दिखा हो, लेकिन जल्द ही उसके ज्यादा संक्रामक रूप अख्तियार करने की शुरुआत हो गई थी।