इस बार ‘विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस’ की थीम ‘स्वस्थ कल के लिए आज का सुरक्षित भोजन’


नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में नई किस्मों की खोज की जाती है।

सुखद यह है कि हरित क्रांति में अग्रिम पंक्ति में रहे नई दिल्ली में पूसा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के विज्ञानी इस कार्य में बखूबी जुटे हैं। सात जून को मनाए जा रहे ‘विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस’ की थीम भी ‘स्वस्थ कल के लिए आज का सुरक्षित भोजन’ है।

नई दिल्ली। देश की बहुत बड़ी आबादी का पोषण करने वाले कृषि क्षेत्र में बेशुमार चुनौतियां हैं। खेती योग्य सीमित जमीन, बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन सहित तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना भी बड़ी चुनौती है। सुखद यह है कि हरित क्रांति में अग्रिम पंक्ति में रहे नई दिल्ली में पूसा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के विज्ञानी इस कार्य में बखूबी जुटे हैं। इस बार सात जून को मनाए जा रहे ‘विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस’ की थीम भी ‘स्वस्थ कल के लिए आज का सुरक्षित भोजन’ है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डा. एके सिंह के मुताबिक भविष्य की जरूरतों को देखते हुए बहुस्तरीय माडल पर कार्य हो रहा है। इसमें उत्पादन में बढ़ोतरी, पोषक तत्वों में इजाफा, खेती में लागत कम करने के साथ ही विपरीत जलवायु के प्रति सहनशील किस्मों को विकसित करने जैसे कार्य शामिल हैं। दरअसल, विज्ञानियों के सामने कई चुनौतियां हैं। खाद्य सुरक्षा के साथ यह भी सुनिश्चित करना है कि नई किस्मों में पोषण तत्व भरपूर रहे। इसके लिए धान-गेहूं, दलहन-तिलहन की ऐसी किस्मों के विकास पर शोध किया जा रहा है जिनमें अधिक पैदावार हो।

कम लागत में हो अधिक उत्पादन:

खेती को लाभकारी बनाने के लिए ऐसी किस्में ईजाद की जा रही हैं, जिससे कम समय में फसल तैयार हो और सिंचाई की कम जरूरत पड़े। ठोस के बजाय तरल उर्वरक इस्तेमाल होने के कई फायदे हैं। अच्छी बात यह है कि पूसा के विज्ञानियों ने विभिन्न फसलों की ऐसी किस्मों का विकास किया है। चने की सूखारोधी किस्में अब आसानी से सूखे को झेल जाती हैं। जहां यह समस्या नहीं है वहां के लिए ऐसी किस्म विकसित की गई है जिसमें सिंचाई की जरूरत कम से कम होती है।

गेहूं की ऐसी सात किस्में विकसित की गई हैं जिनमें कम पानी की जरूरत होती है। संस्थान के इंदौर स्थित केंद्र द्वारा विकसित ऐसी किस्मों में एचआइ 1620, 1621, 1628, 8028 शामिल हैं। इसी तरह धान की ऐसी किस्में विकसित की गई हैं जो झुलसा व झोंका रोगों से पूरी तरह मुक्त हैं। पूसा बासमती 1121, 1509, 1401 ऐसी किस्में हैं जिनकी खेती में लागत कम होने के साथ उत्पादन की क्षमता को भी बढ़ाया गया है।

पोषण सुरक्षा भी जरूरी:

दैनिक आहार में सूक्ष्म पोषक तत्वों का न होना, कुपोषण का बड़ा कारण है। इसके लिए संस्थान मक्का व बाजरे की ऐसी किस्मों का विकास कर रहा है, जिसमें लौह व जिंक तत्व पर्याप्त मात्रा में रहें। मक्का व गेहूं में क्वालिटी प्रोटीन अधिक मात्रा में

रहे। मक्का की ऐसी किस्म विकसित की गई जिसमें बीटा कैरोटिन की मात्रा परंपरागत किस्म की तुलना में दस गुना अधिक है। इसी तरह मसूर की एक किस्म में जिंक व लौह तत्व की मात्रा अधिक सुनिश्चित की गई है। सरसों की ऐसी किस्म ईजाद की

गई है जिसमें यूरिक एसिड की मात्रा उतनी ही हो जिसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

कोरोना महामारी जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद किसानों व विज्ञानियों ने खाद्य व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में रत्ती भर कमी नहीं आने दी। इस वर्ष खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन हुआ। जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौती है, जिसे ध्यान में रखकर नई किस्मों के विकास में लगे हुए हैं। बायोर्फोिटफाइड किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसमें पादप प्रजनन द्वारा फसलों की पोषण गुणवत्ता बढ़ाई जाती है।

(डा. एके सिंह, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा)