कहानियों के बदलते तेवर और कलेवर-‘वक्त अच्छा हो तो कुत्ता भी कोक पीता है’

 


ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स की वजह से फिल्मों का लोकतांत्रिकरण हुआ है।

एक कार्यक्रम के दौरान अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स की वजह से फिल्मों का लोकतांत्रिकरण हुआ है।

नई दिल्ली। एक कार्यक्रम के दौरान अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स की वजह से फिल्मों का लोकतांत्रिकरण हुआ है। प्रियंका चोपड़ा के अलावा अमेजन प्राइम से जुड़ीं अपर्णा पुरोहित ने भी ओटीटी को लेकर एक अहम बात कही। उनके अनुसार ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए कहानियों के चयन में उसकी प्रमाणिकता के साथ-साथ कहानी में स्थानीयता पर भी जोर रहता है। गाहे बगाहे ओटीटी पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरीज की कहानियों और उसके स्वरूप पर बात होती रही है। पिछले दिनों इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है।

प्रियंका चोपड़ा जब फिल्मों के लोकतांत्रिकरण की बात करती हैं तो उसके कई आयाम सामने आ जाते हैं। कहांनी के स्तर पर अगर हम देखें तो बॉलीवुड में उस तरह की कहानियों को निर्माता मिलने लगे हैं जिनको पहले कोई हाथ भी नहीं लगाता था। पहले फिल्मों में एक नायक होता था, एक नायिका होती थी, चार पांच बेहद दिलकश गाने होते थे, कुछ फाइट सीन होते थे और फिर फिल्म का सुखांत हो जाता था। उसके भी पीछे जाएं तो हिंदी फिल्मों में धार्मिक कहानियों को प्राथमिकता मिलती थी और उन कहानियों को दर्शक भी खूब मिलते थे। बाद में पश्चिमी देशों में बनने वाली फिल्मों के प्रभाव में हिंदी फिल्मों में हिंसा और मारपीट का जोर बढ़ा। एक्शन मूवी का विशेषण ही आरंभ हो गया था। इसी दौर में हिंदी फिल्मों ने स्टारडम भी देखा, सुपरस्टार से लेकर मेगास्टार तक हुए, जिनकी उपस्थिति फिल्म के हिट होने की गारंटी मानी जाती थी।

निर्माता उनको मुंहमांगी रकम देने को तौयार रहते थे। बीच में कुछ निर्माताओं ने यथार्थवादी फिल्में भी बनाई और उसको एक विचारधारा विशेष से जोड़कर समांतर सिनेमा से लेकर कला फिल्मों तक का नाम दिया। उनमें यथार्थ तो होता था पर फिल्में लोकप्रिय नहीं होती थी। इन कथित यथार्थवादी फिल्मों के बनाने वाले अपनी फिल्मों की लोकप्रियता को लेकर अधिक चिंता भी नहीं करते थे वो तो विचार को आगे बढ़ाने की फिराक में रहते थे। ये अलग से शोध का विषय है कि कला फिल्मों के निर्माता नुकसान कैसे झेलते थे, क्या उस समय सरकार फिल्म बनाने के लिए पैसे देती थी, जिसके बल पर उनको दर्शकों की फिक्र नहीं होती थी। खैर ये अवांतर प्रसंग है जिसपर कभी और चर्चा होगी।

प्रियंका चोपड़ा जब फिल्मों के लोकतांत्रिकरण की बात करती हैं तो मुझे लगता है कि वो बहुत हद तक सही कह रही हैं और फिल्मी दुनिया के ट्रेंड की ओर इशारा कर रही हैं। ओटीटी पर जो सीरीज आ रहे हैं उनमें कहानी प्रमुख हो गई है। ये आवश्यक नहीं है कि सीरीज को हिट कराने के लिए बड़े स्टार की मौजूदगी आवश्यक हो। अभी पिछले दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म ऑल्ट बालाजी पर एक वेबसीरीज आई थी जिसका नाम था ‘बिच्छू का खेल’। बिच्छू का खेल अमित खान के उपन्यास पर आधारित है जिसकी कहानी बनारस की है। इस वेब सीरीज के डॉयलॉग लिखे हैं युवा लेखक क्षितिज राय ने। क्षितिज राय के संवादों ने सीरीज में बनारस और बनारसीपने को जीवंत कर दिया है।

‘वक्त अच्छा हो तो कुत्ता भी कोक पीता है’ जैसे कई संवाद इसमें हैं। बनारस की बोली से लिए गए शब्दों का भी क्षितिज ने संवाद में ठीक-ठाक उपयोग कर लिया है। इस सीरीज के हीरो हैं दिव्येन्दु शर्मा। ना कोई बड़ा नाम, न कोई सुपर स्टार का तमगा लेकिन अपनी अदायगी के बल पर पूरी वेब सीरीज में दर्शकों को बांधने में कामयाब रहते हैं। एक और वेब सीरीज आई ‘काठमांडू कनेक्शन’। कहानी और उसके किरदार लखनऊ, मुंबई, दिल्ली से लेकर काठमांडू तक में घूमते हैं। न्यूज चैनल भी इसमें आता है, इस वेब सीरीज के लेखक सिद्धार्थ मिश्रा न्यूज चैनलों से जुड़ी कई घटनाओं को भी बेहद खूबसूरती के साथ कहानी में पिरो देते हैं। ये छोटी घटनाएँ होती हैं लेकिन होती दिलचस्प है।

