नई हरित क्रांति को सींचेंगी एमएसपी, तिलहनी और दलहनी फसलों पर किसान लगाने लगे दांव


दलहन और तिलहन का बढ़ रहा रकबा और उपज का फायदा पिछले कुछ अरसे से दिखने लगा है।

एक तरफ इस वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर खरीद पुराने सारे रिकार्ड तोड़ रही है और विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा समर्थित कृषि बिल विरोधी आंदोलन का औचित्य कठघरे में खड़ा हो रहा है। पढ़ें यह स्‍पेशल रिपोर्ट...

नई दिल्ली। एक तरफ इस वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर खरीद पुराने सारे रिकार्ड तोड़ रही है और विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा समर्थित कृषि बिल विरोधी आंदोलन का औचित्य कठघरे में खड़ा हो रहा है। दूसरी तरफ सीमित रूप में ही सही, एमएसपी फसल विविधीकरण और दूसरी हरित क्रांति का बड़ा उपकरण भी बनने जा रही है। दलहन और तिलहन का बढ़ रहा रकबा और उपज का फायदा तो पिछले कुछ अरसे से दिखने लगा है।

हरियाणा में पिछले दो वर्षों से धान की जगह दूसरी फसलों की खेती पर 7,000 रुपए प्रति एकड़ की वित्तीय मदद दी जाती है, जिससे लोगों ने लगभग एक लाख एकड़ में धान की खेती नहीं की। चालू सीजन में यह लक्ष्य बढ़कर दो लाख एकड़ का हो गया है। साफ है कि आने वाले दिनों में केंद्र सरकार दूसरे राज्यों को भी ऐसी पहल करने को प्रोत्साहित करेगी। बयार कुछ इस तरह बही तो संभव है कि भौगोलिक और वैज्ञानिक आधार पर कृषि की नई दिशा दिखेगी।

चालू खरीफ सीजन की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा कर दी गई है। इसमें दलहन व तिलहन की फसलों के साथ मोटे अनाज वाली फसलों बाजरा और ज्वार के एमएसपी को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई है। सरकार की मंशा फसल विविधीकरण की है, जिससे किसानों का मोह धान व गेहूं से हटकर उन फसलों की ओर जाए, जिनकी फिलहाल बहुत जरूरत है।

देश में दाल व खाद्य तेलों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग एक लाख करोड़ रुपये मूल्य का आयात करना पड़ता है। इसके लिए सरकार ने एमएसपी को एक उपकरण की तरह उपयोग करने की कोशिश की है। सरकार ने गेहूं व धान के अलावा दूसरी फसलों की सरकारी खरीद को सुनिश्चित करने की भी कोशिश की है, ताकि किसानों को उचित मूल्य प्राप्त हो सके।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूं व धान की उत्पादकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। इससे वहां भूमि की उर्वरता खत्म हो रही है। भूजल के दोहन से यहां का पूरा इलाका डार्क एरिया घोषित किया जा चुका है। रसायनों के सर्वाधिक उपयोग से यहां की आबोहवा दूषित हो चुकी है, जिससे लोगों का स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

सरकार की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित किया है, जिससे देश के छोटे किसानों को खास मदद मिलेगी। आमतौर पर असिंचित क्षेत्रों में ज्वार और बाजरा की खेती होती है, जिसमें कम लागत से अधिक आमदनी हो सकती है। इनमें उन्नत प्रजाति के हाइब्रिड बीजों ने इसकी खेती को काफी लाभप्रद बना दिया है।

इसी तरह दलहनी व तिलहनी फसलों की खेती के लिए उन्नत किस्म के बीजों के मिनी किट किसानों के बीज खरीफ सीजन से पहले ही वितरित किए जा रहे हैं। दाल वाली फसलों के साथ तिलहनों की भी सरकारी खरीद को सुनिश्चित कर दिया गया है। पिछले कई सालों से इन दोनों वर्ग की फसलों के बफर स्टॉक भी बनाए जा रहे हैं।

इसके चलते जिंस बाजार में इनकी कीमतें एमएसपी से ऊपर चल रही हैं, जिसका फायदा सीधे किसानों को प्राप्त हो रहा है। मोटे अनाज की सरकारी खरीद भी स्थानीय स्तर पर होने लगी है। मोटे अनाज का वितरण राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन प्रणाली में हो रहा है। बाजरे की एमएसपी भले ही 2,250 रुपये और ज्वार की 2,758 रुपये प्रति क्विंटल हो लेकिन राशन पर इसका मूल्य मात्र एक रुपया प्रति किलो ही निर्धारित है।