'सनफ्लॉवर' के साथ सुनील ग्रोवर ने खिलाए कौन से गुल


Sunil Grover in Sunflower web series. Photo- Instagram

सनफ्लॉवर वेब सीरीज़ के आने की आहट हुई तो उम्मीद जगी कि तांडव में करियर की गाड़ी का गियर बदलने वाले सुनील सनफ्लॉवर के साथ कोई नया गुल खिलाएंगे। यह उम्मीद इसलिए भी बंधी क्योंकि सनफ्लॉवर को विकास बहल ने लिखा है।

 नई दिल्ली। अमेज़न प्राइम वीडियो की बेहद चर्चित और विवादित वेब सीरीज़ तांडव के ज़रिए सुनील ग्रोवर ने करियर की गाड़ी का गियर बदला, जो काफ़ी समय से डॉ. मशहूर गुलाटी, गुत्थी और रिंकू भाभी की छवियों में अटका हुआ था और एक ऐसा चेहरा सामने लेकर आये, जो उनकी पिछली पहचानों से एकदम अलग था।

जब सनफ्लॉवर वेब सीरीज़ के आने की आहट हुई तो उम्मीद जगी कि तांडव में करियर की गाड़ी का गियर बदलने वाले सुनील सनफ्लॉवर के साथ कोई नया गुल खिलाएंगे। यह उम्मीद इसलिए भी बंधी, क्योंकि सनफ्लॉवर को विकास बहल ने लिखा है, क्वीन और सुपर 30 जैसी फ़िल्मों के जाने जाते हैं।

विकास का यह ओटीटी डेब्यू है, मगर सुनील और विकास की जोड़ी वो रंग जमाने में सफल नहीं हो सकी, जिसकी उम्मीद थी। सनफ्लॉवर एक ऐसी मर्डर मिस्ट्री है, जिसकी रफ़्तार इसकी कॉमेडी ने सुस्त कर दी है। मगर बेहतरीन कलाकारों ने कई जगह डांवाडोल होती सीरीज़ को संभाला है, जिसके चलते दर्शक को किस्तों में थ्रिल और ह्यूमर का मज़ा आता है।सनफ्लॉवर की कथाभूमि मुंबई की एक रिहायशी सोसाइटी है, जिसका नाम सनफ्लॉवर है। कहानी मुख्य रूप से तीन ट्रैक्स पर चलती है। पहला ट्रैक सोसाइटी में हुए एक क़त्ल का पुलिस इनवेस्टीगेशन है, जिसके दायरे में सोसाइटी में रहने वाले कुछ लोग हैं।

दूसरा ट्रैक सोसाइटी के पदाधिकारियों के बीच आपसी खींचतान पर आधारित है, जिसके ज़रिए कथित सभ्य समाज की पिछड़ी सोच, पूर्वाग्रहों और हिपोक्रेसी को रेखांकित किया गया है। तीसरा ट्रैक सनफ्लॉवर के मुख्य किरदार सोनू सिंह की घर से ऑफ़िस के बीच अकेलेपन की ज़िंदगी है, जो सीरीज़ के ह्यूमर पक्ष का सबसे बड़ा सप्लायर है। 

अब अगर इन तीनों ट्रैक्स का समावेश करके कहानी कही जाए तो वो इस प्रकार है- सनफ्लॉवर सोसाइटी के एक पेंटाहाउस फ्लैट में रहने वाले राज कपूर (अश्विन कौशल) की एक सुबह मौत हो जाती है। पुलिस मौक़ा-ए-वारदात पर पहुंचती है। तफ्तीश में पता चलता है कि राज कपूर की मौत एक केमिकल दिये जाने की वजह से हुई है और मामला क़त्ल का बन जाता है। 

इंस्पेक्टर दिगेंद्र (रणवीर शौरी) अपने सहयोगी इंस्पेक्टर तांबे (गिरीश कुलकर्णी) और पूरी टीम के साथ जांच शुरू करता है। पुलिस की पूछताछ के दौरान सोसाइटी के सभी प्रमुख किरदारों का दर्शकों से परिचय होता है। जांच के दौरान पता चलता है कि राज कपूर की पत्नी उसे छोड़कर चली गयी थी। यह किरदार शोनाली नागरानी ने निभाया है। पुलिस सोसाइटी में सभी से पूछताछ करती है, मगर हालात और सबूतों के मद्देनज़र डॉ. आहूजा, सोनू सिंह, राज कपूर की बाई और बिल्डिंग के चौकीदार पर संदेह होता है।

कहानी आगे बढ़ती है तो राज कपूर की पत्नी, जो उसे छोड़कर उसके भाई के साथ रह रही है, भी शक़ के दायरे में आती है। पुलिस जांच करती रही है। सभी संदिग्धों से बार-बार पूछताछ होती है। पुलिस को कुछ ऐसे सबूत मिलते हैं, जिनके आधार पर उन्हें यक़ीन हो जाता है कि सोनू सिंह ही क़ातिल है और वो उसे ढूंढने में जुट जाते हैं। कुछ अन्य घटनाक्रमों में सोनू उलझ जाता है। पुलिस को लगता है कि वो फ़रार है। सनफ्लॉवर के कलाकारों ने कमज़ोर लिखाई को कई जगह संभालने की कोशिश की है, मगर जब लाइनें ही पिलपिली हों तो अभिनय भी कब तक सपोर्ट करेगा। सुनील ग्रोवर के किरदार को भोला-भाला मगर कामयाब सेल्समैन दिखाया गया है। हमेशा मुस्कुराता रहता है। ना गुस्सा करता है, ना विचलित होता है। चाहे जो हालात हों। सुनील ने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है। उनकी कुछ बातें हास्य भी पैदा करती हैं, मगर कई ऐसे दृश्य भी हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि सुनील की पिछली इमेज को कैश करने के लिए दृश्यों को गढ़ा गया है। 

