प्रकृति को चाहिए दुलार, रहेगी हमेशा साथ; अनुकूल वातावरण मिलते ही नजर आने लगे दुर्लभ पशु-पक्षी

 


प्रकृति को चाहिए दुलार, रहेगी हमेशा साथ

-एनसीआर में स्थित अरावली क्षेत्र के अंतर्गत काफी ऐसे बायोडायवर्सिटीहाट स्पाट आते हैं जहां पर हम अरावली पर्वत शृंखला में पाए जाने वाले पेड़ पौधों तथा जीव जंतुओं को देख सकते हैं। यह सभी पेड़-पौधे और जीव जंतु इस पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिकी संतुलन को लगातार बनाए हुए हैं।

नई दिल्ली। दुलारो, निहारो, पुचकारो प्रकृति कुछ दे रही है। हराभरा घना आंचल फैला रही है। जीवों की उत्पत्ति सुखद संकेत दे रही है। उसे अब सिकुड़ने, सिमटने मत देना। पक्षियों ने भी रेजिडेंट बना लिया है, उसे टूटने मत देना। कुछ समझे आप। ये प्रकृति का संकेत है। जीव बढ़े, जंतु बढ़े क्यों? कैसे? आपने ही तो इसका खयाल रखा। हरियाली को फिर से कंक्रीट मत होने देना। प्रकृति का सान्निध्य जो मिला है उसका साथ छूटने मत देना। दिल्ली-एनसीआर के इसी अनुकूल वातावरण से रूबरू करा रही हैं प्रियंका दुबे मेहता

हरी भरी दिल्ली

पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों से समृद्ध दिल्ली साल दर साल विकास की सीढिय़ां चढ़ते हुए कब पेड़ों के जंगल से कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला। विस्तार और विकास की इस प्रक्रिया में पशु पक्षी विलुप्त होने लगे तो पर्यावरणविद् ने इसकी सुध ली और धीरे-धीरे इसकी उस प्राकृतिक समृद्धि को लौटाने के प्रयास शुरू हुए जो कभी दिल्ली की पहचान थी। वर्षों लंबे इन्हीं प्रयासों को फलीभूत होता देख दिल्ली का दिल भी गदगद हो उठा है। बायोडायवॢसटी पार्कों में बढ़ती जीव-जंतुओं की संख्या और सघन होती हरियाली की चादर राजधानी के जख्मों पर मरहम लगाती जान पड़ रही है।

खनन में उजड़े थे घोंसले

दिल्ली-एनसीआर में स्थित अरावली क्षेत्र के अंतर्गत काफी ऐसे बायोडायवर्सिटीहाट स्पाट आते हैं जहां पर हम अरावली पर्वत शृंखला में पाए जाने वाले पेड़ पौधों तथा जीव जंतुओं को देख सकते हैं। यह सभी पेड़-पौधे और जीव जंतु इस पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिकी संतुलन को लगातार बनाए हुए हैं। वन अधिकारी सुंदर लाल का कहना है कि 1980 और 1990 के बीच दिल्ली एनसीआर के क्षेत्रों में खनन गतिविधियों के कारण यह संतुलन काफी बिगड़ गया था जहां-जहां खनन का कार्य हुआ उसके आसपास के पेड़-पौधे तथा जीव-जंतु लगभग खत्म होते चले गए।

परिंदों की काफी प्रजातियां लगातार खनन में हो रही ब्लास्टिंग इत्यादि के कारण इन जगहों को छोड़कर किसी अन्यत्र सुरक्षित जगहों पर चली गईं। केवल खनन ही नहीं, बल्कि उस दौरान काम कर रहे लोगों ने भी इलाके के फ्लोरा और फाउना को खासा नुकसान पहुंचाया था। वर्ष 2000 के बाद से सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के तहत इन सभी क्षेत्रों को बचाने की मुहिम शुरू हुई। एनसीआर क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर अंकुश लगा और सरकार के प्रयासों से वन विभाग ने अरावली क्षेत्रों में उन्हेंं पौधारोपण तथा जल संरक्षण पर कार्य करते हुए इन बायोडायवर्सिटी हाटस्पाट को इसके पुराने स्वरूप में बदलने की कोशिश की।

वनस्पतियों लदे, जीवों से भरे बायोडायवर्सिटी पार्क

जब सरकार ने हरियाली और पशु-पक्षियों को बचाने के लिए जगह-जगह बायोडायवर्सिटी पार्क बनवाने की योजना शुरू की तो यह प्रकृति के लिए वरदान साबित हुआ। दिल्ली में बायोडायवर्सिटी पार्क की शुरुआत सन 2002 में हुई थी। यमुना बायोडायवॢसटी पार्क के बाद 2005 में अरावली, 2015 में तिलपत वैली और कमला नेहरू रिज, 2016 में नीला हौज और तुगलकाबाद तथा 2020 में कालिंदी बायोडायवर्सिटी पार्क की शुरुआत हुई। बंजर और अत्याधिक डिग्रेडेड लैंडस्केप से शुरू हुए ये पार्क पर्याप्त संख्या में वनस्पतियों और जीवों को आश्रय देते हैं।

