बिहार में लालू प्रसाद यादव को नजरअंदाज करना मुश्किल, तीन दशक से उनके आसपास घूम रही सियासत

 


आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव। फाइल तस्‍वीर।

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति में तीन दशक से अधिक समय से मुख्‍यधारा में टिके हुए हैं। सत्‍ता पक्ष भी उनके विरोध की राजनीति कर उन्‍हें सियासी जिंदगी देते रहा है। आइए जानें।

पटना,  राष्‍ट्रीय जनता दल ) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव  शुक्रवार को उम्र के 74वें साल में प्रवेश कर रहे हैं। करीब 31 सालों के उनके राजनीतिक जीवन में कई झंझावात आए, लेकिन बिहार की सियायत  में उनकी अहमियत बरकरार रही। चारा घोटाला  में लंबे समय तक जेल में रहने के बावजूद विपक्ष की राजनीति  उनके आसपास ही घूमती दिखी। अब उनके जमानत पर रिहा होने के बाद बिहार की सियासत फिर नए सिरे से गरमाएगी, यह तय है।

बिहार की राजनीति में लालू अहम किरदार

बिहार की राजनीति पर गौर करें तो आज भी यह लालू विरोध के नाम पर रही है। सत्‍ता पक्ष के विकास, रोजगार या कानून-व्‍यवस्‍था के मुद्दे भी लालू पर आकर ठहर जाते हैं। सत्‍ता पक्ष लालू-राबड़ी के राज की याद दिला कर अपने काल की तुलना उस दौर से करता है। बीते विधानसभा चुनाव  के दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार  से लेकर राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन  के तमाम नेताओं के निशाने पर लालू प्रसाद यादव ही रहे। समर्थन हो या विरोध, बिहार की राजनीति में लालू अहम किरदार रहे हैं।

बीते विधानसभा चुनाव ने भी दी मजबूती

बीते लोकसभा चुनाव में आरजेडी की करारी हार के बाद लगा था कि लालू राजनीति के हाशिए पर जा रहे हैं। साथ ही उनके राजनीतिक उत्‍तराधिकारी तेजस्वी यादव  के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े हो गए थे। विपक्षी महागठबंधन के अन्‍य दलाें की भी हालत भी कुछ ऐसी ही रही। लेकिन लालू बिहार की राजनीति में बने रहे। बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इससे न केवल तेजस्‍वी का कद बढ़ा, बल्कि लालू काे भी को मजबूती मिली।

अपने वोटों पर रखते मजबूत पकड़

आखिर लालू का इतना विरोध क्‍यों? इसे जानने के लिए बिहार की सामाजिक संरचना को जानना-समझना होगा। दरअसल, बिहार में आज भी जातिवाद एक जमीनी सच्‍चाई है। लालू ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग में यादवों के साथ मुसलमानों को जोड़कर जो एम-वाई समीकरण बनाया, उसे कोई भी दल नजरअंदाज नहीं कर सकता है। विपक्षी भी मानते हैं कि लालू का जनता से, खासकर ग्रामीण इलाकों में कनेक्‍ट करने की काबिलियत उन्‍हें अलग स्‍थान देती है। आरजेडी के एम-वाई समीकरण में अन्‍य राजनीतिक दलों ने सेंध लगा दी है, बदले में दलित-मुस्लिम व दलित आदि जैसे कई वोट बैंक भी बन गए हैं, लेकिन आज भी लालू की अपने वोट बैंक पर पकड़ को नजरअंदाज करना मुश्किल है। ऐसे में लालू अपने विरोध के कारण भी चर्चा में रहते आए हैं।

लालू के बिहार आने पर फिर गरमाएगी सियासत

सवाल उठता है कि अब आगे क्‍या? लालू जमानत पर रिहा होकर अभी दिल्‍ली में बेटी मीसा भारती (के पास हैं। वही मीसा, जिनका जन्‍म तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी  द्वारा लागू आपातकाल  के दौर में लालू के मीसा (कानून) के अंतर्गत जेल में रहने के दौरान हुआ था। खैर, आपातकाल व लालू द्वारा बेटी का नाम मीसा रखने का किस्‍सा फिर कभी, फिलहाल राजनीति का चक्‍का घूम गया है। लालू आज महागठबंधन में कांग्रेसके साथ हैं। कोरोना की वर्तमान लहर  के खत्‍म होने के बाद उनके बिहार आने की उम्‍मीद है। बिहार में उनकी मौजूदगी क्‍या राजनीतिक गुल खिलाएगी, यह देखना शेष है। फिलहाल, लालू अगर एनडीए से जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) व मुकेश सहनी (Mukesh Sahani) का मांह भंग करने में कामयाब हुए तो बिहार में सियायत बड़ी करवट ले सकती है। वैसे मांझी व सहनी ने ऐसी संभावना से इनकार किया है।