नेपाल में चीन के बढ़ते असर को कम करने के लिए भारत को अपने संबंध ठीक करने पर देना होगा ध्यान


नेपाल में चीन के बढ़ते असर को कम करने के लिए भारत को वहां की सरकार के साथ संबंध ठीक करने पर ध्यान देना होगा। यह न सिर्फ संभव है बल्कि भारत के दीर्घकालिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी भी है।

ब्रजबिहारी। पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता कभी भारत के लिए अच्छी खबर नहीं होती है। खासकर नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रम पर तो हमारी तीखी नजर रहती है, जिसके साथ हमारी बहुत लंबी एवं खुली हुई सीमा है और उसके साथ हमारा सदियों पुराना रोटी-बेटी का संबंध है। दुर्भाग्य से इस समय नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की अनुशंसा पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने संसद को भंग कर दिया है। राष्ट्रपति के इस फैसले को वहां के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और अगर अदालत ने इस साल 22 फरवरी की तरह उनके फैसले को असंवैधानिक करार नहीं दिया तो 12 और 19 नवंबर को नए चुनाव होंगे।

नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद से ही वहां राजनीतिक अस्थिरता का दौर चलता रहा है और भारत की समर्थ कूटनीति अपने आजमाए हुए तरीकों से उसका सामना भी करती रही है, लेकिन वहां चीन के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण भारत के लिए परिस्थितियां अब कठिन होती जा रही हैं। 2015 की अघोषित आर्थिक नाकेबंदी ने आम नेपाली के मन में भारत की छवि को काफी धूमिल किया। वहां का सत्ताधारी वर्ग पहले से ही चीन की ओर झुका हुआ है। ऐसे में मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता के बीच भारत को फूंक-फूंक कर कदम रखने होंगे, लेकिन वह किसी भी सूरत में नेपाल के घटनाक्रम की उपेक्षा नहीं कर सकता है, क्योंकि इसके परिमाण घातक होंगे। नेपाल में चीन के बढ़ते दखल के कारण वहां भारत की स्थिति कितनी कमजोर होती जा रही है, इसका अंदाजा अमीश राज मुल्मी की पुस्तक 'आल रोड्स लीड नार्थ' को पढ़कर आसानी से लगाया जा सकता है।

दरअसल, इस पुस्तक में नेपाल की विदेश नीति को लेकर स्थापित समझ को चुनौती देते हुए सिर के बल खड़ा करने की कोशिश की गई है। लेखक के अनुसार, नेपाल और चीन के बीच व्यापारिक और राजनीतिक संबंध काफी पुराने हैं और बौद्ध धर्म के जरिए दोनों देश परंपरागत रूप से काफी नजदीक रहे हैं। हाल के वर्षों में नेपाल में चीन के बढ़ते निवेश के कारण इन संबंधों में काफी मजबूती आई है। इसके मद्देनजर लेखक का निष्कर्ष है कि नेपाल को अब भारत के बजाय उत्तर में अपने पड़ोसी चीन की ओर ही देखना चाहिए, क्योंकि नेपाल और उसके निवासियों की समृद्धि की मंजिल उस रास्ते पर ही चलकर मिलेगी।

इस पुस्तक से पता चलता है कि धीरे-धीरे चीन अपने निवेश के जरिए नेपाल को भारत से दूर करने में लगा हुआ है। वर्ष 2019-20 में नेपाल के पर्यटन क्षेत्र में स्वीकृत 89 परियोजनाओं में से 73 परियोजनाएं चीनी निवेशकों को आवंटित की गई हैं। इससे पहले वर्ष 2018-19 में पर्यटन क्षेत्र के लिए मंजूर 131 परियोजनाओं में से 72 परियोजनाएं चीनियों के खाते में गई हैं। वर्ष 2015 से अब तक नेपाल के पर्यटन क्षेत्र में 32.8 अरब नेपाली रुपये का निवेश हुआ है, जिसमें से 23.2 अरब यानी 71 फीसद चीनी निवेशकों ने किए हैं।

चूंकि नेपाल की अर्थव्यवस्था परंपरागत रूप से पर्यटन पर निर्भर है, इसलिए इन परियोजनाओं और उनमें विदेशी निवेश से नेपालवासियों की आमदनी में बढ़ोतरी हुई है। नेपाल को लेकर चीन की बढ़ती उदारता के पीछे भारत को घेरने की उसकी नीति भी है। सिर्फ नेपाल ही नहीं, बल्कि चीन ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में भी निवेश के जरिए भारतीय विदेश नीति के लिए नई-नई चुनौतियां खड़ी की हैं। इन सभी पड़ोसी देशों की एक शिकायत रही है कि भारत उनके साथ 'बिग ब्रदर' वाला रवैया अपनाता रहा है। इसी वजह से वे भारत से दूर होते गए। इन आरोपों में काफी हद तक सच्चाई भी है। जाहिर है, भारत को नेपाल सहित अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ बराबरी के स्तर पर संबंधों को मजबूत करने पर जोर देना होगा।नेपाल का ही उदाहरण लिया जाए तो भारत वहां के राजनेताओं को दुश्मन और दोस्त के खांचे में बांटकर देखता रहा है। इसकी वजह से वहां के राजनेताओं में अवसरवादिता घर करती जा रही है। यह हमारी कूटनीति के लिए अच्छा नहीं है। व्यक्तियों के बजाय नीतियों की निरंतरता पर ध्यान दिया जाए तो बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। यह ठीक है कि नेपाल के सत्ता वर्ग के साथ हमारे रिश्ते में वहां के मधेसी नागरिक सीमेंट की तरह काम करते हैं, क्योंकि उनका भारत के साथ आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, लेकिन यह कूटनीतिक संबंधों का विकल्प नहीं हो सकता है। इसलिए, नेपाल में चीन के बढ़ते असर को कम करने के लिए भारत को वहां की सरकार के साथ संबंध ठीक करने पर ध्यान देना होगा। यह न सिर्फ संभव है, बल्कि भारत के दीर्घकालिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी भी है।