आशीष विद्यार्थी दिलीप अय्यर के किरदार में हैं, जो इस सोसाइटी को भारतीय संस्कृति के हिसाब से आदर्श बनाना  चाहता है। यह अलग बात है कि अय्यर का आदर्शवाद तलाक़शुदा, ट्रांसजेंडर, मुस्लिम, पान का बिज़ेस करने वाले, बैचलर, फ़िल्म या टीवी इंडस्ट्री में काम करने वाले या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों को छांटकर चलता है।

अय्यर जिस तरह की सोसाइटी बनाना चाहता है, उसमें इन सब लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। अय्यर चेयरमैन के चुनाव में खड़ा हो रहा है। उसकी इस सोच को उन किराएदारों के साथ इंटरव्यूज़ के ज़रिए दिखाया गया है, जो सोसाइटी में फ्लैट लेने समय-समय पर आते हैं और अलग-अलग कारणों से रिजेक्ट कर दिये जाते हैं। हालांकि, अय्यर की बेटी पैडी (रिया नलवडे) ही उसकी सोच की सबसे बड़ी आलोचक है। 

अय्यर के किरदार में आशीष विद्यार्थी ने सफल अभिव्यक्ति दी है। दक्षिण भारतीय किरदार होने की वजह से उनके उच्चारण में क्षेत्रीयता का पुट उनकी बेहतरीन संवाद अदायगी की मिसाल है। हालांकि, उनका किरदार कई जगह ह्यूमरस के बजाए इरिटेटिंग लगता है।  

सोसाइटी का तीसरा प्रमुख किरदार डॉ. आहूजा है, जिसे मुकुल चड्ढा ने निभाया है। आहूजा राज कपूर के फ्लैट के सामने रहता है और दोनों में बिल्कुल नहीं बनती। पार्किंग को लेकर झगड़ा भी हुआ था। राज के क़त्ल के बाद शक़ की सुई आहूजा पर भी है।

डॉ. आहूजा पेशे से टीचर है, जो पत्नी मिसेज आहूजा (राधा भट्ट) और छोटे से बेटे के साथ रहता है। घर के बाहर आदर्शवाद का ढोंग रचने वाला आहूजा घर के अंदर दब्बू, साजिशें रचने वाला और पुरुष दम्भ से भरा हुआ व्यक्ति है। आहूजा की कुछ गतिविधियों की वजह से पुलिस के शक के दायरे में आता है।डॉ. आहूजा के किरदार में मुकुल चड्ढा और पत्नी के रोल में राधा भट्ट ठीक लगे हैं। 

मोटे लैंस का चश्मा लगाये इनवेस्टीगेटिव ऑफ़िसर दिगेंद्र के रोल में रणवीर शौरी ने बढ़िया काम किया है। आंखों पर मोटे लैंस का चश्मा लगाये उनके एक्सप्रेशंस की जो निरंतरता है, वो कमाल है। रंगीनमिज़ाज और हमेशा मोबाइल फोन को अंगुलियों पर नचाने वाले इंस्पेक्टर तांबे के किरदार में गिरीश कुलकर्णी की सहज अदाकारी सीरीज़ की हाइलाइट कही जा सकती है।

वहीं, बातूनी और शातिर हाउस मेड के किरदार में अन्नपूर्णा सोनी ने ध्यान खींचा है। सनफ्लॉवर का तकनीकी पक्ष मजबूत है। संगीत, कैमरा, कॉस्ट्यूम सभी विभागों ने अपना काम बखूबी किया है। राहुल सेनगुप्ता का निर्देशन भी ठीक है। 

सनफ्लॉवर की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि इसमें एक साथ बहुत कुछ कहने और दिखाने की कोशिश की गयी है, जिसकी वजह से यह सीरीज़ भटकी और बिखरी हुई सी लगती है। मर्डर-मिस्ट्री का थ्रिल, सिचुएशनल कॉमेडी और सोशल मैसेज का घालमेल करने के चक्कर में रफ़्तार सुस्त हो जाती है। बीच में कई लम्हे ऐसे आते हैं कि मर्डर-मिस्ट्री का प्लॉट नेपथ्य में चला जाता है और बाक़ी सब होता रहता है। कुल 8 एपिसोड्स की सीरीज़ आख़िरी के एपिसोड्स में जाकर गति पकड़ती है और कॉमेडी के चक्कर में जो थ्रिल मिस हो रहा था, उसे दर्शक महसूस कर पाता है।

कलाकार- सुनील ग्रोवर, आशीष विद्यार्थी, रणवीर शौरी, गिरीश कुलकर्णी, मुकुल चड्ढा, अश्विन कौशल, राधा भट्ट आदि।

निर्देशक- राहुल सेनगुप्ता

क्रिएटर/लेखक- विकास बहल