अरुणा आसफ अली मार्ग पर स्थित नीला हौज पार्क में एक ऐतिहासिक झील, जो मलबे और सीवेज के कारण बेकार हो गई थी, उसे वेटलैंड के जरिये पुनर्जीवित किया गया। 'आइ एम गुडगगांव की संस्थापक लतिका ठुकराल के मुताबिक जब बायोडायवॢसटी पार्क का कांसेप्ट आया तो उन्होंने अरावली पहाड़ियों और उसके जंगलों को फिर से उसी रूप में लौटाने का काम किया और अब यहां पर फल-फूल और पशु-पक्षियों का कलरव देखकर मन को सुकून मिलता है कि कंक्रीट के शहर का कुछ हिस्सा प्रकृति की खूबसूरती से भी गुलजार है।

...तो भला जीवों को क्यों न आए रास

जैव विविधता पार्क का एक ही कांसेप्ट था कि विभिन्न इलाकों में वहां के मूल पौधों को लगाया और संवॢधत किया जाए। यमुना बायोडायवॢसटी प्लांट पहले कूड़े का ढेर था। कटा फटा सा इलाका था। दिल्ली नगर निगम ने इसे विकसित किया। इसमें कई औषधीय पौधे लगाए गए। दिल्ली के लोकल पौधे लगाए। आज इस इलाके का लैंडस्केप देखते ही बनता है। इस आकर्षण से पशु-पक्षी भी अछूते नहीं रहे और इनकी ब्रीडिंग होने लगी।

गुरुग्राम में जैव विविधता या बायोडायवर्सिटीपार्क का जितना भी इलाका था उसमें खनन की पुरानी भयावह निशानी दिखाते गड्ढे तो थे ही धीरे-धीरे पूरे इलाके में ही खनन हो गया। लोग इन गड्ढों में कूड़ा करकट भर देते। शहर के पास था और अरावली का हिस्सा था तो यह योजना बनी कि इसमें अरावली के मूल प्रजाति के पौधों की पैदावार बढ़ाई जाए। शुरुआत वन विभाग ने की थी। उसके बाद निजी सीएसआर फंड से इसकी रखरखाव करवाएंगे। यह जमीन गुरुग्राम नगर निगम में आती थी।

आइएम गुडग़ांव की संस्थापक और अरावली जैव विविधता पार्क को तैयार करवाने वाली लतिका ठुकराल का कहना है कि उन्होंने इस इलाके में पहले तो अपनी नर्सरी में अरावली के इंडीजीनस पौधे तैयार किए और फिर ड्रिप इरिगेशन की व्यवस्था की, लोगों के वाक करने के लिए कंक्रीट के रास्ते बनाए गए। यह प्रयास सफल रहा और कूड़े का ढेर देखते ही देखते हरे भरे जंगल में तब्दील हो गया। पशु-पक्षियों को और क्या चाहिए, भोजन और रिहाइश, हरियाली लौटी तो पशु-पक्षियों की चहचहाहट से इलाका जीवित हो उठा।

लौटती गई जीवंतता

वन अधिकारी सुंदर लाल का कहना है कि पशु-पक्षियों को सुरक्षा, भोजन और अनुकूलन चाहिए होता है। इन बायोडायवॢसटी पार्कों में इन्हेंं वह अनुकूलन मिला और इन्होंने यहां घोंसले लगाने शुरू कर दिए। जब पक्षी घोंसला लगा ले तो वह उस इलाके का रेजिडेंट पक्षी मान लिया जाता है, क्योंकि वह वहां पर ब्रीड करने लगता है। जब जंगल बनता है, उसमें गिरे हुए पत्तों से एक ह्यूमस परत बन जाती है। चार छह इंच की इस परत में बहुत से वर्म जैसे केचुआ, बीटल और कीट-पतंगे पनपने लगते हैं। इनका लार्वा पक्षियों के भोजन का बेहतरीन स्रोत होता है। खासतौर पर उस स्टेज में जब पक्षी ब्रीड करता है। इस लार्वा में ऐसा प्रोटीन होता है जो चूजों के लिए बेहतरीन आहार साबित होता है और उसका पाचन आसानी से हो जाता है। ऐसी स्थिति में पक्षी ऐसे इलाके में घोंसला बनाते हैं जहां पेड़ पौधों के तले यह परत मिले। यह परत जब खाद में तब्दील होती है तो उस समय प्रचुर मात्रा में आक्सीजन मिलती है। अगर किसी जगह पक्षी ने घोंसला बना लिया तो वह स्थान जैव विविधता का बेहतरीन नमूना माना जाता है।

