कोरोना महामारी को बिगड़ते पर्यावरण का इंडिकेटर समझें, प्रभु-प्रकृति-प्रवृत्ति को न करें अलग


प्रकृति हमें बार-बार समझाने की कोशिश कर रही है कि हमें संतुलन की तरफ जाना चाहिए

कोरोना संक्रमण के जरिए संदेश स्पष्ट है कि प्रकृति से दूर जा रहे मनुष्य के प्रयत्न विफल हो सकते हैं। जिस पारिस्थितिकी तंत्र की चिंता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज बड़ा विषय है उसके लिए प्रयास मिलकर करने होंगे।

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण दिवस पर वर्तमान नारा पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर करने का है। यह तब ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है जब कोविड -19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। यह पूरी तरह सच है कि कोरोना को बिगड़ते पर्यावरण का इंडिकेटर ही समझना चाहिए, क्योंकि शायद आज समय यह भी है कि हम इस बड़ी महामारी को अगर प्रकृति के साथ जोड़कर देखने की कोशिश करेंगे तो ही आने वाले समय में इस तरह की घटनाओं को कुछ हद तक रोक पाएंगे, जो तमाम विषाणु आक्रामक रूप ले चुके हैं वो कहीं न कहीं प्रकृति से सीधे छेड़छाड़ और गत दशकों में वन्य जीवों व उनके आवासों पर हमले होने का परिणाम हैं। आज हमें अपनी एक सीमा अवश्य खींच लेनी चाहिए। आज समय है कि हम प्रभु-प्रकृति-प्रवृत्ति को अलग न करें। वैसे भी हमारे शास्त्रों में हवा, मिट्टी, जंगल, पानी को देवतुल्य माना गया। यह भी समझना जरूरी है कि प्रकृति हमारी प्रवृत्ति को भी तैयार करती है। आज बिगड़ते पर्यावरण से मात्र व्याधियां ही नहीं आईं, बल्कि कई कुरीतियों ने भी जन्म लिया है। उदाहरण के लिए, आज जिस तरह से दुनियाभर में फास्टफूड स्टोर्स ने जगह बना ली है, इनमें परोसा जा रहा भोजन निश्चित रूप से हमारी प्रवृत्ति पर भारी पड़ रहा है। इस तरह के फास्टफूड शरीर में तमाम व्याधियों को भी जन्म देते हैं और व्याधियों के कारण ही हमारे व्यवहार भी बदल जाते हैं। इस तरह से प्रवृत्ति पर सीधा असर पड़ता है।

समझें स्थानीयता का महत्व

इसी कड़ी में हम तमाम वन्यजीवों को भोजन के रूप में अपना रहे हैं। आज व्यापारिक भोजन के चलन की कीमत हमें आने वाले समय में चुकानी पड़ेगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति ने स्थान विशेष, जलवायु विशेष के लिए भोजन तय किया हैै। मतलब जो जहां पैदा हुआ, जिस मिट्टी के बीच पैदा हुआ, उसी से फसलें भी तैयार होती हैं और यही कारण है कि हमारा शरीर और भोजन आपस में तालमेल रखता है और हम एक बेहतर इम्युनिटी भी पा लेते हैं, जो कि कोरोना काल में सबसे अहम साबित हो रही है।

हम निर्भर हैं प्रकृति पर

हमने पूर्व में पश्चिमी प्रवृत्ति को जिस तरह से संरक्षण दिया वो अंतत: एक भोगवादी सभ्यता का कारण बना, ये हमारे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर बहुत बड़ा हमला भी है। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस इसी बात पर केंद्रित है कि हम किस तरह से अपने पारिस्थितिकी तंत्र को दोबारा अपने प्रयत्नों, व्यवहार से वापस ला सकते हैं। इसके बड़े कारणों में स्पष्ट है कि हम अपने पूरे तंत्र व इकोसिस्टम को समझने में फेल हो चुके हैं और प्रकृति के नियम और कानूनों से पूरी तरह दूर हैं। प्रकृति हमारी शिक्षा या व्यवहार का हिस्सा है। आज यही सबसे बड़ी चुनौती है कि हम प्रकृति के नियमों को एक नए सिरे से समझें। हमें जानना होगा कि हमारी सीमाएं क्या हैं? किसी भी तरह की हलचल व लाभ के लिए हमें अंतत: पृथ्वी पर ही निर्भर होना है। सो, हमारे पूरे व्यवहार और चाल में पृथ्वी के संरक्षण की बड़ी भूमिका होनी चाहिए। हम अपने पारिस्थितिकी तंत्र को समझें और अपनी बदलती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएं। प्रकृति और प्रवृत्ति के प्रति हमारी समझ जितनी बेहतर होगी हम उतना ही अपने पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर कर पाएंगे।

सामूहिक प्रयास से होगा विकास

आज हम ऐसे संकट में हैं कि जिसका फिलहाल कोई शत-प्रतिशत समाधान नहीं है। प्रकृति ने कोरोना जैसे अदृश्य वायरस को हमारे बीच लाकर यही समझाने और सिखाने का प्रयास किया है कि मनुष्यजनित विज्ञान के प्रयत्न कैसे विफल हो सकते हैं, अगर वो प्रकृति पर केंद्रित नहीं हैं। प्रकृति हमें बार-बार समझाने की कोशिश कर रही है कि हमें संतुलन की तरफ जाना चाहिए और यह तब संभव है जब हम सामूहिक रूप से प्रकृति के नियमों को समझें और वैसे ही प्रवृत्ति भी तैयार करें। जिस पारिस्थितिकी तंत्र की चिंता अंतरराष्ट्रीय स्तर का विषय बन चुकी है, उसे इसी मनुष्य ने खतरे में डाला है। इसलिए आज यही मनुष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। तभी यह जरूरी है कि मनळ्ष्यजाति सामूहिक रूप से अपनी गलतियों का पछतावा करे व पृथ्वी के संरक्षण के लिए आगे आए!