कहानी 1993 के मुंबई धमाकों की जांच से आरंभ होती है लेकिन फिर परत दर परत खुलती है और उसके कई आयाम दर्शकों के सामने आते हैं। इसमें अमित सियाल, गोपाल दत्त जैसे कलाकार हैं पर इसको देखते हुए कभी भी ये नहीं लगता है कि आप अमित सियाल को देख रहे हैं या गोपाल दत्त को देख रहे हैं। कहानी के पात्रों की रचना इतनी मजबूती से की जाती है कि दर्शक नायक को भूलकर पात्र के नाम के साथ जुड़ जाता है। इसमें डीसीपी समर्थ कौशिक या सनी को ही लोग याद रखते हैं। इस लिहाज से देखें तो प्रियंका चोपड़ा ठीक कह रही है कि फिल्मों का लोकतांत्रिकरण हुआ है। बल्कि यहां तक कहा जा सकता है कि फिल्मों में जो वर्ण व्यवस्था थी उसको ओटीटी प्लेटफॉर्म ने तोड़ा है। वर्ण व्यवस्था यानि ये ए लिस्टर हैं, ये बी लिस्टर हैं आदि आदि।

यहां अब कोई सुपर स्टार नहीं है, कहानी ही स्टार है। यहां कोई ऐसा स्टार नहीं है कि उसकी उपस्थिति मात्र सफलता की गारंटी है। यहां तो कहानियों के किरदार हैं जिसको दर्शक पसंद करते हैं या नापसंद करते हैं । सैफ अली खान ने भी कुछ वेब सीरीज में काम किया लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि उसको देखने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दर्शकों की बड़ी संख्या पहुंची और ‘बिच्छू का खेल’ या ‘काठमांडू कनेक्शन’ को देखने के लिए कम। थोडा बहुत का अंतर हो सकता है। लेकिन जितना ‘घोउल’ को देखा होगा उससे कम लोगों ने ‘बिच्छू का खेल’ नहीं देखा होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है।

इस मसले पर प्रियंका चोपड़ा का ही उदाहरण दिया जा सकता है। प्रियंका चोपड़ा बेहद सफल अभिनेत्री हैं। हिंदी फिल्मों की सबसे महंगी नायिका के तौर पर उनका नाम लिया जाता था, वॉलीवुड में भी काम रही हैं। पिछले दिनों उनकी फिल्म ‘व्हाइट टाइगर’ ओटीटी पर रिलीज हुई । ये फिल्म अरविंद अडिगा के अंग्रेजी उपन्यास पर आधारित थी। लेकिन इसको अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

दरअसल अब अगर हम विचार करें तो ये पाते हैं कि मनोरंजन की दुनिया पूरी तरह से बदलती जा रही है। उसकी कहानियां बदल गई हैं। उसको कहने का अंदाज भी बदल गया है। अब ज्यादा यथार्थवादी कहानियों पर फिल्म या वेब सीरीज बन रही हैं। इस तरह की कहानियों से दर्शक खुद का जुड़ाव महसूस करते हैं, उनको लगता है कि वो इन कहानियों से किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं। जब यथार्थ के नाम पर जब कहानी को अनावश्यक विस्तार दिया जाता है तो दर्शक फौरन उससे दूर चले जाते हैं। कुछ दिनों पहले एक वेब सीरीज आई थी ‘स्कैम 1992’। ये शेयर दलाल हर्षद मेहता और उसके मार्फत 1992 के शेयर बाजार घोटाले की कहानी कहती है।

वेब सीरीज देवाशीष बसु और सुचेता दलाल की अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘द स्कैम, हू वन, हू लास्ट, हू गाट अवे’ पर आधारित है। इसके संवाद कई लोगों ने मिलकर लिखे हैं लेकिन दस एपिसोड में कहानी कहने के चक्कर में सीरीज बोझिल और उबाऊ हो गया है। कहना न होगा कि यथार्थवादी कहानियों या सत्य घटनाओं पर वेब सीरीज या फिल्म बनाते वक्त फिल्म निर्माण की बुनियादी बातों का तो ध्यान रखना ही होगा।

ओटीटी ने न सिर्फ फिल्मों या वेब सीरीज का लोकतांत्रिकरण किया है बल्कि उसने दर्शकों को भी पहले से ज्यादा मुखर बना दिया है। अब वो अपनी पसंद और नापसंद खुलकर व्यक्त करने लगे हैं। उनके पास इंटरनेट मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म भी हैं जो उनको ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से मुखरित होने का मंच और अवसर दोनों देते हैं। सिनेमा का ये बदलता स्वरूप दर्शकों को भा भी रहा है।