प्राकृतिक बायोडायवर्सिटी हाटस्पाट

बायोडायवर्सिटी पार्क तो मानवीय प्रयासों से विकसित किए गए हैं लेकिन दिल्ली उन स्थानों का ऋणी भी है जो प्राकृतिक जैव विविधता का केंद्र हैं। इन्हेंं बायोडायवर्सिटी हाटस्पाट के तौर पर जाना जाता है। एनसीआर क्षेत्र में फरीदाबाद का बडख़ल, मंगर बनी, गुरुग्राम स्थित अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क, भोंडसी अरावली क्षेत्र, दमदमा, अभयपुर, बंधवाड़ी अरावली क्षेत्र गैरतपुर बास तथा रायसीना, मेवात स्थित झीर के जंगल, रेवाड़ी के पाली, बवाना गुर्जर, खोल तथा मनेठी अरावली क्षेत्र महेंद्रगढ़ के नंगल माला दुलोट माधवगढ़ नयन थानवास तथा डोसी का अरावली क्षेत्र अरावली के हाटस्पाट माने जाते हैं इन क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधे तथा जीव जंतु हैं। अब धीरे-धीरे इनका संख्या बल बढ़ रहा है जिससे एनसीआर फिर से अपने मौलिक स्वरूप में लौटता नजर आ रहा है।

बढ़ी तेंदुओं की संख्या, इठलाई गिलहरी

कुछ सालों से लगातार यह देखने को मिल रहा है एनसीआर में स्थित अरावली क्षेत्रों में तेंदुओं की संख्या बढ़ रही है। इनके साथ-साथ अन्य जंगली जीव जैसे गीदड़, लकड़बग्घा, सिवेट की दो प्रजातियां, चिंकारा, नीलगाय, मैंगूज की दो प्रजातियां, सांपों की कई प्रजातियां जैसे ब्लैक कोबरा, ब्लैक हेडेड रायल स्नेक, रेसर स्नेक, सैंड बोआ, सा स्केल्ड वाइपर, आदि इसके अलावा मानिटर लिजार्ड, जंगली खरगोश और गिलहरियों की क्रीड़ा देखने को मिल रही है।

नजर आने लगे दुर्लभ पशु-पक्षी

एनसीआर में स्थित इन बायोडायवर्सिटी हाटस्पाट के आसपास पक्षियों के बहुत सारी ऐसी प्रजातियां तथा तितलियां देखने को मिली हैं जो पहले इस क्षेत्र में कभी नहीं नजर आईं। पक्षियों में यदि हम बात करें तो व्हाइट नैप्ड टिट, जो सिर्फ पूरी दुनिया में आंध्र प्रदेश राजस्थान वह गुजरात के एक दो क्षेत्रों में दिखाई देते थे, आज यह प्रजाति जिला रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ में भी काफी संख्या में देखने को मिल रही है इसके साथ-साथ ही जिला रेवाड़ी में खोल अरावली क्षेत्रों के आसपास स्पाटेड ट्री क्रीपर पक्षी भी देखने को मिल रहा है क्योंकि अन्य प्रजातियों में यहां चार तरह की कोयल, पेंटेड सैंडगऱाउज, कठफोड़वा की चार प्रजातियां, बंटिंग की प्रजातियां जैसे क्रस्टेड बंटिंग, राक बंटिंग, स्टीरियो लेटेड बंटिंग, इसके साथ-साथ व्हाइट बैलीज मिनीवेट, स्पाटेड उल्लू, राक ईगल आउल, भारतीय स्कूप्ड उल्लू, मलकोवा, सल्फर बेलीड वारब्लग सहित पक्षियों की लगभग 300 अन्य प्रजातियां इन क्षेत्रों में देखी जा सकती हैं। 2016 में यमुना बायोडायवॢसटी पार्क में एक तेंदुआ भी देखा गया। वहीं अरावली जैव विविधता पार्क में भारतीय पित्त और काली चील जैसे कई पक्षी लंबे समय के दौरान देखे गए हैं।

बर्ड वाचिंग ने लौटाया प्रकृति प्रेम

पर्यावरणविद फैयाज खुदसर का कहना है कि इन पशु पक्षियों के बढऩे का सबसे बड़ा कारण इन्हेंं मिला अनुकूलन वातावरण है। तमाम प्रयासों के बाद दिल्ली-एनसीआर में इन पक्षियों को अनुकूल आबोहवा मिली और इनके लिए बने बायोडायवॢसटी पार्कों में विशेष प्रबंध किए गए। हरियाली बढ़ी तो पशु पक्षी तो अपने पुनॢनमित घरों को वापस लौटने ही थे। इन इलाकों में नए और दुर्लभ पशु पक्षियों के मिलने का एक और कारण है कि लोगों की इनमें रुचि बढ़ी है। लोग जागरूक हुए हैं और उन्होंने कुदरती नेमतों को सहेजना शुरू किया है। बर्ड वाचिंग के बढ़ते चलन में लोग इन्हेंं देख रहे हैं, जान रहे हैं और इनकी प्रवृत्तियों को पहचान रहे हैं। बर्ड वाचर कवि नंदा का कहना है कि इंसान को अपने साथ बस थोड़ी सी जगह देनी है, अनुकूलन और दुलार देना है, राजधानी क्षेत्र पशु-पक्षियों से गुलजार हो जाएगा।