बंगाल चुनाव में बिहार के राजनीतिक दलों की धरी रह गई हद पार करने की तमन्ना

 

जनता दल यूनाइटेड और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ताल ठोकने के बावजूद केवल ताल ठोकने भर के ही रह गए।

 ऐसा नहीं है कि बिहार के क्षेत्रीय दल दूसरे राज्यों में कभी कामयाब ही नहीं हुए। विभाजन के बाद नवगठित झारखंड में कभी राष्ट्रीय जनता दल तो कभी जनता दल यूनाइटेड की सरकार में भागीदारी रही।

पटना पड़ोसी राज्य बंगाल का चुनाव भले ही अन्य राज्यों के लिए केवल कौतुहल का विषय रहा हो, लेकिन बिहार के राजनीतिक दलों के साथ ऐसा नहीं है। अन्य राज्यों में पांव पसार राष्ट्रीय दल बनने की चाहत पाले इन दलों की आस इस पर टिकी थी, लेकिन उनकी तमन्ना इस बार फिर धरी रह गई। राष्ट्रीय जनता दल को वजूद का अहसास हो गया था, इसलिए उसने कोई मंसूबे पालने के बजाय ममता दीदी की बांह थाम ली, लेकिन जनता दल यूनाइटेड और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ताल ठोकने के बावजूद केवल ताल ठोकने भर के ही रह गए।

चुनाव परिणाम ने जब अरमान पर पानी फेर दिया: पिछले महीने पांच छोटे-बड़े राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए। चुनाव से पहले खूब तामझाम हुआ। जदयू की बंगाल इकाई के कई नेताओं ने पटना का दौरा किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह से मुलाकात की। संदेश यह दिया गया कि जदयू बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर बेहद गंभीर है। अंदरखाने चर्चा चली कि विधानसभा में इतनी सीटें झटक ली जाएं कि अगर भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने की जरूरत पड़े तो वह साथ खड़ी हो सके। पार्टी के नेता गुलाम रसूल बलियावी को इसका जिम्मा दिया गया। बलियावी अच्छे वक्ता हैं। उन्होंने दावा किया कि बंगाल में जदयू की स्थिति अच्छी रहेगी। उन्होंने इशारे में यह भी बताया कि बिहारी और अल्पसंख्यक वोटरों के सहारे काम बन जाएगा। इस विश्वास के साथ पार्टी ने बंगाल विधानसभा चुनाव में 44 प्रत्याशी उतार दिए गए। लेकिन चुनाव परिणाम ने जब अरमान पर पानी फेर दिया तो अब बलियावी कह रहे हैं कि सीटें भले ही नहीं मिलीं, लेकिन संगठन तो मजबूत हुआ ही। अगले चुनाव में तो इसका फायदा मिल ही सकता है।

बंगाल में एक भी सीट नहीं जीते, पर संगठन तो मजबूत हुआ: गुलाम रसूल बलियावी। फाइल

जमानत जब्त हो गई: हालांकि गंभीर राजनीति करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कभी भी बंगाल विधानसभा चुनाव में गहरी दिलचस्पी नहीं ली। इससे जुड़ा सवाल जब कभी उनसे पूछा गया, तो संगठन का हवाला देकर उन्होंने टाल दिया। वह खुद कभी चुनाव प्रचार में गए भी नहीं। राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त करने की ललक पाले जदयू के सामने दिक्कत यह भी है कि क्षेत्रीय दलों की अपनी सीमा होती है। अन्य राज्यों में वहां के क्षेत्रीय दल किसी अन्य राजनीतिक दल को घुसने नहीं देते। अगर कुछ सीटें मिलती भी हैं तो वह भी ज्यादा समय तक रोके नहीं रुकतीं। बावजूद इसके जदयू की कोशिशें जारी हैं और उन्हीं के साथ उनके सहयोगी पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भी ऐसी ही कोशिशों में जुटे हैं। बंगाल चुनाव में भी दो सीटों पर उन्होंने किस्मत आजमाई, लेकिन जमानत जब्त हो गई।

बंगाल में तृणमूल की शानदार जीत: राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ने का अरमान राष्ट्रीय जनता दल का भी रहा है। तेजस्वी यादव चुनाव लड़ने के लिए कमर भी कसे थे, लेकिन हालात को भांपते हुए बंगाल में वह ममता बनर्जी के साथ खड़े हो गए और असम में एक सीट पर लड़े, लेकिन प्रचार कांग्रेस का किया। ऐसा नहीं है कि उन्होंने यह निर्णय ऐसे ही ले लिया। चुनाव से पहले उनकी टीम बंगाल दौरे पर रही। दल में दो विचारधाराएं पैदा हो गईं। एक बिहार में कांग्रेस-वाम गठबंधन का हवाला देकर बंगाल में उनसे हाथ मिलाने की हिमायती थी तो वहीं दूसरी विचाराधारा नरेंद्र मोदी को जवाब देने के लिए ममता बनर्जी के साथ गठबंधन की। इस उहापोह में राष्ट्रीय जनता दल ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया और ममता को बिना शर्त समर्थन दे दिया। इसलिए वह असम पर चर्चा नहीं कर रहा और बंगाल में तृणमूल की शानदार जीत को अपनी उपलब्धि मान रहा है, जिसे गैर-वाजिब भी नहीं कहा जा सकता है।

ऐसा नहीं है कि बिहार के क्षेत्रीय दल दूसरे राज्यों में कभी कामयाब ही नहीं हुए। विभाजन के बाद नवगठित झारखंड में कभी राष्ट्रीय जनता दल तो कभी जनता दल यूनाइटेड की सरकार में भागीदारी रही। इस समय झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार में राजद के इकलौते विधायक मंत्री हैं। दिल्ली विधानसभा में राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी का कभी प्रतिनिधित्व रहा है। लेकिन वर्ष 2014 के बाद जब राज्यों के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष या विपक्ष में गोलबंदी होने लगी है, दूसरे राज्यों में बिहार के क्षेत्रीय दलों का असर समाप्ति की ओर बढ़ चला है। बंगाल और असम में जनता दल यूनाइटेड के खराब प्रदर्शन को इसी की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।